असली ऊटी की सैर

मैसूर की सीमा पर गुन्डल गाँव से निकल कर हम आगे बढ़ते गए और गाँव तथा रिहायशी इलाके को पार किया। फिर आया जंगल का रास्ता।

दोनों ओर जंगल होने से बहुत सुहावना था यहाँ का मौसम। यह जंगल का रास्ता ही असली ऊटी की सैर हैं। प्रकृति का असली आनंद इस रास्ते पर ही मिला। दोनों ओर घने जंगल और बीच में संकरी सड़क। इस सड़क पर दोनों ओर से लगातार चार पहिए के छोटे बड़े वाहनों की आवाजाही बनी रही जो ऊटी आए पर्यटकों की संख्या बताती रही। संख्या बढ़ना उचित भी रहा क्योंकि देश के कई शहरों में भीषण गर्मी और यहाँ का ठंडा माहौल।

इस पांच घंटे के रास्ते को सभी जानते हैं पर अलग कारण से। यह रास्ता भय और आतंक का रहा। इतना डर कि पर्यटकों ने यहाँ का आनंद लेना ही छोड़ दिया था और तमिलनाडू से ही ऊटी चले जाया करते थे। यात्री बसों को लूटना तो आम बात थी, महत्वपूर्ण हस्तियों के अपहरण भी हुए, जी हाँ, आपने ठीक समझा यह कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन का इलाका हैं।

इस इलाके में चार जंगल हैं जिनमे से मधुमलई का जंगल प्रसिद्ध हैं। यही गढ़ था वीरप्पन का। यहीं हैं चन्दन का पेड़। जब अखबारों आदि में पढ़ा सुना करते थे तब जाना था कि एक बड़ा पेड़ हैं जिसे काट-काट कर ख़त्म सा कर दिया गया था और वहीं कुछ छोटे पेड़ भी हैं... पर खेद हैं वहां तक हम आम नागरिक जा नही सकते, वैसे सड़क से बहुत ज्यादा नही, थोड़ा ही भीतर हैं, लेकिन सड़क के किनारे से ही घने पेड़ो का जंगल हैं।

दाहिनी ओर यह पेड़ हैं और बाई ओर हैं माया नदी। चन्दन की लकड़ी काट कर संकरी सड़क पार कर इसी नदी से नाव की सहायता से भेजी जाती थी। बाई ओर देखने पर पेड़ो के पीछे नदी नजर आती हैं। नदी का बहाव अधिक नही हैं।

रात में तो क्या दिन में भी तस्करी होती और लूटपाट अलग। लेकिन अब भय से मुक्त इस राह पर रोमांचक यात्रा का आनंद लिया जाता हैं। गाँव पार कर जब इस रास्ते पर आगे बढे तब आगे कुछ झुग्गी-झोपड़ियां भी नजर आई बाद में सिर्फ जंगल ही था। सड़क के दोनों ओर बन्दर देखे -

सड़क के दोनों ओर के पेड़ो पर उछलकूद करते लंगूर पूरी यात्रा में नजर आए। सड़क के किनारे बैठे छोटे-छोटे लंगूर बहुत प्यारे लगे। कभी-कभार एक-दो सड़क के बीचो-बीच भी आकर बैठ गए।

लंगूर की ही तरह हाथी भी पूरे जंगल में हैं और पूरे रास्ते नजर आए। अपनी मस्त चाल से जंगल से सड़क के किनारे तक फिर यहाँ से भीतर जंगल में टहलते हुए देखे गए। एक स्थान पर हमने देखा एक झोपड़ी की ओर एक छोटी सी लड़की सिर पर पानी का घडा लिए जा रही थी उससे कुछ ही दूरी पर हाथी आराम से जंगल की ओर जा रहा था, ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सड़क पर चलते हैं। लगा लड़की और हाथी दोनों को ऎसी आदत सी हैं। शायद बहुत से लोग यह बात जानते होंगे, उन दिनों यह भी सुनने में आया था कि वीरप्पन ने तस्करी में हाथियों का भी इस्तेमाल किया। हाथियों पर चन्दन की लड़की के गट्ठर रख कर सड़क के दूसरी ओर माया नदी तक ले जाता था। उसने हाथियों से जैसे दोस्ती कर रखी थी, उनके नाम भी रखे थे, एक हाथी का नाम गणेश रखा था। यह सारी बाते उस समय हम सुनते थे लेकिन इस यात्रा के दौरान लगा कि वह सारी बाते शायद सच ही थी।

हाथी और लंगूर के अलावा यहाँ हिरणों के झुण्ड भी बहुत देखे -

पेड़ो के आस-पास कुलांचे भरते हुए लगभग सड़क के पास के पेड़ो तक नजर आए। इनके अलावा मोर भी देखे लेकिन कम और दूरी पर दिखाई दिए लेकिन पंख खुले नही थे, हमने सोचा खुले पंखो का दृश्य कितना मनोरम होता होगा। इस तरह लग रहा था जैसे हम जंगल में ही घूम रहे हैं। वास्तव में जंगल के बीच में से ही यह सड़क बनाई गई हैं जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।

यह यात्रा दिन के समय रही, लौटते समय यह यात्रा रात में की जो और अधिक रोमांचक रही जिसकी चर्चा बाद में करेंगे।

प्रकृति का पूरा आनंद, जंगल, जंगली जानवर और पहाड़ का आनंद हमें रास्ते में ही मिल गया। जंगल समाप्त होते ही पहाडी क्षेत्र शुरू हुआ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में....

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