फतेहपुर सीकरी और सलीम चिश्ती की दरगाह

ताज से लगभग 36 कि.मी. की दूरी पर फतेहपुर सीकरी। वास्तव में यहाँ सलीम चिश्ती की दरगाह है।
 
ऐतिहासिक कहानी कुछ यूं हैं – अकबर को अपनी तीन बेगमो से भी कोई औलाद न हुई। एक दिन उन्हें सपना आया कि सलीम चिश्ती की दरगाह पर मन्नत माँगने से औलाद होगी। इसके बाद जोधा बाई से विवाह हुआ और सलीम का जन्म।
 
मुख्य द्वार से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पैदल या यहाँ उपलब्ध गाडी से तय कर मुख्य इमारत में पहुंचा जाता है। यह है मुख्य इमारत फतेहपुर सीकरी –
 
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सामने से पचास सीढियां है और किनारे से थोडा चढाई और इक्का-दुक्का सीढियां फिर लगातार लगभग तीस सीढियां है। सीढियां सकरी और सीध में बनी होने से चढते और उतरते समय थोडा डर लगता हैं।
 
ऊपर थोडा खुला भाग है जहां छोटी दुकाने सजी है। भीतर जाने के मुख्य द्वार पर दोनों ओर सुन्दर नक्काशी है और बेल-बूटो की तरह कुरान की आयते लिखी है। छत ऊंची है और उस पर भी नक्काशी हैं –
 
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यही शिल्पकारी भीतर भी है। भीतर एक किनारे छोटे – छोटे किवाड़ से सजे क्रम से कक्ष है जो पहले जोधा बाई का महल था और बाद में यहाँ दुकाने सजा कराती थी। अब कुछ नही हैं –
 
 
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पूरी इमारत लाल है और सामने खुले आँगन में बीच में है सफ़ेद संगमरमर की सलीम चिश्ती की दरगाह –
 
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यहाँ भी चादर चढाने का रिवाज़ है। चादरे बेचते कुछ लोग दरगाह के आस-पास ही मिलेगे। भीतर आप अपने साथ जितने भी लोग है, सबके साथ मिलकर अपने हाथ से  समाधि पर चादर चढा ( बिछा ) सकते है जिसके लिए वहां के कर्मचारी मदद करते हैं। यही एक खिडकी है जहां चाहो तो मन्नत का धागा बाँध सकते है। मन्नत पूरी होने पर धागा खोलने यहाँ आने की ज़रुरत भी नहीं, बताया गया कि अपने घर में ही दो गरीबो को खाना खिलाना ही पर्याप्त है।
 
दरगाह के बाहर सलीम चिश्ती साहब के खानदान वालो की समाधियाँ है जो ऊपर से तीसरी तस्वीर में आप देख सकते है।  बाहरी ओर पुरूषों की और भीतरी ओर महिलाओं की। इसी भीतरी भाग को ज़नान खाना ( महिलाओं का कक्ष ) कहते है। यही किनारे पर दीवार में नीचे छोटा रोशनदान सा दिखता है, यहाँ हाथ लगाने पर बहुत ठण्डा लगा,  पीछे खुला भाग है, कहा जाता है कि यह हर समय  ठंडा रहता है और इसी के पास है अनार कलि की सुरंग –
 
 
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पांच – छह सीढिया नीचे उतरने पर नीचे द्वार है जो बंद रहता है। अनार कलि को दीवार में चिनवाने के बाद इसी सुरंग से बाहर निकाला गया था फिर उन्हें अपनी माँ के साथ शहर की सीमा पर एक घर में उमरभर नज़रबंद रखा था। यह सुरंग के पास की ठंडी दीवार लगता है वही स्थान है जहां चिनवाया गया। सिर्फ सुरंग ही सबकी नज़र में आती है वरना अनार कलि को उपेक्षित ही रखा गया। मौत से भी बढ कर सजा दी गई उसे सुरंग से निकाल कर जीवन भर नज़र बंद रख कर जबकि सलीम की याददाश्त समाप्त कर उसे नया जीवन दिया गया ..और उनके प्यार का जज्बा ही तो है ताज जो ज़माने भर में मोहब्बत की मिसाल है …  खैर ..
 
यह देखने के बाद हमने ताज का एक और चक्कर लगाया और हैदराबाद लौट आए ….
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