हैदराबादी चूड़ियाँ

हैदराबादी चूड़ियों का विश्व में एक महत्वपूर्ण स्थान है। समय-समय पर यहाँ अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का भी आयोजन होता रहता है।

हैदराबादी चूड़ियाँ हर तरह से ख़ास है यहाँ तक कि नाम में भी। यहाँ चूड़ियों के सेट को जोड़ा कहते है। इसमें बीच में कांच की बारीक चूड़ियाँ होती है और आगे पीछे लाख के बनी मोटी चूड़ियाँ होती है जिस पर नग जड़े होते है जिसे गोट कहते है। एकवचन है गोट और दो या अधिक हो यानि बहुवचन में गोटाँ कहते है। इसे देश के अन्य भागों में पाटला कहते है।

जोड़ा दो तरह का होता है - एक पारम्परिक जोड़ा जो ख़ास होता है और दूसरा सादा जोड़ा।

यह है पारम्परिक जोड़ा -

आगे-पीछे गोटाँ (दो गोट) है और बीच में है बारीक काँच की चूड़ियाँ। यह एक हाथ के लिए है, दोनों हाथ में ऐसे ही जोड़ा पहना जाता है। एक हाथ के लिए भी इसे जोड़ा कहते है और दोनों हाथ के लिए हो तब भी जोड़ा ही कहते है।

काँच की यह बारीक चूड़ियाँ आम चूड़ियों जैसी नहीं है। यह रंगबिरंगी नहीं होती। यह सुनहरी होती है। इसीलिए इसे सोनाबाई चूड़ियाँ कहते है।

यह बहुत बारीक होती है। इसे बहुत ध्यान से बनाया जाता है। काँच को गोलाई में बहुत बारीक काटकर उस पर रंग के बजाय सुनहरी परत चढाई जाती है। यह इतनी बारीक होती है कि ज़रा से धक्के से टूट जाती है। बनते-बनते ही कई चूड़ियों में तड़क आ जाती है। इस तरह साबुत चूड़ियाँ कम ही मिलती है। पहनते-पहनते भी तड़क जाती है।

देखिए इस तस्वीर में सोनाबाई चूड़ियाँ, जहाँ काला धब्बा सा नज़र आ रहा है वहाँ तड़की हुई है -

इसीलिए एक दर्जन चूड़ियों की ज़रूरत हो तब दो दर्जन खरीदी जाती है। यह इतनी बारीक होती है कि एक दर्जन चूड़ियाँ पहनने पर साधारण 4-5 चूड़ियाँ पहनने जैसा लगता है। एक दर्जन सोनाबाई चूड़ियाँ 15-20 रूपए में मिल जाती है।

अब बात करते है गोटों की। गोट लाख की बनी होती है जिसके दोनों किनारों पर एक-एक सोनाबाई चूड़ी लगी होती है। भीतरी सतह की परत सफ़ेद या हल्के रंग की होती है। ऊपरी सतह पर नग जड़े होते है। विभिन्न डिज़ाइनों में नग जड़े होने से गोट अलग-अलग डिज़ाइन की होती है।

यह सीमित रंगों के होते है। पारम्परिक जोड़े में भीतरी परत हल्के पीले रंग की होती है और ऊपरी सतह पर सफ़ेद छोटे नग जड़े होते है जैसा कि आपने ऊपर तस्वीर में देखा है। इसे पीला जोड़ा कहते है। इसके अलावा गुलाबी, लाल, फ़िरोज़ा, और हरा, कुल मिलाकर 5 रंग के ही जोड़े मिलते है। इनमें इन रंगों के हल्के शेड की भीतरी परत होती है और ऊपरी सतह पर इन रंगों के छोटे-बड़े नग विभिन्न डिज़ाइनों में होते है साथ ही सफ़ेद नग भी कहीं होते है, कहीं नहीं होते -

