वैष्णव देवी दर्शन

समय की कमी के कारण जो श्रृद्धालु मंदिर में ही दर्शन कर लेते हैं, वही से आगे हैं भवन का रास्ता. जहाँ वैष्णव देवी के दर्शन किए जाते हैं उस स्थान को भवन कहते हैं.

माना जाता हैं कि यहीं पर माँ ने भैरवनाथ का वध किया था और उसका सिर आठ किलोमीटर की दूरी पर जाकर गिरा था. यहाँ बीच में विराजती हैं लक्ष्मी माँ जिनके बाएँ पार्श्व में महाकाली और दाहिनी पार्श्व में हैं सरस्वती. इन तीनों का मिलाजुला रूप ही वैष्णव देवी कहलाता हैं. महाकाली और लक्ष्मी के बीच में छतरी हैं. बाएँ पार्श्व में महाकाली के पास ज्योति जलती रहती हैं. तीनों माताओं के सामने पिंडलियाँ हैं. मूर्तियों के सामने नीचे बहुत ध्यान से देखना पड़ता हैं इन पिंडलियों को. वास्तव में इन पिंडलियों के ही दर्शन किए जाने हैं. माना जाता हैं कि ये पिंडलियाँ प्राकृतिक रूप से उभर आई हैं.

यहाँ अपनी मर्ज़ी से चढ़ावे की व्यवस्था नहीं हैं. हम क्षत्रियों के लिए सूर्यवंशी होने के नाते सिर्फ माँ के दर्शन ही नही बल्कि चढ़ावे का भी बहुत महत्त्व हैं. हम ब्रह्मक क्षत्रिय स्त्रियाँ, ब्याहता हो या कुँआरी, माँ को चूड़ियाँ ज़रूर चढ़ाती हैं. जब पुरोहित चूड़ियों को माता की मूर्ति के चरणों में रख कर उनमे से कुछ चूड़ियाँ प्रसाद के रूप में लौटाते हैं तब हमें लगता हैं जैसे माँ का आशीर्वाद मिल गया. ऐसा संतोष यहाँ नही मिल पाया.

दर्शन के बाद आगे बढ़ने के लिए उस स्थान के सामने से जाना पड़ता हैं, मान्यता हैं कि सामने से गुज़रने पर भीतर से शक्ति, ज्ञान और धैर्य की रश्मियाँ भक्त के शरीर में संचार कर जाती हैं जो तीनो माताओं की द्योतक हैं. इस सम्पूर्ण शक्ति को माँ वैष्णवी ने कड़ी तपस्या के बाद पाया था.

यहाँ से पहाडी रास्ते पर आगे बढ़ने के बाद शिव मंदिर हैं जहां शिवलिंग के दर्शन किए जाते हैं.

इसी दुर्गम रास्ते पर भवन से आठ किलोमीटर की दूरी पर हैं भैरव बाबा का मंदिर जिनसे परेशान हो कर माँ ने तपस्या की थी और आत्मबल पाया था. माना जाता हैं कि यहीं पर भैरवनाथ का सिर आकर गिरा था और वध के बाद प्रकट होकर भैरवनाथ ने क्षमा याचना की. माँ ने उन्हें वरदान भी दिया था कि माँ की पूजा के साथ उनकी (भैरव) भी पूजा की जाएगी और जब तक भैरव की पूजा नही की जाएगी तब तक यह यात्रा अधूरी मानी जाएगी. इस तरह इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर भैरव बाबा के दर्शन हैं.

इस के बाद वापसी शुरू होती हैं. पहाड़ से अब उतरना हैं. उतरते समय भी छड़ी की ज़रुरत पड़ती हैं क्योंकि मोड़ों पर ढलान बहुत होती हैं. 24 घंटे दर्शन किए जाते हैं, कभी द्वार बंद नही होते. इसीलिए रात हो या दिन इस रास्ते पर लागातार दोनों ओर से श्रृद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता हैं. पूरे रास्ते 24 घंटे चहल-पहल, घोड़ो, पालकियों की आवाजाही लगी रहती हैं. केवल रास्ते की कुछ दुकाने आधी रात के समय बंद रही. लेकिन वक़्त का अंदाजा ही नही रहता हैं, न रात न दिन.

कटरा की मार्किट और जम्मू की ओर प्रयाण अगले चिट्ठे में....

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s