हैदराबाद का इमली बन

हैदराबाद की जलवायु देश के कई शहरों से अच्छी है, न ज्यादा गर्मी न ज्यादा सर्दी और न ही अधिक बारिश। पिछले कुछ सालों से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से यहाँ का तापमान 40 के आस-पास पहुँच रहा है नहीं तो पहले 38 से नीचे ही रहा था और 11 से नीचे तो अब भी अक्सर नहीं जाता है। ऐसी जलवायु में न तो गला सूखता है जिससे नींबू की ज़रूरत पड़े और न ही गला बैठने का डर इसीलिए यहाँ के भोजन में खटाई के लिए इमली का उपयोग किया जाता है।

हैदराबाद में एक बड़ा क्षेत्र इमली का था जिसे इमली बन कहा जाता है। क्षेत्र का नाम इमलीबन तो आज भी पर आज यहाँ इमली के वृक्ष नहीं है। इस जगह हैदराबाद शहर से बाहर और अन्य राज्यों को जाने वाली बसों का राज्य परिवहन बस अड्डा है। पहले इसका नाम इमलीबन बस अड्डा रखा गया पर अब नाम बदल कर महात्मा गाँधी बस अड्डा रखा गया है।

पहले ऊँचे घने इमली के वृक्षों से घिरा था यह क्षेत्र। बाद में देखभाल ठीक से न होने से वृक्ष कम होते गए, फिर जंगली झाड़-झंखाड़ उग आए। कई सालों तक यह क्षेत्र ऐसा ही पड़ा रहा। फिर इधर कुछ साल पहले राज्य सरकार ने यह बस अड्डा बनवाया।

इमलीबन इतना घना था कि ग़रीब लोग इमली खरीदते नहीं थे, यहीं से चुनकर खाने में प्रयोग करते थे। इमली के नए पत्तों की भी सब्जी बनाई जाती है। इन पत्तों को चिगुर कहते है। पता नहीं हैदराबाद के अलावा और कितने लोग चिगुर जानते है।

बसंत आते ही इमली के वृक्षों पर कोपले फूटती है और मार्च आते-आते नए पत्ते आ जाते है। हैदराबाद में मार्च से ही गरमी शुरू हो जाती है। गरमी शुरू होते ही सब्जी मंडी में चिगुर आने लगता है और मानसून आने तक मिलता है। दो से तीन महीने चिगुर का खाने में तरह-तरह से उपयोग होता है जिसे हम आगामी चिट्ठे में बताएगे।

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1 टिप्पणी »

  1. अच्छी जानकारी दी इमलीबन की.

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