बोनालू उत्सव

दो दिन के बोनालू उत्सव में सोमवार को जुलूस निकलता हैं।

दिन भर जुलूस की तैयारी की जाती हैं। माता का ऊंचा झूला तैयार किया जाता हैं। वैसे कारीगर दो सप्ताह पहले से ही झूला तैयार करने में जुट जाते हैं। रंग-बिरंगे कागजों से बेत का झूला तैयार किया जाता हैं –

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इस जुलूस का अर्थ हैं माता को उनके ससुराल खुशी-खुशी विदा करना। जाहिर हैं विदा करने उनका भाई ही जाएगा। भाई का नाम हैं पोतराजू जिसे पोतराज भी कहते हैं। पोतराज न सिर्फ भाई हैं बल्कि माँ का अंगरक्षक भी हैं।

मोहल्ले के किसी बलिष्ठ व्यक्ति को पोतराजू बनाया जाता हैं। आमतौर पर माता के किसी एक सेवक को ही मंदिर की कमेटी हर साल पोतराजू बनाती हैं पर अक्सर अन्य व्यक्तियों को भी पोतराजू बनने का अवसर मिलता हैं। पोतराज केवल अधोवस्त्र धारण करता हैं। हाथ में कोड़ा होता हैं। मुंह में दोनों ओर नीम्बू होने से मुंह सूजा लगता हैं।

दोपहर बाद शाम शुरू होते ही चार – साढे चार  बजे  जुलूस मंदिर से निकलता हैं। जुलूस निकलने से पहले एक ख़ास कार्यक्रम होता हैं। माना जाता हैं कि माँ मैसम्मा की जिस महिला पर कृपा होती हैं उसके शरीर में माँ प्रवेश करती हैं। एकत्रित भक्त महिलाओं में से किसी एक पर यह कृपा होती हैं। कुछ देर के लिए उस महिला को माँ का अवतार मान लिया जाता हैं और उससे कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं। ये प्रश्न शहर और राज्य से जुड़े होते हैं जैसे इस बार बारिश अच्छी होगी क्या, अनाज पैदावार कैसी रहेगी, राज्य में शान्ति रहेगी, क्या कोई तनाव पूर्ण स्थिति बनेगी आदि। सभी प्रश्नों का वह जवाब देती जाती हैं और उसे देवी माँ का उत्तर माना जाता हैं। कुछ देर बाद महिला शांत हो जाती हैं तो माना जाता हैं देवी माँ प्रस्थान कर गई। अगर इन बातों में से अधिकतर बाते सच निकले तो यह माना जाता हैं कि माँ मैसम्मा की उस महिला पर अधिक कृपा दृष्टि रही और अगर अधिक बाते सच न हुई तो यह माना जाता हैं कि उस महिला पर माँ की कृपा दृष्टि अधिक नही हैं। यह सवाल जवाब मंदिर में माइक्रोफोन पर होते हैं ताकि लाउडस्पीकर से बाहर ज्यादा लोंग सुन सके।

इसके बाद जुलूस निकलता हैं। जुलूस में झूला होता हैं जिसे सेवक उठा कर चलते हैं –

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जुलूस में बल्लम गल्ला भी साथ ले चलते हैं। पोतराज जुलूस में मस्ती में विचरता हैं। उसे खुशी हैं कि सब स्वस्थ प्रसन्न हैं और अब वह अपनी बहन को सुरक्षित ससुराल छोड़ने जा रहा हैं। बीच-बीच में वह सड़क पर कोड़े मारता हैं ताकि कोई अनिष्ट पास न फटके।

नाचते-गाते जुलूस  नदी तक संध्या होने पर छह बजे तक पहुँचता है।  नदी किनारे झूला रख दिया जाता हैं। नदी में दीपक छोड़े जाते हैं ताकि आगे की राह में बहन यानि मैसम्मा को आगे जाने में दिक्कत न हो।

अन्धेरा होने पर जुलूस की वापसी होती हैं। वापसी में बल्लम गल्ला सड़क पर उछाला जाता हैं और साथ ही जोर से हो – हुव्वा आवाजे की जाती हैं। यह माना जाता हैं कि अँधेरे में इन आवाजों को सुनकर प्रेतात्माएं आएगी और बल्लम गल्ला यानि भोजन उठा ले जाएगी। भोजन पाकर प्रेतात्माएं तृप्त हो जाएगी और कोई अनिष्ट न करेगी। इस दृश्य को आम नागरिक को देखने की मनाही हैं। कहा जाता हैं कि पहले जुलूस जाने के बाद अन्धेरा होते ही लोंग घरों में दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर लेते थे।

आजकल जुलूस की इस तरह से वापसी नही होती। नदी किनारे से ही लोंग बिखर कर लौट आते हैं और बल्लम गल्ला भी नही उछाला जाता। केवल जुलूस वापसी को छोड़ कर पूरा उत्सव आज भी पहले की तरह ही हैं।

तेलंगाना में कुल दो लोकपर्व मनाए जाते हैं, आषाढ़ मास में बोनालू और दशहरा के समय बतकम्मा जिसकी चर्चा फिर कभी….

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