रामेश्वरम में दर्शन

रामेश्वरम में मुख़्य मन्दिर रामालय नाम से जाना जाता है। जैसा कि आम तौर पर देखने में आता है कि मन्दिर के पास ही पूजापा बिकता है वैसा यहाँ पर पूजापा बिकता दिखाई नहीं दिया। यह है मन्दिर का मुख्य द्वार -

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द्वार के पास ही चप्पल-जूते रखने की व्यवस्था है। द्वार के पीछे से ही गलियारा शुरू है और दोनों ओर दुकानें शुरू होती है जो तस्वीर में हल्की सी दिखाई दे रही है। इन दुकानों पर सीप शंख मोती का सामान मिलता है। कुछ दूर जाने के बाद दुकाने समाप्त हो जाती है और गलियारे में सीधा आगे जाने पर अंतिन छोर पर है गणेश जी की मूर्ति। इस तस्वीर में देखिए, मूर्ति तो स्पष्ट नहीं है पर अंतिन छोर देखा जा सकता है -

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ग़णेश जी के दर्शन के बाद वापस गलियारे में लौट आना है। जहाँ गलियारे में दुकाने समाप्त हुई थी वहीं से बाई ओर के गलियारे में कुछ और दुकाने है, यहीं से आगे जाकर अंतिम छोर से दाहिने गलियारे में मुड़ना है जो लम्बा गलियारा है। यहाँ अंतिम छोर पर बाई ओर जटाशंकर जी का मन्दिर है। यानि यहाँ शिव जी जटाशंकर के रूप में है और बाएँ पार्श्व में विराजमान है पार्वती जी। इस रूप में शिव जी का श्रृंगार रूद्राक्ष से होता है। माना जाता है कि रूद्राक्ष में असीम शक्ति होती है। वास्तव में रूद्राक्ष शिव जी के आँसू है। मन्दिर के द्वार के दोनों किनारों पर और तोरण की तरह रूद्राक्ष की मालाएँ लगी है। यहाँ जटाशंकर और पार्वती के दर्शन कर परिक्रमा कर हम सीधे सामने बढ गए। यह गलियारा समाप्त होते ही बाई ओर द्वार है जैसा कि इस तस्वीर में देख सकते है -

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इस द्वार पर पूजापा बिकता है। द्वार से पहले बाईं ओर हनुमान जी का मन्दिर है जहाँ पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग है। हनुमान मन्दिर के बाईं ओर यानि अंत में ठीक द्वार के पास राममन्दिर है जिसमें पारम्परिक रूप में राम सीत लक्ष्मण और उनके सामने भक्त रूप में हनुमान जी की मूर्तियाँ है।

द्वार से निकलने पर दोनों ओर पूजा की सामग्री का बाज़ार सजा है। ठीक सामने लगभग आधा किलोमीटर तक सड़क है जिसके अंत में दाहिनी ओर भद्रकाली का मन्दिर है और बाई ओर दो-चार क़दम आगे बढने पर समुद्र का किनारा है। आश्चर्य होता है कि भद्रकाली के मन्दिर आने तक भी समुद्र होने का अंदाज़ा नहीं होता। समुद्र किनारे के इस स्थान को अग्नि तीर्थम कहते है, देखिए यह तस्वीर -

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जी हाँ, है समुद्र का किनारा और नाम है अग्नि तीर्थम। अब यह स्थान, मन्दिर तक का रास्ता, पूजापा का यहाँ मिलना और वहाँ मुख्य द्वार पर न मिलना, इन सबको समझने के लिए हम पौराणिक कथा संक्षिप्त में बता रहे है।

