गोलकुंडा किले की चढ़ाई

गोलकुंडा किले की चढ़ाई कठिन नही हैं।

चढ़ाई अधिक नही हैं। 250 सीढियां हैं। किसी भी किले के लिए ढाई सौ सीढियां अधिक नही हैं। पत्थर की सीढियां अच्छी होने से चढ़ाई में थकान नही होती -

बीच-बीच में थोड़ा मैदानी भाग हैं, कहीं कमाने बनी हैं जो विश्राम स्थल हैं। चढ़ाई के दो रास्ते हैं। एक ओर की सीढियों की हमने चर्चा की कि पिछवाड़े से शुरू हैं। दाहिनी ओर की सीढियां प्रवेश द्वार में जाते ही दाहिनी ओर से हैं। दोनों ओर से लगभग 150 सीढिया हैं, कही से भी जा सकते हैं। इसके बाद एक ही रास्ता हैं। आमतौर पर एक ओर से 150 सीढियां चढी जाती हैं और दूसरी ओर की 150 सीढियों से उतरा जाता हैं।

इन 150 सीढियों के बाद आगे 50 सीढियां चढ़ने के बाद जगदम्बा का मंदिर हैं। आषाढ़ महीने में मनाए जाने वाले तेलंगाना के लोकपर्व बोनालु का आरम्भ यहीं से होता हैं। मंदिर के बाहर माता का झूला नजर आ रहा हैं -

मंदिर छोटा सा हैं। पीछे गुफा में काली माँ का मंदिर भी हैं। गुफा के पत्थरो पर माता और उनके रक्षक भाई पोतराजू के चित्र हैं -

इस लोकपर्व की विस्तार से चर्चा किसी और चिट्ठे में।

मंदिर के बाद एक स्टॉल हैं जहां चाय, कॉफी, आइसक्रीम और अल्पाहार मिलता हैं। इसके बाद अंतिम चढ़ाई हैं जिसमे 50 सीढियां हैं। इन सीढियों को पार करने के बाद यह हैं सबसे ऊपरी भाग जो बड़े अहाते जैसा हैं -

यहाँ से नीचे किले का भाग नजर आ रहा हैं -

कहा जाता हैं की बरसों पहले यहाँ से ऐतिहासिक ईमारत चारमीनार स्पष्ट नजर आती थी पर अब चारो ओर फैला शहर नजर आया कांकरीट के इस जंगल में एक भी ईमारत स्पष्ट नजर नही आई।

इस किले से चार किलोमीटर की दूरी पर क़ुतुब शाही टोम्ब्स जो कुतुबशाही वंशजों की समाधियाँ हैं जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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