तेलंगाना का लोकपर्व – बोनालु

तेलंगाना क्षेत्र यानि हैदराबाद और उसके आस-पास के जिलों का लोकपर्व हैं - बोनालु बोनालु को हैदराबादी भाषा में बोनाल या ज्यादातर भोनाल कहते हैं। इसे आषाढ़ और श्रावण मास में मनाया जाता है – आषाढ़ मास आधा बीतने के बाद यह पर्व शुरू होता है और एक महीने तक यानि श्रावण मास आधा बीतने पर समाप्त होता हैं। माना जाता हैं कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले तेलंगाना में बारिश का मौसम शुरू होते ही आषाढ़ मास में महामारी फैल गई थी। इसकी चपेट में आ कर कई लोगों की जान गई, पशु पक्षी मवेशियों की तो बात ही क्या। बहुत तबाही आयी। कोई दवा काम न आई। आखिर वही हुआ जो आमतौर पर ऐसे हालात में होता हैं, सभी ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। क्या राजा और क्या प्रजा सभी के हाथ दुआ में ऊपर उठ गए और शुरू हुआ पूजा-पाठ का दौर। बाद में धीरे-धीरे सब ठीक हुआ पर सदमे से लोंग उबर न पाए। इसीसे  सिलसिला चला पूजा-पाठ का और शुरू हुआ पर्व – बोनालु बोनालु शब्द बोनम से बना हैं। बोनम भोजनम शब्द का बिगड़ा रूप हैं। भोजनालु से बोनालु शब्द बना। पर्व  में  चारो दिशाओं में पूजा करने के उद्येश्य से  मास के चार सप्ताह एक के बाद एक चारो दिशाओं के चार प्रमुख स्थानों पर बड़े पैमाने पर पूजा होती हैं – गोलकुंडा, सिकंदराबाद, लाल दरवाजा, पुराना शहर। पहले सप्ताह गोलकुंडा में पूजा होती हैं। गोलकुंडा किले में इस स्थिति के बाद काली माता का मंदिर बनवाया गया, यहीं पर शासकों द्वारा पहली पूजा होती थी। यह क्रम आज भी बना हैं और यही से उत्सव की शुरूवात होती हैं। इसके बाद सिकंदराबाद के मंदिर में उत्सव मनाया जाता हैं फिर हैदराबाद के पुराने शहर में दो अलग-अलग मंदिरों में लाल दरवाजा और पुराने शहर के मंदिर में बोनालु मनाया जाता हैं। हालांकि लाल दरवाजा भी पुराने शहर का ही हिस्सा हैं। इस तरह चार सप्ताह चार मंदिरों में उत्सव होता हैं साथ ही गाँवों जिलों में भी बोनालु मनाया जाता हैं। उत्सव मुख्य रूप से दो दिन मनाया जाता हैं लेकिन पूजा तीन दिन पहले गुरूवार से शुरू होती है । रविवार को मंदिर में काली माता की बडी समापन  पूजा होती हैं। यहाँ काली माँ को मैसम्मा के रूप में पूजा जाता हैं। दिन भर पूजा होती हैं। सोमवार को शाम में जुलूस निकलता हैं जिसे जत्रा या जात्रा भी कहते है। रविवार को दिन भर पूजा होती हैं। भक्तों का मंदिर में तांता लगा रहता हैं। पूजा की सामग्री घर से तैयार कर लाई जाती हैं। सामग्री में पके चावल होते हैं जिसमे नमक और काली मिर्च के दाने होते हैं। चावल को एक कलश में रखा जाता हैं। पहले कलश पीतल के होते थे आजकल स्टील के होते हैं जिसे हल्दी कुमकुम से सजाया जाता है । चावल के ऊपर नीम के पत्ते और हल्दी की गाठियाँ होती हैं और ऊपर दीपक जलता है । हम यहाँ बता दे कि  चावल और नमक मुख्य आहार है और शेष  चीजों में औषधि गुण हैं – Photo0330 महिलाएं नई साड़ी पहन कर, पांवों में हल्दी लगाकर इस कलश को सिर पर रख कर मंदिर आती हैं – Photo0327 इस कलश को बोनम कहते हैं। इस बोनम से आधे चावल महिलाओं को प्रसाद के रूप में दे दिए जाते हैं,  आधे चावल मंदिर में रखे जाते हैं और इस तरह चावल का ढेर लग जाता हैं जिसे बल्लम गल्ला कहते हैं। भक्तों द्वारा लाए गए नीम के पत्तों को मंदिर के द्वार पर रखा जाता हैं। माता की मूर्ति के श्रृंगार में विशेष रूप से निम्बुओं की माला पहनाई जाती हैं। सोमवार को जुलूस निकलता हैं जिसके बारे में अगले चिट्ठे में बताएंगे….

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1 टिप्पणी »

  1. बोनालु पर्व की रोचक जानकारी के लिए आभार

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