लोकपर्व बतकम्मा

अमावस्या से लेकर दशहरा तक बतकम्मा मनाई जाती है और अष्टमी के दिन महाबतकम्मा होती है। बतकम्मा के फूलों के साथ गोबर का प्रयोग कर बनाई जाती है बतकम्मा इस तरह से –  ज़मीन पर गोबर की गोल सतह बनाई जाती है। इस पर बतकम्मा के फूल इस तरह गोलाकार रखे जाते है कि डंठल भीतर हो और फूल बाहर दिखते रहे। इन डंठलों पर फिर गोबर की सतह फिर फूल,  इस तरह से इच्छानुसार पांच से ग्यारह तक सतहें तैयार की जाती है। गोबर की हर सतह थोङी छोटी होती जाती है और ऊपर तक आते-आते बहुत छोटी हो जाती है जिस पर कुछ फूल रख कर उस पर दिया जलाया जाता है। कभी गौरी माँ की मूर्ति भी रखते है –

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गोबर सूख जाने से इस ढ़ांचे को उठा कर सिर पर रखा जा सकता है। कभी केवल ढ़ांचा और कभी थाली में इस ढ़ांचे को रखते है। इस तरह बतकम्मा तैयार है –

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महिलाएं साङी और लङकियां पारम्परिक परिधान –  लहंगा ओढ़नी में सिर पर बतकम्मा ले कर नदी, तालाब, झील  के किनारे इकट्ठी होती है। यहां होता है बतकम्मा आटा – तेलुगु में खेल को आटा कहते है। सभी लङकियां, महिलाएं मिल कर खुशी से बतकम्मा खेलती है जिसमें सबके बतकम्मा बीच में रखे जाते है और सभी चारों ओर घेरा बना कर गाती है और घेरे में एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए सामने, दाहिने और कभी ऊपर ताली बजाती है। यही नृत्य है। ऐसे ही घूमती है जब तक आनन्द आता है –

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बतकम्मा के कई लोक गीत है, यही गीत गाए जाते है। हर गीत में यह पंक्ति मुख्य रूप से होती है – बतकम्मा बतकम्मा उय्यालो  … उय्याला का अर्थ है झूला  …. मां से जीवन की सुरक्षा मांगते हुए खुशी से झूलना चाहते है। खेल समाप्त होने के बाद बतकम्मा को नदी, तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है –

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भोजन में जवारी और बाजरा दोनों के आटे को मिलाकर रोटी बनाई जाती है जिसके साथ गुङ रखा जाता है। इसी का भोग लगाते है और यही प्रसाद के रूप में खाते है। 

अमावस्या से लेकर दशहरा तक के दिनों में हर संध्या अङोस-पङोस की लङकियाँ, महिलाएं इकट्ठी होकर सामान्य बतकम्मा खेलती है जिसमें कोई विशेष साज-सज्जा नहीं होती, केवल बीच में छोटी, हल्की-फुल्की रंगोली बना कर ( रंगोली बनाने को यहाँ मोग्गू डालना कहते है ) उस पर गोबर का छोटा ढ़ेला और कुछ फूल रखे जाते है और घेरे में घूमते हुए गाते है –

 

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बतकम्मा शब्द का प्रयोग जिस दूसरे लोकप्रिय गीत में हुआ है वह है राजकुमार फिल्म का गीत – नाच रे मन बतकम्मा, यह नृत्य गीत ही है, यह कबीले का गीत है, नृत्य में सिर पर जलती मोमबत्तियां और आगे जंगली फूलो का प्रयोग है और नृत्य गीत माँ की आराधना में ही है।

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1 टिप्पणी »

  1. बतकम्मा की जानकारी और चित्रों के लिए आभार!

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