स्मृति शेष – फणीश्वर नाथ रेणु

आज हिन्दी जगत के सुविख्यात कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मदिन हैं।

आज ही के दिन वर्ष 1921 में रेणु जी का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले में हुआ था। अपनी इस जन्म स्थली के सहारे उपन्यास के क्षेत्र में रेणु जी ने विशेष योगदान दिया। यूं तो रेणु जी ने कविताएं भी लिखी लेकिन उनकी पहचान कहानीकार के रूप में हैं और साहित्य जगत में उपन्यासकार के रूप में उनका विशिष्ट स्थान हैं। आंचलिक उपन्यास की शुरूवात रेणु जी ने ही की। यहाँ मैं बता दूं कि आंचलिक उपन्यास क्या होते हैं ……

अंचल का अर्थ होता हैं एक छोटा सा क्षेत्र। जब किसी रचना में कहानी किसी एक क्षेत्र की हो और पूरी कथा में उस क्षेत्र का बारीकी से विवरण दिया गया हो जैसे उस क्षेत्र का जन-जीवन, वहां के आचार-विचार, वहां का समाज, वातावरण, लोक संस्कृति, त्यौहार-पर्व, जीवन शैली सभी का चित्रण हो तो उस रचना को उस अंचल ( क्षेत्र विशेष) की रचना या आंचलिक रचना कहते हैं। इस तरह की रचना को पढ़ कर पाठक उस क्षेत्र की संस्कृति से पूरी तरह परिचित होता हैं। यह कार्य पहली बार हिन्दी जगत में रेणु जी ने किया, हालांकि इससे पहले भी कुछ रचनाएं आई थी पर इतनी बारीकी से चित्रण नहीं था।

पहली बार बारीकी से अपनी जन्मस्थली पूर्णिया जिले का चित्रण किया अपने पहले उपन्यास मैला आँचल में। इस उपन्यास से न केवल हिन्दी जगत में रेणु जी को ख्याति मिली बल्कि उपन्यास लेखन की इस शैली को अन्य लेखक अपनाने लगे। मैला आँचल के बाद दूसरा उपन्यास लिखा परती परिकथा जो पाठको को पहले उपन्यास से ज्यादा भाया। इसमे लेखनी और बारीक हुई, पाठको को वातावरण जीवंत लगे इसके लिए परिंदों की बोलियों को तक लिपिबद्ध किया। ये उपन्यास लोकप्रिय हुए आंचलिकता के कारण ही जबकि कथावस्तु का महत्व अधिक नहीं रहा।

रेणु जी का यह विशेष गुण जन-साधारण तक भी पहुँचा फिल्म के माध्यम से … उत्तर भारतीय संस्कृति, खासकर जिले, गाँव की जीवन शैली लिए राजकपूर और वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी क़सम …..यह फिल्म रेणु जी की कहानी मारे गए गुलफाम पर बनाई गई हैं।

जैसा कि मैंने पहले ही बताया इस तरह की रचनाओं में कहानी का महत्त्व कम, आंचलिकता यानि क्षेत्र की संस्कृति दर्शाने का महत्त्व अधिक होता है इसीसे फिल्म को कहानी के अभाव में सफलता नही मिली पर उत्तर भारतीय संस्कृति के, लोकगीत की शैली के गीतों को बहुत लोकप्रियता मिली। रेणु जी के साहित्य पर कुछ और चर्चा फिर कभी ……

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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