स्मृति शेष – के पी सक्सेना

आज हिन्दी के लोकप्रिय व्यंग्य लेखक के पी सक्सेना की पहली पुण्यतिथि है।  लेखन की अपनी अनूठी शैली के लिए प्रसिद्ध के पी सक्सेना का पूरा नाम कहीं केसरी प्रसाद और कहीं कालिका प्रसाद बताया जाता है,  वास्तविक पूरे नाम की मुझे सही जानकारी नहीं  इसी तरह से रेलवे की सेवा में  उनके पद के बारे में भी कहीं बताया जाता है स्टेशन मास्टर कहीं उन्होने अपनी रचनाओं में ही यह मार्मिक तथ्य रखा कि क्लर्की से आगे बढ़ना कठिन रहा. .. खैर .. नाम और काम जो भी रहा हो हमें व्यंग्यकार के पी ही भाए।

उन्हें तीनों माध्यमों में लोकप्रियता मिली – पत्र – पत्रिकाओं से पठन-पाठन में, श्रव्य माध्यम रेडियो और दृश्य – श्रव्य माध्यम दूरदर्शन.  इन तीनों माध्यमों में उनका नाम,  काम के साथ खुल कर आया जबकि सिनेमा में उनका नाम और काम सितारों की भीङ का हिस्सा बना।

उनकी रचनाओं के कुछ अंश मुझे हमेशा ही याद रहे. धर्मयुग में उनका लेख युवा पीढ़ी पर पढ़ा था जिसमें लङको द्वारा स्कूटर ( दुपहिया ) पर सङको पर घूमना और लङकियों को लुभाने के लिए तरह – तरह के काम करना जैसे अंग्रेज़ी के रोमांटिक नॉवेल अपने साथ रखना भले ही उसका शीर्षक भी उन्हें न मालूम हो,  वैसे लङकियॉ भी कम नहीं.  फेल होने पर कॉलेज जाने का शौक पूरा करने के लिए कुकिंग क्लासेस में जाती है और वहां भी आलू की टिक्की बनाना ही सीखती है….  बाल जगत की भी एक रचना याद आ रही है – रज़ाईचन्द दुलाईचन्द जो सर्दियों में देर तक रज़ाई में दुबके रहने वालों पर है जिसमें रज़ाई के भीतर नौकर लोटा भर चाय पहुँचाता है और पैर की छोटी उंगली के नाखून पर से भी रज़ाई हट जाए तो नौकर को आवाज़ लगाई जाती है।

शुद्ध हास्य और इससे जुङा व्यंग्य .. जिसकी कई बार मार्मिक प्रस्तुति भी दी. याद आ रहा है दूरदर्शन द्वारा नए साल के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम जिसमें उन्होने लोकप्रिय खेल क्रिकेट पर प्रस्तुति दी थी, चर्चा की थी क्रिकेट के छोटे परदे पर सीधे प्रसारण की लोकप्रियता की विशेषकर चुनिंदा अंशो के एक्शन रिप्ले दिखलाने के चलन की,  इसे उन्होनें जीवन संध्या में जीवन की गति के कुछ अंशों के एक्शन रिप्ले की बात कह कर मार्मिक बना दिया था … दूरदर्शन पर धारावाहिकों  का शुरूवाती दौर ही था तब उनका धारावाहिक प्रसारित हुआ था – बीबी नातियों वाली – जिसमें बीबी की मुख्य भूमिका में थी जानी – मानी अभिनेत्री प्रमोद बाला, हालांकि यह धारावाहिक पहले लखनऊ दूरदर्शन पर लोकप्रिय हो चुका था पर राष्ट्रीय स्तर पर अधिक लोकप्रिय न होने का कारण इसकी अनूठी शैली के संवाद ही रहे जो दूरदर्शन के आकर्षण में खिंचे सिर्फ सीधी – सादी हिन्दी जानने वाले कई दर्शकों की पहुँच से दूर रहे. वैसे इसकी बीबी और मिर्ज़ा साहब की नोंकझोंक ने कईयों का अच्छा मनोरंजन किया, साथ ही इसमें कई संदेश भी है जैसे शायरा बहू को मुशायरों में भी जाने नहीं देना और बेटी को क्रिकेट खेलते देख खुश होना, यहां बहू और बेटी मे अंतर नहीं करने की सीख दी।

समाज के विभिन्न वर्गों और विसंगतियों पर उन्होने बेबाक कलम चलाई. उनका एक लेख याद आ रहा है जिसमें उन्होने बताया कि समाज में जब किसी विषय पर ज़ोर – शोर से बहस होती है तब इस विषय पर बात करना एक फैशन सा बन जाता है,  विषय पर जानकारी हो या न हो बात करते है. एक ऐसा ही मुद्दा उभर कर आया था बोफोर्स – जिसे कुछ ने बोफोर्स कहा कुछ ने बुफोर्स,  विभिन्न वर्ग के लोग इस पर चर्चा करते.  वैसे यह शब्द ही कुछ ऐसा है जिसका अर्थ नहीं निकाला जा सकता, कुछ लोग इतना समझ पाए कि इसमें कुछ रिश्वत की बात है और विदेशी झंझट है. ऐसा ही है महिलाओं का एक समूह जिसमें एक भ्रष्ट अधिकारी की पत्नी से दूसरी महिला कहती है कि तुम लोग बोफोर्स खाते हो तब वह जवाब देती है कि  इतना आसान है क्या,  चार बोफोर्स खाते है तो एक  तन को लगता है .. बिना जाने कि बोफोर्स है क्या, ये खाने तक पहुँच गए … कमाल की पकङ और कमाल की शैली।

के पी सक्सेना का रूप वहाँ अपने पूरे उफान पर होता है जब वो रेडियो से जुङते है और फिर विविध भारती का हवामहल हो तो फिर बात ही क्या है. कई हास्य झलकियाँ सुनी,  उनकी अनूठी शैली इस गुदगुदाने वाले कार्यक्रम में अपने चरम पर रहती है,  अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शैली के आकर्षण पर रही झलकी – देसी चने विलायती दाँत,  ऑफिस में नए बॉस के आने और अपना रौब जमाने के लिए किए जाने वाले कुछ बदलावों पर लिखी रचना – नया अलीबाबा और चालीस चोंचलें …  अपनी ऐसी ही शब्दावली से अपने चाहने वालों के चेहरों पर मुस्कान लाते रहे और कभी – कभी मार्मिक मोङ देकर आँखें नम करते रहे … और एक वर्ष हुआ, केवल आँखों में नमी छोङ कर चले गए … सादर नमन !

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