लंका विजय के बाद राम अपनी सेना के साथ सीता को लेकर लौट आए। अपनी भूमि यानि समुद्र किनारे आने पर राम को लगा कि रावण का वध एक पाप है और इस पाप से राम मुक्ति पाना चाहते थे जिसके लिए वो शिव की आराधना करना चाहते थे। राम ने हनुमान को शिवलिंग लाने के लिए कैलाश भेजा। हनुमान ने रास्ते में एक स्थान पर कुछ भक्तों को रामभजन करते देखा और वो भी इस टोली में शामिल हो गए। शिवलिंग की स्थापना का मूर्हत निकट आ रहा था और हनुमान लौटे नहीं थे, तब राम ने सीताजी से समुद्र किनारे रेत का शिवलिंग बनवाया। बाद में हनुमान को शिवलिंग लाने का ध्यान आया। जब हनुमान कैलाश से शिवलिंग लेकर पहुँचे तब तक लिंग स्थापना का मूर्हत बीत चुका था और सीता द्वारा बनाए गए लिंग की स्थापना हो चुकी थी। हनुमान के कहने पर कि इस लिंग का क्या होगा, राम ने कहा कि पहले इसी लिंग की पूजा होगी क्योंकि इसी लिंग को लाने की पहले बात हुई थी पर स्थापना सीताजी द्वारा तैयार लिंग की होगी क्योंकि मूर्हत के समय यही लिंग तैयार हुआ था।

सीताजी द्वारा शिवलिंग तैयार किया गया था इसीलिए यहीं पर है भद्रकाली का मन्दिर। इस तरह समुद्र के किनारे युद्ध की, वध की अग्नि को शान्त किया गया इसीलिए यह अग्नि तीर्थ कहलाया।

अब बात करते है दर्शन की। मुख्य द्वार से सीधा सामने हमने गणेश जी के दर्शन किए जैसा कि परम्परा है कि पहले गणेश जी के दर्शन किए जाते है। फिर की शिव की असीम शक्ति रूद्राक्ष के साथ यानि जटाशंकर के दर्शन किए जाते है फिर द्वार से निकल कर अग्नि तीर्थम जाकर स्नान किया जाता है। यहाँ महिलाओं के लिए अलग कक्ष भी है। अगर स्नान न करना चाहो तो समुद्र के पानी की कुछ बूँदे सिर पर डालने से भी तीर्थ स्नान माना जाता है।

इस तीर्थस्नान के बाद मन्दिर के द्वार से पूजापा खरीदा जाता है। पूजापा में नारियल, अगरबत्ती, धूप, फूल आदि पूजा की सामग्री के अलावा शिवजी के लिए बेलपत्र और पार्वती जी के लिए कमल के फूल के भी मिलते है। गुलाबी कमल ही दिखाई दिए, सफ़ेद कमल नज़र नहीं आए।

पूजापा लेकर भीतर आते ही पहले हनुमान जी की पूजा की जाती है। छोटे से मन्दिर में परिक्रमा भी की जा सकती है। फिर यही रखे शिवलिंग की पूजा करनी है। इसके बाद राममन्दिर में पूजा कर परिक्रमा करने के बाद मुख्य मन्दिर में दर्शन करने के लिए जाना चाहिए।

इस तरह पारम्परिक रूप में पहले गणेश जी के दर्शन हुए और कथा के अनुसार हनुमान जी और उनके द्वारा लाए गए लिंग की पूजा पहले की गई।

मुख्य मंदिर में जाने से पहले कुंड स्नान किया जाता है जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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6 टिप्पणियाँ »

  1. संगीता पुरी said

    बहुत विस्‍तार से आपने रामेश्‍वरम के बारे में जानकारी दी … अगली कडी का इंतजार रहेगा।

  2. Dinesh Sanwal said

    Sir,
    Thanks for detail information about Rameshwaram. Hope information will very useful for all Indian as well world.
    Dinesh Sanwal, Lucknow U.P.

  3. Dr.S.N.Tiwary said

    Thanks, your presantation is very good please add some more photo or vedio.

  4. som kumud ojha said

    RAMESHWARAM TEERTH STHAL ke bare mein bahut hi achha lekh padha thanks somkumud ojha renukoot U,P

  5. NIMISHA said

    BAHUT BAHUT DHANYAVAD AAP MAHANUBHAV KI VAJAH SEHI MUJHE IS TIRTH STHAL KE BARE ME GYAN PRAPT HUVA. VINTI HAI KUCHH OUR
    PHOTO SHAMIL KIYE JAY

  6. nitin said

    RAMESHWARAM TEERTH STHAL ke bare mein bahut hi achha lekh padha thanks

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