हैदराबाद का बाग़-ए-आम

किसी भी स्थान पर वहाँ की जलवायु के अनुसार वहाँ का खान-पान तय होता। साथ ही संस्कृति की झलक भी खान-पान में झलकती है।

हैदराबाद की संस्कृति मुग़लई संस्कृति है। यहाँ माँसाहारी और शाकाहारी दोनों की संख्या बराबर है। खानपान में भी बहुत कुछ ऐसा है जो मुग़लों में अधिक प्रचलित रहा। ऐसा ही एक फल है आम।

शायर ग़ालिब साहब की आम की दावतें तो मशहूर है ही, अकबर-बीरबल के आम के क़िस्से भी कुछ कम नहीं है। कहते है अकबर के राज में बाग़-ए-आम था। इसी की तर्ज पर हैदराबाद में भी रहा बाग़-ए-आम जो निज़ामशाही में महकता रहा पर शासन के साथ-साथ आम के दरफ़्त (पेड़) भी कम होते गए और अब तो गिनती के रह गए। लेकिन यह पूरा बड़ा क्षेत्र बगीचे में तब्दील हो गया जिसका नाम पब्लिक गार्डन पड़ा। अब इसमें एक प्रेक्षागृह भी है - ललित कला तोरणम जिसमें कई कार्यक्रम होते है जिनमें अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव जैसे कार्यक्रम भी शामिल है।

आज भी पुराने हैदराबादी इस जगह को पब्लिक गार्डन की जगह बाग़-ए-आम ही कहते है। यह जगह विधान सभा भवन के बिल्कुल पास है और इनके सामने है आकाशवाणी भवन और यह सब नामपल्ली रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर के भीतर है।

हाँ तो हम बात कर रहे थे बाग-ए-आम की। इस पूरे बड़े क्षेत्र में विभिन्न किस्मों के आम के दरफ़्त थे। आम के मौसम में आमों का ठेका पारदी समुदाय को दिया जाता था। हम यहाँ बता दे कि हैदराबाद में एक जनजाती है जिन्हें पारदन कहा जाता है और इस समुदाय को पारदी समुदाय कहा जाता है। इनका काम फलों का व्यापार है, विशेषकर आम। इसके बारे में अधिक जानकारी अगले किसी चिट्ठे में…

आजकल यहाँ आम का व्यापार अधिक व्यावसायिक स्तर पर हो गया हैं। अप्रैल के शुरू से आम आने शुरू होते हैं और दो महीने अप्रैल और मई में आम की बहार रहती हैं। हैदराबाद में मानसून का समय 5 जून हैं पर मानसून थोड़ा आगे-पीछे होता हैं। जैसे ही मानसून की पहली फुहार आती हैं लोग आम से मुंह मोड़ लेते हैं। ताज्जुब होता हैं कल तक दुकानों और ठेलो पर आम खरीदने के लिए जुटी भीड़ अब आम के आस-पास नजर नही आती। व्यापारी सस्ते में भी बेचने की कोशिश करते हैं। फिर भी नही बिकते और बरसात शुरू होते-होते खराब होते आम आखिर फेक दिए जाते हैं। माना यह जाता हैं कि जैसे ही मानसून की ठंडक आती हैं, आम खराब हो जाते हैं, हालांकि उस दौरान आम अच्छे भी हो तब भी कोई खरीदना नहीं चाहता।

वैसे हैदराबाद में आम हमेशा से ही अधिक महंगे नही रहे। आजकल शुरूवात में 40 रूपए किलो से मिलते हैं और अंत तक 20 और 15 रूपए किलो से भी मिल जाते हैं। आम खाने का यहाँ शौक़ तो हैं ही साथ ही यह संस्कृति से भी जुड़ा हैं। इतिहास में जिस आम की दावत का जिक्र आता हैं वह हैदराबादी तहजीब का भी एक हिस्सा रही।

आज की पीढी शायद आम की दावत के बारे में नही जानती। अगले चिट्ठे में हम आपको ले चलते हैं आम की दावत में…

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2 टिप्पणियाँ »

  1. shukriya is jaankari ke liye ! Waise Hydrabadi aamon ka taste uttar bhart ke prachlit aamon langda, maldah aadi ki tulna mein kaisa hai?

  2. anug said

    अगले चिट्ठे में होने वाली आम की दावत में शामिल हो जाइए, सारे स्वाद पता चल जाएगें।

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