कौल कंडली मंदिर

कटरा से जम्मू आते समय रास्ते में नगरोटा स्थान पर हमने देखा माता कौल कंडली का मंदिर.

वैष्णव देवी की कहानी वास्तव में यही से शुरू होती हैं. प्रथम दर्शन यही किए जाने हैं जिसके लिए वैष्णव देवी की यात्रा जम्मू से शुरू की जानी हैं. लेकिन ज़्यादातर श्रद्धालुओं का ध्यान मुख्य मंदिर की ओर ही होता हैं इसीसे मुख्य दर्शन के बाद लौटते समय कौल कंडली मंदिर जाते हैं.

इस मंदिर के सबंध में मान्यता हैं कि एक बार माता ने अपने भक्त श्रीधर पर प्रसन्न हो उसे दर्शन दिए. दर्शन पाने के बाद श्रीधर ने प्रसन्न हो कर भंडारा किया. इसमे शामिल होने के लिए माता पांच वर्ष की कन्या के रूप में आईं. भंडारे में भैरवनाथ भी अपने शिष्यों के साथ आमंत्रित था. उसने मांस-मदिरा का सेवन करना चाहा. श्रीधर के मना करने पर उत्पात मचाने लगा. जब कन्या रूपी माता ने रोकने की कोशिश की तो भैरवनाथ क्रोधित हो कर उन पर आक्रमण करने उठा. भय से माता पहाडो की ओर दौड़ पड़ी और पहली बार उनके चरण रुके मुड कर भैरवनाथ को देखने के लिए, फिर वही गुफा में वो छिप गई, फिर वही उन्होंने तपस्या की. इस आदिकुमारी मंदिर के बारे में हम पहले बता चुके हैं.

अब चर्चा करते हैं इस मंदिर की. कौल का अर्थ हैं बड़ा कटोरा और कंडली, कुंडल शब्द से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं गोलाकार. कन्या रूपी माता ने यहाँ स्थानीय कन्याओं के साथ खेला और सभी कन्याओं को गोलाकार बिठा कर अपने बड़े कटोरे में से भोजन खिलाया. बाद में 11 वर्ष तक माता ने यहाँ तपस्या भी की. माता की इसी जीवन शैली को ध्यान में रख कर यहाँ झूले भी डाले गए हैं जिस पर श्रृद्धालु महिलाएं झूल रही थी.

गुफानुमा गर्भ गृह हैं जिसमे तीनो माताओं की मूर्ति के अलावा पिंडलियाँ भी हैं मुख्य मंदिर की तरह वैष्णव देवी रूप में -

यहाँ दर्शन के लिए गुफा में नीची छत होने के कारण सिर झुका कर जाना पड़ता हैं. इसके अलावा गुफा में जाने से पहले आँचल, दुपट्टे या रूमाल से सिर ढकने का निर्देश हैं.

दूसरी ओर हैं राम मंदिर जहां राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की पारंपरिक मुद्रा में मूर्तियाँ हैं -

यहाँ से हम जम्मू की ओर बढे और देखा जाम्बवंत गुफा मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में....

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1 टिप्पणी »

  1. dnaswa said

    आपके बहाने हम ने भी दर्शन कर लिए …

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