हैदराबादी लोक संगीत – ढोलक के गीत

हर प्रदेश की अपनी लोक संस्कृति होती हैं और होता हैं लोक संगीत।

हैदराबाद की लोक संस्कृति में दक्खिनी जुबान की मिठास हैं। यह जुबान (भाषा) पूरी तरह से न उर्दू हैं न हिन्दी। अलग ही हैं शब्दावली जिसे आज हैदराबादी भाषा के नाम से जाना जाता हैं। इसी हैदराबादी भाषा यानि दक्खिनी जुबान में हैं हैदराबाद का लोक संगीत जिसमे हैं ढोलक के गीत।

अन्य लोक गीतों की तरह ढोलक के गीतों के बारे में भी कहा जाता है कि ये गीत किसने लिखे, कब लिखे, कोई नही जानता। सालों से हैदराबाद की तहज़ीब का एक हिस्सा है ये गीत। पहले शहर में होने वाली शादियों में ये गीत ज़रूर गूंजा करते थे पर अब तो शहर में शायद ही ये गीत कही सुनाई देते हैं, कारण कि नई पीढी की लड़कियों ने इन गीतों को सीखा ही नहीं। इन गीतों की ख़ास बात ये है कि केवल महिलाएं ही इन गीतों को गाती है। जी हां ! पुरूष ये गीत नहीं गाते। महिलाओं के इस समूह में छोटी लड़की से लेकर उम्रदराज महिलाएं भी शामिल है।

ढोलक के गीत यानि वो गीत जो ढोलक पर गाए जाते है। कौन सी ढोलक ? आमतौर पर प्रयोग में आने वाली दो साज़ों की ढोलक नहीं है ये। अण्डाकार ढोलक का ये एक ही साज़ है जिसके दोनों गोलाकार किनारों पर दोनों हाथों से इसे बजाया जाता है और डोरी से गले में भी लटकाया जाता है। सिर्फ़ इसी साज़ पर ये गीत गाए जाते है। इसे ढोलकी कहते हैं पर ढोलकी के गीत न कह कर ढोलक के गीत कहा जाता हैं। वैसे सहायता के लिए हारमोनियम भी बजाया जाता हैं। हारमोनियम रेडियो कार्यक्रम या ऐसे ही अवसरों पर बजाया जाता हैं पर शादी-ब्याह के अवसर पर सिर्फ ढोलकी ही बजाई जाती हैं। ढोलकी के साथ एक और महत्वपूर्ण आवाज होती हैं, यह हैं गायिकाओं की तालियों की आवाज।

गीत की शुरूवात होती है ढोलक की थाप से फिर सभी की तालियों के सुर शुरू होते है, धीमे-धीमे शुरू हो कर तेज़ होने लगते है। फिर शुरू होता है गीत एक आवाज़ में, दो आवाज़ों में, कोरस में। कभी-कभार गीत के शुरू में और बोलो के अनुसार बीच-बीच में भी लड़कियों की हँसने-खिलखिलाने की आवाजे भी होती हैं।

दूसरी ख़ास बात इन गीतों की यह है कि ज्यादातर शादी-ब्याह के गीत ही है जबकि आमतौर पर लोक गीतों में सभी तरह के गीत शामिल होते है जैसे त्यौहारों, बेटे का जन्म आदि मौको पर गाए जाने वाले गीत। और भी ख़ास बात ये है कि ज्यादातर छेड़-छाड़ वाले गीत ही है। वर पक्ष (दूल्हें वाले) और वधू पक्ष (दुल्हन वाले) एक दूसरे को छेड़ते है।

इन गीतों को शहर में जन-जन तक पहुंचाने में आकाशवाणी के हैदराबाद केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। पचास के दशक से लगभग अस्सी के दशक तक आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से इन गीतों ने धूम मचाई। बहुत ही ख़ास बात ये है कि कलाकार केवल दो ही रहे - एक श्रीमती अर्जुमन नज़ीर और दूसरी श्रीमती कनीज़ फ़ातिमा। दोनों का अपना-अपना समूह था। उर्दू कार्यक्रमों में रात साढे नौ बजे से प्रसारित होने वाले नयरंग कार्यक्रम और दोपहर में प्रसारित होने वाले महिलाओं के कार्यक्रम में सप्ताह में कम से कम एक बार जरूर सुनवाए जाते। हालात ये कि रात में लगभग 10 बजे ये गीत प्रसारित होते थे और लगभग सुनसान सड़कों और गलियों में घरों की खिड़कियों से छन कर गूंजा करते थे ये गीत।

वैसे अस्सी के दशक तक आते-आते इन गीतों का प्रसारण कम होने लगा था और अब तो शायद ही कभी सुनवाए जाते हैं। इसी तरह से शहर के शादी-ब्याह के समारोहों में भी इन गीतों की महफ़िल अब नही जमती। नई पीढी शायद ही इन गीतों को जानती हैं। हालांकि आजकल कई राज्यों में लगता हैं लोक संगीत का दौर लौट आया हैं पर हैदराबाद में अब भी ढोलक के गीतों की दुबारा शुरूवात नही हो पाई हैं।

