लाल किला

दिल्ली में सबसे पहले हमने देखा लाल किला.

व्यस्त सड़क पर विशाल लाल किले में सामने नज़र आया तिरंगा -

यही मैदान हैं जहां दोनों महत्वपूर्ण दिन जनता बैठ कर सामने शीर्ष नेता को ध्वजारोहण करते देखती हैं. बाई ओर टिकट घर हैं जहां से टिकट लेकर हम भीतर पहुंचे. वैसे तो किले में प्रवेश के लिए चारों दिशाओं में चार द्वार हैं पर प्रवेश के लिए खुला यह एक ही द्वार हैं जिसका नाम लाहौरी द्वार हैं -

भीतर जाने पर दाहिनी ओर सीढियां और दोनों ओर से प्लेटफार्म की ओर जाने वाला रास्ता नज़र आया जहां से हमारे शीर्ष नेता झण्डा फहराते हैं -

बाई ओर से यानी इन सीढियों के सामने से शुरू होता हैं बाज़ार. दोनों ओर दुकाने सजी हैं -

जब लाल किला बनवाया गया तभी से इस हिस्से में बाज़ार हैं जिसका नाम छत्ता चौक हैं. शासन काल में दोनों ओर दुतल्ली दुकाने थी जहां की दुकानों में किले में रहने वाली शाही महिलाओं के शौक़ की चीज़े बिका करती थी. आज भी इस बाज़ार में इसी तरह की चीज़े बिक रही थी.

बाज़ार ख़त्म होने के बाद नौबतखाना हैं. यहाँ से पहले डंका पीट कर शाही फरमान सुनाए जाते थे. इसके बाद के भाग में संग्रहालय तैयार किया गया हैं जहां उस दौर की वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिसमे बर्तन, सिक्के, फ़ौजी पोशाक अस्त्र-शस्त्र आदि हैं. सबसे ज़्यादा आकर्षक हैं उस दौर के दिशा बताने वाले और तापमान मापने वाले यंत्र.

आगे हैं दीवान-ए-आम -

यहाँ बादशाह विराजते थे और अवाम की समस्याएँ सुनते थे.

आगे की जानकारी अगले चिट्ठे में....

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1 टिप्पणी »

  1. pallavi said

    ओके, कम शब्दों में ज्यादा जानकारी दे डाली आपने आभार

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