मंगलगिरी के पहाड़ पर नरसिंह भगवान का अनूठा मंदिर

विजयवाड़ा में कृष्णा नदी पर बने प्रकाशम बैरेज से 8 किलोमीटर की दूरी पर हैं मंगलगिरी पहाडी।

यह विजयवाड़ा और गुंटूर जिले का बीच का भाग हैं। पहाडी की चोटी पर हैं नरसिंह भगवान का मंदिर। इसे नरसिम्हा स्वामी मंदिर या पनका नरसिम्हा स्वामी मंदिर कहते हैं। यह पनका ही यहाँ की विशेषता हैं।

पनका मिठाई का नाम हैं। यह वास्तव में गुड का पानी हैं जिसमे थोड़ा सा भुना जीरा और काली मिर्च मिली हैं।

पहाडी पर स्थित इस मंदिर में जाने के लिए एक ओर गाड़ियां जाने का रास्ता हैं। दूसरी ओर लगभग तीन सौ सीढियां हैं। ऊपर पूजापा की इक्का-दुक्का दुकाने हैं क्योंकि महत्त्व पनका का हैं जो मंदिर के भीतर मिलता हैं जिसके लिए 50 रूपए का टिकट लेना पड़ता हैं।

मंदिर छोटा सा हैं। गर्भगृह के बाहर स्टील के घडो में पनका रखा हैं। एक घड़े में एक लीटर पनका होता हैं। एक टिकट पर एक घडा दिया जाता हैं यानि एक लीटर गुड का पानी। मान्यता हैं कि यहाँ नरसिंह भगवान गुड का पानी पीते हैं। जितना गुड का पानी नरसिंह भगवान को पिलाया जाता हैं यानि चढ़ाया जाता हैं उससे दुगना जैसे अगर एक लीटर गुड का पानी यहाँ चढ़ाया जाए तो दो लीटर गुड के पानी में जितनी मिठास होती हैं उतनी मिठास आपको जीवन में किसी न किसी रूप में मिलती हैं।

गर्भगृह में केवल नरसिंह भगवान की मूर्ति हैं। चांदी की बड़ी मूर्ति का मुख और गर्दन तक का भाग दिखाई देता हैं शेष मूर्ति सतह के नीचे हैं। मूर्ति पारंपरिक मुद्रा में हैं यानी मुंह खुला हैं।

पुरोहित टिकट लेकर पनका के घडो में से एक घडा उठाते हैं और श्रृद्धालु से नाम और गोत्र पूछते हैं फिर मंत्रोच्चार के साथ घड़े में शंख डालकर उसमे पानी लेते हैं और मूर्ति के मुंह में डालते हैं। इस तरह पांच बार शंख से पनका मूर्ति के मुख में डाला जाता हैं यानि भगवान को पिलाया जाता हैं जिसके बाद घड़े में से उसी तरह से शंख में पनका लेकर श्रद्धालु को तीरथ की तरह दिया जाता हैं। फिर घडा श्रद्धालु को दे दिया जाता हैं जिसमे बहुत पनका बचा होता हैं। इसे बोतल में भर कर घडा लौटा दिया जाता हैं। इसके लिए बोतले भी वहां बिक रही थी। पुजारी ने बताया कि बारह घंटे के भीतर पनका पी लेना चाहिए उसके बाद खराब हो जाता हैं।

इस चित्र में देखिर बोतल में पनका और पीछे नीचे दिखाई दे रहा शहर -

यहाँ एक ख़ास बात नजर आई। जहां गुड होता हैं वहां मक्खियाँ होती हैं और मिठाई के पास चीटियाँ भी होती हैं। लेकिन यहाँ पूरे क्षेत्र में एक भी मक्खी और चीटीं नजर नहीं आई। हालांकि जब पंडितजी मूर्ति पर पनका चढ़ा रहे थे तब कुछ बूंदे आसपास बिखर रही थी। हो सकता हैं गुड के पानी में भुना जीरा और काली मिर्च होने से चीटियाँ और मक्खियाँ वहां न आती हो।

वैसे मूर्ति की बनावट, जैसे कि मैंने पहले बताया गर्दन से नीचे का भाग सतह के नीचे हैं यानि मूर्ति के भीतर लगता हैं पाइप लाइन की कोई ऎसी व्यवस्था हैं जिससे यह गुड का पानी कहीं और जाकर गिरता हैं।

विष्णु के अवतार नरसिंह भगवान के इस मंदिर में लक्ष्मी जी भी विराजमान हैं, राजलक्ष्मी के रूप में।

राजलक्ष्मी का मंदिर पहाडी की चोटी पर हैं। पनका चढ़ावे के बाद वहां से और सौ सीढियां चढ़ कर ऊपर जाना हैं। यहाँ गाड़ी के लिए रास्ता नहीं हैं। सीढियां ही चढ़ना हैं। रास्ते में हनुमान जी का छोटा सा मंदिर भी हैं। ऊपर राजलक्ष्मी का मंदिर छोटा सा ही हैं। यहाँ माँ (जिसे यहाँ की भाषा में अम्मावारी कहा जाता हैं) की पारंपरिक रूप से पूजा अर्चना की गई।

इसके बाद हम नीचे सड़क पर लौट आए. सामने महालक्ष्मी का बड़ा मंदिर हैं -

गर्भगृह में लक्ष्मी जी की विशाल मूर्ति हैं। इसके अलावा शेष शय्या पर विष्णु और पायदान पर लक्ष्मी जी तथा रामा सीता और लक्ष्मण की पारंपरिक मूर्तियों के गर्भगृह भी हैं।

महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन के बाद हमने विजयवाड़ा के अन्य मंदिर देखे जिनकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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6 टिप्पणियाँ »

  1. इस अनोखे नरसिंह भगवान् की जानकारी अछि लगी. वैसे आपका अनुमान सही लगता है की पनका कहीं न कहीं तो जाता ही होगा. विजयवाड़ा में पहाड़ियों पर जो बसावट दिख रही है यह बहुत अधिक पूरानी नहीं है. आज से पचास साल पहले तक सभी पहाड़ियां अछूती थीं. हाँ communist पार्टी का वहां बड़ा जोर था और हर पहाड़ी पर उनका प्रतीक चिन्ह हंसिया और हथोडा बना रहता था.

  2. बेहतरीन लगा आपका ये विवरण। विशेषकर पनका और चीटियों मक्खियों की अनुपस्थिति वाली बात रोचक लगी।

  3. anug said

    मनीष जी शुक्रिया !

    सुब्रह्मण्यम जी, आपने सही कहा, विजयवाड़ा की पहाडियों पर बनावट पुरानी नही हैं. पहले यह मंदिर नही था केवल मूर्ति थी. पीछे घना जंगल था जहां से जंगली जानवर यहाँ आते थे. गाँव के गरीब लोग गुड के पानी का पनका ही चढाते थे, पर यह पता नही मक्खियाँ और चीटियाँ क्यों नही आती. मान्यता इतनी फैली की आसपास के गाँव से लोग आने लगे जिससे छोटा सा मंदिर जैसा बना दिया गया था पर जंगली जानवरों के भय से शाम में चार बजे मंदिर बंद हो जाता था. बाद में अच्छा विकास यहाँ किया गया, अब तो दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं.

  4. बहुत अच्छी लगा यह यात्रा वृत्तान्त

  5. mahesh said

    good

  6. I am very pleased to hear about the Narsimha bhagwan.Thanks

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