धूप, बादल और बारिश – यही हैं ऊटी

धूप, बादल और बारिश - यही हैं ऊटी।

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि मैसूर से टीपू सुलतान की हार और उनके निधन के बाद जो आदिवासी भाग कर पहाडो की ओर जाकर बस गए थे, वे ही यहां के मूल निवासी हैं और अब भी गाँवों में ही रहते हैं। बाद में यहाँ से और ऊपर बढ़ते हुए चोटी पर अंग्रेजो ने शहर बसाया। फिर अन्य राज्यों के लोग यहाँ के मौसम से आकर्षित होकर बसने लगे। यहाँ पहाडो के अलावा संकरी सड़के और रिहायश नजर आती हैं।

यहाँ मौसम सुहावना हैं। हल्की सी धूप खिलती हैं फिर बादल छाते हैं, बूँदा-बाँदी होती हैं, फिर बादल छंटते हैं और हल्की धूप फिर वही क्रम...

वैसे मैसूर की सीमा जैसे ही हमने पार की, मौसम की यह आँख-मिचौली शुरू हो गई।

हमने मैसूर से ऊटी तक की लम्बी यात्रा को ही असली ऊटी की सैर कहा क्योंकि वहां प्राकृतिक आनंद हैं जबकि पहाड की चोटी पर बसे शहर ऊटी को पर्यटकों के लिए तैयार किया गया हैं। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए बोटोनिकल गार्डन तैयार किया गया हैं जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं। एक कृत्रिम झील तैयार की गई हैं जहां बोटिंग की जाती हैं। वहां सुन्दर उद्यान भी हैं। चूंकि इस शहर को अंग्रेजो ने बसाया हैं इसीसे यहाँ चर्च हैं, मंदिर भी हैं पर इनमे कोई ख़ास बात नही हैं। रेसकोर्स हैं, बैंगलौर जितना बड़ा तो नही पर आकर्षक हैं जो रेस न होने से सूना पडा था।

माहौल खराब न हो इसीसे यहाँ प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध हैं। जगह-जगह प्लास्टिक फ्री ऊटी के बोर्ड भी लगे हैं। इस शहर की दो बाते महत्वपूर्ण हैं - प्लास्टिक फ्री शहर और यहाँ शाकाहार अधिक होना जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। यहाँ नगर पालिका के बोर्डो पर यह भी लिखा हैं - पहाडो की रानी ऊटी। वैसे पहाडो की रानी मसूरी को कहा जाता हैं, खैर....

अगले चिट्ठे में हम चर्चा करेंगे चाय, चॉकलेट और मसालों के शहर ऊटी की...

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