गोटों की कीमत अलग-अलग होती है। लाख, उसके ऊपर का पलस्तर, नगों की कटाई के अनुसार कीमत तय होती है। 5-10 रूपए में भी एक जोड़ी गोटें मिल जाती है, लेकिन इनके नग जल्दी झड़ जाते है। प्लास्तर अच्छा नहीं होने से नग निकल जाते है। लाख अच्छा नहीं होने से भी गोट टूट जाती है। पर अक्सर एक बार समारोह में पहनने के लिए ऐसे सस्ते जोड़े खरीद लिए जाते है। अच्छी उपयोगी जोड़ी 75 से 100 रूपए तक मिल जाती है। दो जोड़ी लेने पड़ते है क्योंकि अक्सर दोनों हाथ में पहनने पर ही अच्छा लगता है। बीच में एक दर्जन सोनाबाई चूड़ियाँ हो तब ही अच्छा लगता है। इस तरह दो जोड़ी गोट और दो दर्जन सोनाबाई चूड़ियों के मिलाकर कम से कम 200 रूपए में दोनों हाथ के लिए ऐसा जोड़ा मिल जाता है कि कुछ सालों तक समारोहों में आसानी से पहना जा सकता है। वैसे बहुत अच्छे जोड़े हज़ार रूपए तक मिलते है। सिर्फ़ समारोहों में ही जोड़े पहने जाते है इसीलिए महंगे भी खरीद लिए जाते है, 1000-1500 में खरीद कर 5-6 साल आसानी से पहना जा सकता है। इसके बाद भी उपयोग कर सकते है।

पहले हैदराबाद में समारोहों में महिलाएँ और लड़कियाँ जोड़ा ही पहनती थी। शादी के अवसर पर दुल्हन और उसके करीबी रिश्तेदार अनिवार्य रूप से जोड़ा पहनते थे। दुल्हन को पारम्परिक जोड़ा या गुलाबी जोड़ा पहनाया जाता था। सोने के कंगन सामने और सोने की चूड़ियाँ सोनाबाई चूड़ियों के बीच में पहनी जाती थी। अब चलन कुछ कम हो गया है।

वैसे शादी-ब्याह में लकदक कपड़ों के साथ कलाइयों में दमकते जोड़े ही अच्छे लगते है। दिन हो या रात जोड़े पहने हाथों की शान ही निराली होती है। ख़ासकर रात की रोशनी में जोड़े खूब दमकते है। सबसे अच्छा लगता है फ़िरोज़ा जोड़ा, उसके बाद गुलाबी। पारम्परिक पीला जोड़ा गरिमामय लगता है। हरा कुछ ठीक ही लगता है पर लाल बहुत मद्धम लगता है। इसीलिए लाल जोड़ा कम ही पहना जाता है।

इन जोड़ों का दमकना और मद्धम दिखना नगों पर पड़ने वाली रोशनी के अनुसार होता है जो नगों की कटाई पर भी निर्भर करता है। पहले कारीगर इस काम में बहुत माहिर होते थे। माना जाता है कि कराची में अच्छे नग मिलते है। बँटवारे से पहले यहीं से पत्थर (नग) आते थे जो बाद में आना बन्द हो गए। इन नगों का जोड़ा पाकिस्तानी नगों का जोड़ा कहलाता है।

हमने बचपन में बुज़ुर्ग महिलाओं से पाकिस्तानी नगों के जोड़े की बहुत तारीफ़ सुनी कि पत्थरों (नगों) की चमक, उनकी कटाई और गोटों पर उनकी कारीगरी इतनी बढिया होती थी कि दिन की रोशनी में भी सामने से देखने पर यह गुलाबी नज़र आते थे, एक ओर से हल्के गुलाबी और दूसरी ओर से गहरे गुलाबी नज़र आते थे। लगता है यहाँ हैदराबाद और पाकिस्तान (ख़ासकर कराची) के अलावा दुनिया में शायद ही कहीं यह जोड़े मिलते हो। वैसे भी इन देशों के अलावा शायद बंगला देश में ही चूड़ियाँ पहनी जाती है और अन्य देशों में शायद ब्रेसलेट ही पहने जाते है।

एक बात हम बता दे, हैदराबाद में हर जगह जोड़े नहीं मिलते, बल्कि नए शहर में हैदराबाद के बाहर से आकर बसे लोग तो शायद इसके बारे में जानते भी नहीं। यह जोड़े चारमीनार के पास बने लाड़बाज़ार में मिलते है। हैदराबाद आने वाले चारमीनार ज़रूर देखते है, बस लाड़बाज़ार जाइए और जोड़ा ज़रूर खरीदिए।

सादा जोड़ा, अगले चिट्ठे में…

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6 टिप्पणियाँ »

  1. Bahut badhiya jaankari di aapne. Charmeenar ke paas ke baazar mein mujhe bhi jane ka mauqa mila tha par hum pearl yani sunahre motiyon ki dukanon ka hi chakkar lagate rah gaye.

  2. बहुत खूब

  3. यह भी खूब जानकारी रही…
    दे्खते हैं…कभी काम आती है या नहीं….

  4. rajkumar raghav said

    achchi jaankari di

  5. अनाम said

    good think

  6. nidhi said

    nt good

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