आम की दावत

इतिहास में आम की दावत का जिक्र तो सबने सुना होगा। अकबर के दरबार के कई किस्से हैं। लोकप्रिय शायर मिर्जा ग़ालिब साहब की आम की दावते भी मशहूर हैं। हैदराबाद की मुगलई संस्कृति में भी आम की दावत बनी रही और जैसे-जैसे आधुनिक समय आता गया हैदराबादी इस दावत से दूर होते गए। नई पीढी को शायद ही आम की दावत मालूम हैं।

गर्मी में लम्बी दुपहरिया बीतने के बाद शाम बहुत सुहावनी होती हैं। शाम की ठंडक में अक्सर घर के आँगन या छज्जे पर इस दावत का आयोजन अपने आप में सुखद ठंडा अहसास हैं। फिर यह समय भी ऐसा होता हैं जब बच्चे अपनी पढाई से पीछा छुडा चुके होते हैं। छुट्टियों की मस्ती का यह भी एक अवसर हैं।

सबसे पहले आपको बता दे कि आम की दावत में सिर्फ आम ही आम हैं। शुरूवात करेगे बच्चो के आम से। यह बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसका नाम हैं दस्त्तूरी। ये दस्तूरी आम बहुत मीठे होते हैं इसीलिए इसे शक्कर गुठली भी कहा जाता हैं। वैसे इसे बच्चो के आम भी कहा जाता हैं। आजकल यह आम बहुत ही कम हो गए हैं। आधुनिक व्यापारी तो जानते भी नही। बहुत ढूँढने पर मार्किट की पुरानी दुकानों पर कही नजर आते हैं। बचपन में हमारी गर्मी की लम्बी दुपहरिया इन्ही आमो को चूसते बीती। दावत में यह आम सिर्फ बच्चो के लिए ही होते हैं और बच्चे मजे से इन मीठे आमों को चूसते हैं।

ऐसे ही छोटे-छोटे रसीले आम होते हैं - रसाल जिन्हें छोटा रसाल भी कहते हैं। बड़े रस भरे आमों को बड़ा रसाल कहते हैं। तेलुगु में इन्हें चिन्ना (छोटा) रसाल और पेद्दा (बड़ा) रसाल कहते हैं। सीधी-सादी भाषा में रस के आम कहते हैं। इन आमो का रस निकाला जाता हैं। रस को छाना जाता हैं ताकि इसमे रेशे न रहे। फिर इसमे एक चौथाई दूध और शक्कर (चीनी) मिलाते हैं क्योंकि आम की तासीर गर्म होती हैं, वैसे रस निकालते समय पानी का भी इस्तेमाल किया जाता हैं। इससे रस बहुत गाढा नही रह जाता। इसमे ऊपर से चिरौंजी बिखराई जाती हैं और मलाई डाली जाती हैं।

इस मीठे रस के बाद आम के मीठे टुकडे अच्छे लगते हैं। जैसे रस के आम कहा जाता हैं वैसे ही इन आमो को काटने के आम कहा जाता हैं। यह आम हैं बेनिशान। कुछ सालो से यह नाम बोला जा रहा हैं, पहले सब काटने के आम ही कहते थे। इसकी फांके काट कर छिलका निकाल कर टुकडे काटे जाते हैं।

इन मीठे टुकड़ो को खाने के बाद बारी आती हैं नमकीन की। आम के पकौड़े जो कच्चे आम के बनाते हैं। यह आम बड़े गोल होते हैं जिसे पहाडी आम कहा जाता हैं। इस कच्चे आम के टुकडे काटे जाते हैं। आम बड़ा होने से गूदा बहुत होता हैं जिससे कुछ टुकड़ो पर छिलका होता हैं कुछ पर नही। इन सभी टुकड़ो को पकौड़ो के लिए तैयार बेसन के घोल में डाल कर पकौड़े तल लिए जाते हैं।

यहाँ अक्सर बच्चो को पकड़ो के बजाए तोतापरी दी जाती हैं। इसके पतले लम्बे टुकडे खाए जाते हैं। खट्टी मीठी तोतापरी यहाँ हमेशा से ही खूब मिलती हैं। इसे तोतापरी कैरी कहा जाता हैं क्योंकि यह पका आम नही होता। बचपन से ही मुझे तोतापरी कैरी बहुत पसंद हैं आज भी पूरे मौसम में शौक़ से खाती हूँ।

नमकीन पकौड़ो के बाद फिर आम का रस पर यहाँ स्वाद बदला हैं, रस थोड़ा खट्टा हैं यानि खट्टा-मीठा स्वाद हैं। यह आम हैं - हिमायत। यह आम बड़े होते हैं और रसीले होने के कारण नरम होते हैं। इन आमो का रंग हरा ही होता हैं। बहुत पके आम भी हरे ही होते हैं, कुछ पीलापन नजर आता हैं। इसके रस में दूध और शक्कर (चीनी) कुछ अधिक डाली जाती हैं।

इसके बाद टुकड़ो की बारी फिर से लेकिन पहले दशहरी आम या उन आमो को चुना जाता था जो कुछ लालीपन लिए होते थे। इनका स्वाद कुछ अलग होता हैं, न मीठा न खट्टा कुछ फीका सा होता हैं। आजकल ऐसे आम नही मिल रहे। अब तो ऎसी दावते भी नही सजती।

पिछले कुछ वर्षो से बैगनपल्ली आम बहुत मिल रहे हैं। यह आम बेनिशान आमो की तरह ही होते हैं पर उससे बड़े होते हैं। बैगनपल्ली आंध्रप्रदेश में एक क्षेत्र हैं। पिछले कुछ वर्षो से ही यहाँ आम उगाए जा रहे हैं। इन आमो के भी टुकडे खाए जाते हैं लेकिन इसमे अक्सर छिलका नही निकाला जाता हैं।

मौसम की शुरूवात में बेनिशान आम मिलते हैं और बाद में बैगन पल्ली आम आते हैं जो मानसून आने तक बिकते हैं। दोनों का स्वाद एक जैसा हैं।

खाने में आम का चलन वैसे ही हैं जैसा देश के अन्य भागो में हैं जैसे आम रस पूरी यानि गरमागरम पूरियो के साथ आम के रस का आनंद। आम की फांको को भोजन के बाद खाना। इसके साथ एक ख़ास बात यह हैं कि आम सुबह के नाश्ते में भी शामिल रहते हैं। आम के मौसम में अक्सर सुबह का नाश्ता आम रोटी होता हैं, आम के टुकड़ो को रोटी के साथ खाते हैं।

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6 टिप्पणियाँ »

  1. आम रस पूड़ी की याद आ गई…

  2. आम के बारे मेअच्छी -खासी जानकारी दी गई है ।

  3. भागचन्द सोलंकी said

    बनाने मेँ सरल खाने मेँ स्वादिष्ट एवं पोष्टिक डबल का मिठ्ठा पसंद आया | डबल धन्यवाद| आम की दावत की रोचक जानकारी मिली| इसका हैदराबाद मेँ भी चलन कम हो गया हैं तो फिर मुझ राजस्थानी के

  4. भागचन्द सोलंकी said

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  6. भागचन्द सोलंकी said

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