नुमाइश

पारा जैसे जैसे लुढ़कता जाता है लोग उत्सव की प्रतीक्षा करते हैं यानि क्रिसमस की और इस समय विश्व भर में इंतज़ार रहता हैं नए साल का, लेकिन हम  हैदराबादी इस समय एक तीसरी चीज़ का भी इंतज़ार करते हैं, वह हैं – नुमाइश

आजकल यहाँ लोग नुमाइश को अधिकतर एक्जीबिशन कहने लगे है, कुछ बाहर से आकर बसे लोग इंडस्ट्रियल एक्जीबिशन कहते हैं, हिन्दी लोग प्रदर्शनी भी कहते हैं पर हैदराबादी संस्कृति में नुमाइश ही कहा जाता हैं। हैदराबादी संस्कृति का अंग हैं नुमाइश जिसकी शुरूवात 1938  में हुई जब यह हैदराबाद रियासत थी। निजाम सरकार के शासक मीर उस्मान अली खाँ  ने इसकी बहुत अच्छे उद्येश्य से शुरूवात की थी। तब से लेकर आज तक इसका उद्येश्य और अवधि बदली नहीं हैं। अवधि हैं 45 दिन, नए साल के पहले दिन 1 जनवरी से 15 फरवरी तक। पहले 40 दिन की अवधि हुआ करती थी फिर दो-तीन दिन बढाया जाता था लेकिन अब स्थयी रूप से 45 दिन ही हैं।

इस वर्ष 2013 में 1 जनवरी  से शुरू नुमाइश 73 वीं नुमाइश हैं, जी हाँ 73 साल से लगातार 45 दिन का आयोजन शायद ही विश्व में कही हो जिस पर हम हैदराबादियों को गर्व हैं।

शहर का सबसे बडा मैदान नामपल्ली रेलवे स्टेशन के पास हैं, यही नुमाइश का स्थल हैं इसीसे इसे नुमाइश मैदान या एक्जीबिशन ग्राउण्ड कहते हैं। यह मैदान ही हैं, यहाँ टैंटो से दुकाने बनाई जाती हैं। यह औद्योगिक नुमाइश ही हैं जिसके प्रवेश द्वार पर संख्या के साथ यह अंग्रजी में लिखा होता हैं जैसे इस बार लिखा हैं – 73 इंडस्ट्रियल एक्जीबिशन

नुमाइश की व्यवस्था के लिए यहाँ बाकायदा एक समिति हैं जो एक-दो महीने पहले से ही अपना काम शुरू कर देती हैं जैसे निविदाएं निकालना और आवेदन के अनुसार स्टाल ( दुकानों ) के लिए जगह आबंटित करना। जैसे कि इसका उद्येश्य है अपने माल को यहाँ दिखाना और बेचना, देश भर से व्यापारियों को आमंत्रित  किया जाता हैं। निजाम सरकार यही चाहती थी कि देशभर के व्यापारी एक जगह इकठ्ठा होकर अपने सामान की प्रदर्शनी लगाए और हैदराबादी इन्हें देखे और खरीददारी करे। आजकल चीन जैसे देशो की क्राकरी मशहूर होने से विदेशो से भी व्यापारी आ रहे हैं।

विभिन्न राज्यों के व्यापारी अपना विशेष  माल लाते हैं जैसे मुम्बई से रेडीमेड कपडे, लखनऊ का चिकन, कश्मीर का सिल्क और सूखे मेवे , कलकता काटन आदि। यहाँ हर चीज़ की दुकाने होती हैं, कपडो के आलावा, इलेक्ट्रानिक्स, प्रसाधन,  घरेलु उपयोगी सभी। खाने-पीने की दुकाने हैं। बच्चो के लिए झूले आदि हैं। इसका पूरा समय यानि दोपहर 3 बजे से लेकर रात के 12 बजे तक बहुत भीड रहती हैं। एक रेडियो स्टेशन भी स्थापित हैं जहां से खोए हुए लोगो की जानकारी दी जाती हैं, अगर कोई खो जाए तो उसे सीधे रेडियो स्टेशन पहुँचा दिया जाता हैं। यहाँ से लोकप्रिय हिन्दी फिल्मो के गीत सुनवाए जाते हैं जिससे घूमने का मज़ा बढ जाता हैं। कुछ विज्ञापन भी प्रसारित होते हैं।  इन सभी कामो के लिए और दुकानों के लिए भी और टिकट खिडकी के लिए कुछ लोगो को रोज़गार मिल जाता हैं। टिकट खिड़कियाँ 5-6 हैं ताकि लोगो को अधिक इंतज़ार न करना पडे। टिकट आजकल बच्चो के लिए 5 और बडो के लिए 10 रूपए है और रविवार को 20 रूपए हैं। तीन साल तक के बच्चो को निशुल्क हैं।

हमेशा से यहाँ 1000 से अधिक दुकाने होती हैं। बहुत पहले एक खेल हुआ करता था जिसमे रात 8 बजे एक व्यक्ति अपने शरीर पर कैरोसिन डाल कर आग लगा कर नीचे पानी में कूद जाता था। अब इसे बंद कर दिया गया हैं। अब एक जगह स्टेज लगा कर सांसकृतिक कार्यक्रम होते हैं। इस तरह से समय के साथ हल्का बदलाव आ रहा हैं। पहले हैदराबाद की पर्दानशी औरतों  का ध्यान रख कर सप्ताह में दो बार मंगलवार और शुक्रवार को लेडीज़ डे होता था जिस दिन केवल महिलाओं को ही प्रवेश मिलता था पर अब आधुनिकता से लेडीज़ डे को घटती भीड से लेडीज़ डे पहले सप्ताह में एक दिन और अब पूरे सीज़न में दो या तीन बार ही रखा जाता हैं। लेकिन 31 जनवरी का चिल्ड्रन्स डे बदस्तूर जारी हैं। इस दिन सिर्फ बच्चे ही नुमाइश में जा सकते हैं और वो भी निशुल्क। पहले सभी बच्चो के लिए था बाद में स्कूली बच्चे अपने आई कार्ड दिखा कर और छोटे स्कूलों के बच्चे कागज़ पर स्कूल की मोहर दिखा कर प्रवेश लेने लगे।

नए साल के पहले दिन 5 बजे उदघाटन की परम्परा अब भी हैं, पहले निजाम उदघाटन किया करते थे अब प्रदेश के मुख्य मंत्री करते हैं। टिकट से और दुकानों के किराए से जो भी धनराशि इकट्ठा होती हैं उससे हमेशा से ही पिछड़े क्षेत्रों के शिक्षण संस्थानों को वित्तीय सहायता दी जाती हैं।

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1 टिप्पणी »

  1. वाह.. बेहतरीन जानकारी !

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