विजयवाड़ा का कनकदुर्गा मंदिर

जून का महीना आते ही दक्षिण-पश्चिम मानसून आ गया और हैदराबाद में गर्मी से मिल गई राहत। ऐसे में हमने भी सोचा कि शहर से बाहर थोड़ा घूम आए और 5 घंटे का सफ़र तय कर पंहुच गए विजयवाड़ा।

विजयवाड़ा का मुख्य आकर्षण हैं - कनक दुर्गा मंदिर जो इन्द्रकेलाद्री पहाडी पर स्थित हैं।

दुर्गा का शेराँ वाली रूप कई जगह देखने को मिलता हैं पर यहाँ कनक यानि स्वर्ण दुर्गा हैं। यह हैं प्रवेश द्वार -

पीला कुंदन सा दमकता गोपुरम हैं और पास हैं ऊपर मंदिर जाने का रास्ता। इसके ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर कृष्णा नदी अपनी पूरी रवानगी से बह रह रही हैं। सड़क बहुत संकरी हैं और व्यस्त हैं जिससे यातायात से सड़क पार करना कठिन हैं। हालांकि सड़क पार करने के लिए पुल हैं पर सीढियां बहुत होने से सबके लिए कठिन हैं।

मंदिर में जाने से पहले कृष्णा नदी के तट पर स्नान किया जाता हैं या हाथ-पैर धोए जाते हैं। तट बहुत साफ़-सुथरा हैं और पानी भी अच्छा हैं -

यह गोपुरम के पीछे से लिया गया चित्र हैं, सड़क संकरी होने से ऐसा लग रहा हैं जैसे कृष्णा नदी की गोद में मंदिर बसा हैं -

एक ओर गाड़ियां जाने के लिए रास्ता हैं दूसरी ओर सीढियां हैं। बहुत ऊँचाई पर हैं मंदिर। इसीलिए यहाँ एक सुविधा दी गई हैं। प्रवेश द्वार के पास ही पहले एक छोटा सा गणेश मंदिर हैं, जहां प्रथम देवता गणपति के दर्शन के बाद छोटा सा कनक दुर्गा माता का मंदिर हैं। बहुत सौम्य मूर्ति हैं। यहाँ भी पुरोहित हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा होती हैं। यहाँ वैसी ही मूर्ति हैं जैसी मुख्य मंदिर के गर्भगृह में हैं -

बताया गया कि यहाँ इस मंदिर के दो कारण हैं - जो शारीरिक अक्षम हैं और ऊँचाई पर स्थित मुख्य मंदिर तक नहीं पहुँच पाते वे यहीं दर्शन कर सकते हैं और दूसरा कारण हैं विशाल मंदिर से लौटने के बाद जाते-जाते फिर एक बार माता के दर्शन कर सकते हैं।

हमने भी पहले गणपति फिर माता के दर्शन किए फिर चढ़ाई की ओर बढे। यहाँ चार-पांच सीढियां चढ़ते ही मल्लेश्वरी का मंदिर हैं जहां हनुमान जी की मूर्ति हैं।

यहाँ दर्शन के बाद आगे सीढियों से ऊपर चढ़ा जाता हैं या दूसरे रास्ते गाड़ी से जा सकते हैं। नीचे भी पूजापा की दुकाने सजी थी और यहाँ ऊपर भी हैं। यहाँ खासकर पीले रंग की साड़ियाँ नजर आई। कनक दुर्गा अपने मूल रूप में सुनहरी साड़ी में होती हैं इसीसे श्रृद्धालु पीले रंग की साड़ी चढ़ाना पसंद करते हैं।

बाई ओर पहाडी हैं जिस पर ॐ और शान्ति का प्रतीक उल्टा त्रिशूल लगा हैं -

सामने नजर आता हैं मंदिर का दमकता स्वर्ण कलश। हमने रात में भी देखा और दिन में भी, रात की रोशनी में यह ज्यादा दमकता लगा। कलश के पीछे माता के आठ रूप हैं, दोनों ओर चार-चार -

यहीं से सीढियां हैं नीचे जाने के लिए, मुख्य मंदिर नीचे हैं। वैसे बहुत भीड़ नहीं थी फिर भी जल्दी दर्शन के लिए प्रति व्यक्ति 50 रूपए का टिकट हैं। गर्भगृह में द्वार पर वन्दनवार आदि चांदी के दमकते हैं और भीतर सोने से दमकते हैं। माता की सौम्य मूर्ति हैं बिलकुल वैसी ही जैसी नीचे मंदिर के प्रवेश पर हैं जिसकी तस्वीर हमने ऊपर रखी हैं। इस तरह आप गर्भगृह की माता की मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं।

गर्भगृह से निकल कर हम आगे बढे नटराज मंदिर की ओर जहां शिव, नटराज मुद्रा में हैं। इसके अलावा गणेश का भी छोटा सा मंदिर हैं और एक मंदिर वेणुगोपाल स्वामी का हैं जहां कृष्ण, सत्यभामा और रूक्मिणी के साथ विराजे हैं।

मंदिर की पहाडी से हम नीचे उतर आए। पास ही एक गली हैं जिसमे अर्जुन द्वारा स्थापित शिवलिंग हैं जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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1 टिप्पणी »

  1. madhav rai said

    nice

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