कुछ गीत यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। गीतों के पूरे बोल मुझे याद नही आ रहे जितना याद आ रहा ही उतना लिख रही हूँ।

यह गीत बहुत ही लोकप्रिय रहा -

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा की चोटी काट लिया रे
उनकी अम्मा बोले ये क्या हुआ
उनकी सास बोले अच्छा हुआ

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा का कान काट लिया रे
उनकी भैना बोले ये क्या हुआ
उनकी नन्दा बोले अच्छा हुआ

इन दक्खिनी शब्दों के मतलब हैं - भैना - बहनें, नन्दा - ननदें, दुल्हन आपा - नई ब्याह्ता

यहां एक बात हम बता दें कि हैदराबाद में सब्जियों में बैंगन का बहुत उपयोग होता है। उसी का यहां प्रयोग हुआ है। हरे बैंगन जो कच्चे होते है चूहे की तरह लगते है।

एक और गीत प्रस्तुत है जिसमे दूल्हा गाँव का हैं और दुल्हन शहर की हैं। गाँव से बारात शहर में आई, दुल्हन वालो ने अपनी शहरी सभ्यता से बरात का स्वागत किया पर गाँव के बारातियों को अपने ही परिवेश की आदत हैं, शहरी परिवेश समझ नही पा रहे, इस पर छेड़-छाड़ देखिए -

अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मै मोटर मंगाई
अय्यो मा बन्डियों पर चढने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मैं चादर मंगाई
अय्यो मा बोरियो पर लोटने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

बन्डियां शब्द का अर्थ हैं - बैलगाड़ियां

एक ऐसा ही गीत है जिसमें ये कहा गया है कि बारात शहर में आई है। दूल्हें की मां चारमीनार के आस-पास की रौनक में खो गई है -

समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी लाड़ बज़ार की गलियां
हाय समधन मिल गई मा चूड़ी वाले की दुकान पे
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी चारकमान की गलियां
हाय समधन मिल गई मा फूल वाले की दुकान पे
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इस तरह से इस गीत में चारमीनार के चारो ओर का माहौल बताया गया हैं। चारमीनार के एक ओर हैं लाड बाजार जो बरसों से आज भी उसी तरह सजा हैं। यहाँ मशहूर हैदराबादी चूड़ियों के साथ महिलाओं के श्रृंगार की हर चीज मिलती हैं। चारमीनार के दूसरी ओर का क्षेत्र चारकमान कहलाता हैं जहां पहले कतार में फूलो की दुकाने हुआ करती थी पर अब यह दुकाने नजर नही आती हैं। शेष दोनों ओर के माहौल के बारे में भी हैं पर बोल मुझे याद नही आ रहे।

हैदराबादी भोजन में मिर्ची का सालन बहुत लोकप्रिय हैं जिसकी जानकारी और सालन बनाने का तरीका मैं अपने पिछले एक चिट्ठे में दे चुकी हूँ, इस सालन पर भी एक गीत हैं जिसमे यह कहा गया हैं कि मुर्गी की जगह यह सालन बनाया गया हैं। इस गीत का मुखड़ा और अंतिम पंक्ति ही मुझे याद हैं जो इस तरह हैं -

सुनो मोहल्ले वालो मेरी काली मुर्गी खो गई मा
मिर्ची का सालन घी के पराठे
काली मुर्गी खो गई मा

काली मुर्गी मिल गई मा (अंतिम पंक्ति)

एक गीत फिल्म में भी रखा गया हैं। फिल्म का नाम हैं - बाजार।

अस्सी के दशक की इस लोकप्रिय कलात्मक फिल्म में स्मिता पाटिल, नजीरूद्दीन शाह, फारूख शेख, सुप्रिया पाठक ने काम किया हैं। सागर सरहदी की यह फिल्म हैदराबादी जन-जीवन पर आधारित हैं। इसमे एक ढोलक का गीत रखा गया हैं जिसे पैमिला चोपड़ा और साथियो ने गाया हैं। हालांकि इस गीत में देसीपन कम हैं क्योंकि आर्केस्ट्रा का प्रयोग किया गया हैं। वैसे इस फिल्म के अन्य गीतों की तुलना में यह गीत कम पसंद किया गया। सिंगार (श्रृंगार) के इस गीत के बोल हैं -

चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न गजरा
न मोतिया चमेली न जूही न चम्पा
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न गहना
न झुमका न हार न चूड़ी न कंगना
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न सिंगार
न मिस्सी न काजल न मेहंदी न गजरा
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

जो ढोलक के गीतों की गायकी का अंदाज जानना चाहते हैं वे इस गीत को सुनकर जान सकते हैं।

माना जाता है कि कुछ गीत ऐसे भी है जिन्हें बाद में लिखा गया हैं जिसमे होली के गीत और बचपन के कुछ खेलो के गीत शामिल हैं। कुछ पारंपरिक गीतों के बोलों में फेर-बदल भी किया गया।

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1 टिप्पणी »

  1. अनाम said

    dholak

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