बतकम्मा – तेलंगाना का लोक पर्व

तेलंगाना के दो लोक पर्व है – बोनाल की चर्चा हम कर चुके है, आज चर्चा करते है बतकम्मा पर्व की।

वैसे बतकम्मा शब्द नया नहीं है। दो लोकप्रिय गीतों में बतकम्मा की चर्चा है जिनमें से एक है शतरंज फिल्म का गीत जिसमें तेलंगाना का माहौल उभरा है। बतकम्मा सहित यहाँ ग्रामीण क्षेत्र के प्रचलित नाम जैसे पुरूषों के लिए प्रचलित नाम – एन्कन्ना और हैदराबादी ज़बान और लहज़ा है। इसी गीत से सिने संगीत प्रेमियों को बतकम्मा के तेंलंगाना, विशेष कर हैदराबाद से जुङे होने की बात अवश्य समझ में आई होगी पर लोकपर्व की जानकारी शायद नहीं मिल पाई होगी।

बतकम्मा पंडुगा दशहरा के समय मनाया जाता है। पंडुगा का अर्थ है त्यौहार। वास्तव में यह शब्द है – बतुकम्मा … यह दो शब्दों की संधि है – बतुक + अम्मा … बतुक का अर्थ है जीवन और अम्मा शब्द देवी माँ के लिए है … कुल अर्थ हुआ जीवन दायिनी या जीवन की रक्षा करने वाली माँ … बतुकम्मा को अक्सर बतकम्मा ही कहा जाता है।

यह त्यौहार वर्षा के मौसम की समाप्ति पर यानि भाद्रपद मास की समाप्ति की अमावस से शुरू होता है जिसे बङी अमावस कहते है। यही दिन पितृ पक्ष की समाप्ति का होता है। अगले दिन से शुरू होती है नवरात्रि और नौ दिन के बाद दशहरा। बतकम्मा अमावस से दशहरा तक मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से गाँवों में धूमधाम से मनाया जाता है। बारिश की समाप्ति के बाद सभी देवी माँ को जीवन की रक्षा के लिए धन्यवाद देते है और उत्सव मनाते है। गाँवों में बारिश में जीवन बहुत ही कठिन होता है। चूंकि सभी गांवों में मन्दिर नहीं है, मन्दिर के लिए दूर-दूर तक जाना पङता है इसी से इस पर्व में मन्दिर, मूर्ति पूजा का महत्व नहीं है। शहर में यह पर्व मुख्य रूप से उन्हीं के द्वारा मनाया जाता है जो गाँवों से आकर बसे है और शहर से लगे गाँवों द्वारा मनाए जाने से शहर में भी इसकी धूम होती है पर सभी शहरी नहीं मनाते लेकिन तेलंगाना की संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में इसकी मान्यता है।

अब हम बताते है कि बतकम्मा पंडुगा कैसे मनायी जाती है। बरसात में जंगली पौधे उग आते है। ऐसे ही जंगली फूल माने जाते है सिलेशिया के फूल। मद्धम सफेद रंग के लम्बोतरे आकार के फूल जो लम्बे पतले हरे डंठल से लगे होते है जिन्हे सिलेशिया के फूल कहा जाता है और इन्हें जंगली फूल माना जाता है, इन्हीं फूलों से बतकम्मा मनाई जाती है इसीलिए तेलंगाना में इन्हें बतकम्मा के फूल ही कहते है –

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बहुत पहले सिर्फ यह एक ही तरह के फूल उपयोग किए जाते थे लेकिन आगे से इन फूलों को चटक रंगों – लाल, गहरे गुलाबी, हरे, नीले, पीले रंगों में रंग कर रंगबिरंगे फूलों का प्रयोग किया जा रहा है। यह रंग कच्चे होते है और इन्हें कच्चे रंगों में ही रंगा जाता है। अगर गीले हाथ से पकङ ले तो रंग हाथ में लग जाता है –

 

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अब गांवों में भी सुविधाएं बढ़ गई है जिससे गेंदे, सावंती ( श्रावंती ) और रंगीन सावंती के फूलों का प्रयोग किया जा रहा है जिन्हें बन्ती पूवू ( गेंदा फूल ) चामन्ती पूवू कहा जाता है।

अगले चिट्ठे में इन फूलों से बतकम्मा बनाना और खेलना यानि बतकम्मा पर्व का उल्लास …..

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