नहीं रहे सारा आकाश रचने वाले राजेन्द्र यादव

हिन्दी जगत के सुविख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव हमारे बीच नहीं रहे।
आज से दो महीने पहले 28 अगस्त को फेसबुक के मंच से मैनें उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी थी. .. क्या पता था कि यह शुभकामना संदेश ठीक दो महीने बाद  इसी तारीक को यूं ढह जाएगा …
वर्ष 1929  में आगरा में राजेन्द्र यादव जी का जन्म हुआ था। कथाकार होने के आलावा राजेन्द्र यादव जी का दूसरा रूप हिन्दी जगत विशेषकर साहित्य संसार के लिए महत्वपूर्ण हैं – यह है सम्पादक का रूप – हंस पत्रिका के संपादक। प्रेमचंद द्वारा शुरू की गई यह पत्रिका लोकप्रियता की सीढियां चढने के बाद बंद हो चुकी थी जिसे बाद में 1986 में राजेन्द्र यादव जी ने शुरू किया जो वास्तव में साहित्य क्षुधा के लिए लहर बन कर आई। पत्रिका का शीर्षक न बदल कर राजेन्द्र यादव जी ने प्रेमचंद को आज की पीढी से भी जोडे रखा…..  आजकल यह पत्रिका मासिक हैं जिसमे अधिकतर कहानियां होती हैं। यह पत्रिका जाल (नेट) पर भी उपलब्ध है।
राजेन्द्र यादव जी का चर्चित उपन्यास है – सारा आकाश … यह एक मध्यम वर्ग की कहानी है। नायक समर पढ – लिख कर कुछ बनना चाहता है लेकिन परम्परावादी परिवार उसकी शादी करवा देता है। समर न तो शादी के लिए तैयार है और न ही खुल कर विरोध कर पा रहा है और परिणाम यही होता है कि उसकी परिवार में किसी से निभ नही पाती  –
” यह शादी मेरे उच्च आदर्शो और महत्वाकांक्षाओ के लिए ज़हर थी, यह जानते हुए भी कही यह आशा थी कि चलो लडकी पढी लिखी और समझदार है। हम लोग एक दूसरे को समझने की कोशिश करेगे, बनने में मदद देगे। “
पत्नी प्रभा मैट्रिक पास होने से कुछ खुले विचारों की है और पत्नी को सहचरी मानती है दासी नहीं तभी तो पति के साथ प्रथम मिलन में प्रणाम वगैरह नही कर पाती जिससे समर को लगता है कि वह बहुत घमण्डी है। यहाँ एक तरह से दोनों का स्वाभिमान है  जिससे दोनों एक – दूसरे से बायाचीत ही नही कर पाते और दिन गुज़रने लगते है। परिवार में और भी समस्याएँ हैं, बहन मुन्नी पति से अलग हो कर आ गई, बड़ी बहू भी गर्भवती है, प्रभा भी दहेज़ में कुछ नही लाती जिससे आर्थिक तंगी भी है, फिर प्रभा रूढ़िवादी न होने से घूंघट का भी ध्यान नही रख पाती, हर तीखी बात पर चुप भी नहीं रह पाती कभी – कभार जवाब भी दे देती है और सबसे बडी बात कभी समर ने इन समस्याओं को सुलझाने की पहल नहीं की। सभी जान गए कि समर और प्रभा में बोलचाल नही,  लेकिन समर बजाय खुद आगे बढ़ने के अपना स्वाभिमान बनाए रखने के नाम पर स्थितियों को उलझाता ही रहा और तनाव बढता ही रहा –
” कभी – कभी मैं सिहर उठता हूँ। सारी ज़िंदगी इस घमंडी लडकी के साथ कैसे कटेगी ?  हमारा और उसका भविष्य क्या होने जा रहा है ? और फिर यह नए सिरे से उठने वाली दूसरी शादी की बात ? “
लेकिन ऎसी नौबत नही आती है, मुन्नी को उसका पति आ कर ले जाता है, समर को भी अपनी गलतियों का अहसास होने लगता है और महिलाओं की आपसी छीटाकशी से व्यथित प्रभा के सामने आखिर एक दिन ऐसी भावुक स्थिति आती है कि लम्बे अन्तराल के बाद दोनों आपस में बोलने लगते है।
राजेन्द्र यादव जी ने प्रभा का चरित्र बहुत स्वाभाविक गढा है। लड़कियां पढ – लिख कर अब केवल घरेलु नही रही पर साथ ही घरेलु महिलाओं के साथ निभाना कठिन होता जाता है।
इस उपन्यास पर  ख्यात फिल्मकार बासु चटर्जी ने इसी नाम से फिल्म बनाई  –  सारा आकाश ….
हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
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