स्मृति शेष – बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

आज राष्ट्रगीत के रचयिता और सुविख्यात साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्मदिवस हैं। आज ही के दिन वर्ष 1838 में उनका जन्म हुआ था।
बंकिम बाबू  नाम से लोकप्रिय बंकिम चन्द्र जी का पहला उपन्यास दुर्गेशनंदिनी है जो 1865 में लिखा गया, यह बंगला भाषा के गद्य साहित्य का शुरूवाती दौर था।  बंकिम बाबू को बंगला का पहला लेखक भी माना जाता है। इस उपन्यास पर आधारित  हिन्दी में फिल्म भी बनी।
स्वाधीनता के लिए 1857 की क्रान्ति की असफलता के बाद अंग्रेज़ देशवासियों को गॉड सेव द क्वीन गाने पर विवश कर रहे थे। इससे बंकिम बाबू के मन में संवेदना जागी जिससे 7 नवम्बर 1875 के दिन वन्देमातरम गीत की रचना हुई और उन्ही के द्वारा संपादित बंगदर्शन पत्रिका में यह गीत प्रकाशित हुआ।  तभी से यह गीत राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ गया।
बंकिम बाबू ने 1882 में  आनंद मठ नाम से उपन्यास लिखा।  यह उपन्यास बंगाल के भीषण अकाल को आधार बना कर लिखा गया। उस दौर के बारे में लेखक ने उपन्यास में लिखा –
” 1773 में बंगाल प्रदेश अंगरेजों के शासनाधीन नहीं हुआ था। अंगरेज उस समय बंगाल के दीवान ही थे। उस समय लगान की वसूली का भार अंगरेजों पर था, और कुल सम्पत्ति की रक्षा का भार मीरजाफर पर था। अत: बंगाल का कर अंगरेजों को प्राप्य था, लेकिन शासन का भार नवाब पर था। ”   …..मीरजाफर का प्रबंध ठीक नही था। 1775 में वर्षा न होने से भीषण अकाल पडा। लेखक ने लिखा – ” 1774 में फसल अच्छी नहीं हुई, अत: ग्यारह सौ पचहत्तर में अकाल आ पड़ा लेकिन इस पर भी शासकों ने पैसा-पैसा, कौड़ी-कौड़ी वसूल कर ली। दरिद्र जनता ने कौड़ी-कौड़ी करके मालगुजारी अदा कर दिन में एक ही बार भोजन किया। ग्यारह सौ पचहत्तर में अच्छी वर्षा हुई। लेकिन क्वार-कार्तिक में एक बूंद भी बरसात न हुई। खेतों में धान के पौधे सूखकर खंखड़ हो गए। जिसके दो-एक बीघे में धान हुआ भी तो राजा ने अपनी सेना के लिए उसे खरीद लिया, जनता भोजन पा न सकी। चैत में जो कुछ फसल हुई वह किसी के एक ग्रास भर को भी न हुई। लेकिन मालगुजारी के अफसर मुहम्मद रजा खां ने मन में सोचा कि यही समय है, मेरे तपने का। एकदम उसने दश प्रतिशत मालगुजारी बढ़ा दी। बंगाल में घर-घर कोहराम मच गया। गो, बैल, हल बेचे गए, बीज के लिए संचित अन्न खा गए, घर-बार बेचा, खेती-बारी बेची। इसके बाद लोगों ने लड़कियां बेचना शुरू किया, फिर लड़के बेचे जाने लगे, इसके बाद गृहलक्ष्मियो का विक्रय प्रारंभ हुआ। लेकिन इसके बाद, लड़की, लड़के औरतें कौन खरीदता ?   बेचना सब चाहते थे लेकिन खरीददार कोई नहीं। खाद्य के अभाव में लोग पेड़ों के पत्ते खाने लगे, घास खाना शुरू किया, नरम टहनियां खाने लगे। अखाद्य खाकर, उपवास और रोग से जर्जर हो मरने लगे। “
ऐसे में कुछ लोगो ने एक दल बनाया और जंगल से अपनी गतिविधियाँ करने लगे। इस दल का नेता भावानन्द है। शासक की अयोग्यता और कुप्रबंध पर भावानन्द कहता है –
” किस देश के मनुष्य भोजन के अभाव में घास खा रहे हैं ?   किस देश के मनुष्य स्यार, कुत्ते और मुर्दे खाते है ?  हर देश का राजा अपनी प्रजा की दशा का, भरण-पोषण का ख्याल रखता है “
इसी से भावानन्द और उसके साथी सरकारी खज़ाना लूट कर जनता की ज़रूरते पूरी करते है। स्वाभाविक है कि अकाल की इस स्थिति में अन्न के दाने – दाने के लिए तरसने की स्थिति में अन्न उपजाने वाली  अपनी धरती का महत्त्व बहुत अधिक लगने लगता।  भवानंद ने कहा –
” हमलोग दूसरी किसी मां को नहीं मानते। जन्मभूमि ही हमारी जननी है- हमारे न मां है, न पिता है, न भाई है- कुछ नहीं है, स्त्री भी नहीं, घर भी नहीं, मकान भी नहीं, हमारी अगर कोई है तो वही सुजला, सुफला, मलयजसमीरण-शीतला, शस्यश्यामला… “
मुख्य रूप से  इसी स्थान  पर उपन्यास में बंकिम बाबू ने वन्देमातरम गीत रखा जो इस स्थिति के लिए पूरी तरह से उचित था। उपन्यास में जो भी संघर्ष रहा उसकी जड में भूख ही रही जिससे संघर्ष के दौरान यही गीत उभरता रहा। तभी से क्रांतिवीरों ने वन्देमातरम को नारे के रूप में अपनाया।   7 सितम्बर 1896 को कलकत्ता में आयोजित कॉँग्रेस के अधिवेशन में पहली बार वन्देमातरम गाया गया जिसे रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया जिसके लिए संगीत भी उन्होंने ही तैयार किया।  इस गीत के पहले दों पद संस्कृत में हैं और शेष पद बंग्ला भाषा में हैं। 1906 में यह गीत देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया।  इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इस गीत पर पाबंदी भी लगाई,  इसके बावजूद क्रांतिवीर इसे गाते रहे। विभिन्न संगीत घरानों के संगीतकारों ने इस गीत को स्वरबद्ध किया। 1928 में भजन गायक विष्णु पंडित ने इसे राग सारंग में गाया,  उस्ताद कृष्ण राव ने इस गीत को राग झिंझोटी में तैयार किया, 1935 में केशवराव भोले ने इसे भारतीय जनता के लिए प्रार्थना के रूप में तैयार किया। 28.10.1937  को कलकत्ता में कॉँग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के पहले दों पद ही गाए जाए।  24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जन गण मन को राष्ट्र गान  और  वन्देमातरम  को  राष्ट्र गीत का दर्जा दिए जाने की घोषणा की.
यहाँ हम बता दे कि आनंदमठ उपन्यास पर भी हिन्दी में इसी नाम से फिल्म बनी और उसमे वन्देमातरम गीत भी रखा गया .  बंकिम बाबू के साहित्य पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
भारत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
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