हैदराबाद की पहचान

हैदराबाद की पहचान आजकल सिर्फ़ एक ही चीज़ से होती है - हैदराबाद की बिरयानी

कुछ आगे बढे तो हैदराबादी ज़बान (भाषा) की बात की जाती है, वो भी फ़िल्मों में महमूद द्वारा बोली गई भाषा के आधार पर ही।

पर हैदराबाद में बहुत कुछ है जो इसे अन्य स्थानों से ख़ास बनाता है…

हैदराबाद एक रियासत थी। यहाँ निज़ाम का शासन था। हैदराबाद का पुराना नाम भाग्यनगर है जो शासक कुली कुतुबशाह की बेगम भागमती के नाम पर रखा गया। एक निर्धन हिन्दु परिवार की कन्या भागमती से कुली कुतुब शाह ने प्रेम विवाह किया था और बसाया था शहर भाग्यनगर। इस तरह हैदराबाद की नींव में है गंगा-जमनी तहज़ीब और इसी तहज़ीब (सभ्यता) को बनाए रखते हुए भाग्यनगर के विकास के लिए उत्तर भारत से बुलाए गए कायस्थ जो पढने-पढाने आए तो व्यापार के लिए राजस्थान से बुलाए गए मारवाड़ी। बाद में कुली कुतुब शाह और भागमती के सुपुत्र हैदर अली के नाम से भाग्यनगर का नाम बदल कर हो गया हैदराबाद।

स्वतंत्रता संग्राम के समय दक्षिण भारत से उठने वाली आज़ादी की लहर को देश से जोड़ने महाराष्ट्र से मराठे आए। इनसे बाद में आर्य समाज का यहाँ बहुत विस्तार हुआ। आज़ादी मिलने के बाद रजवाड़ों, रियासतों को अखण्ड भारत में मिलाया गया। हैदराबाद आख़िरी रियासत रही जो अखण्ड भारत में मिली इस तरह निज़ामशाही का अंत हुआ। आख़िरी निज़ाम रहे मीर उस्मान अली पाशा।

इसके बाद 1 नवम्बर 1956 को आन्ध्र प्रदेश राज्य की स्थापना हुई और हैदराबाद शहर बना राजधानी। पचास के दशक में राजधानी बनने के बाद आन्ध्र प्रदेश के अन्य ज़िलों से लोग राजधानी हैदराबाद में आकर बसने लगे और अपने साथ लाए आन्ध्र संस्कृति। धीरे धीरे हैदराबाद में लोगों का आना बढने लगा जिससे हैदराबाद की भाषा पर आन्ध्र प्रदेश की भाषा तेलुगु और हैदराबाद की संस्कृति पर आन्ध्र संस्कृति हावी होने लगी।

हैदराबाद के पुराने शहर में तो जगह अधिक नहीं थी सो आन्ध्रवासी नए शहर में बसने लगे। इसी से पुराना शहर इस संस्कृति के संपर्क में अधिक नहीं आया जिसका नतीजा यह हुआ कि हैदराबाद की संस्कृति पुराने शहर तक ही सिमट कर रह गई। इसीलिए बाहर से हैदराबाद आने वाले हैदराबाद की 400 साल पुरानी तहज़ीब से पूरी तरह परिचित नहीं हो पा रहे है। यही सोच कर इस शहर के रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान, लोक पर्व, लोक संगीत, भाषा आदि की जानकारी देने का प्रयास इस चिट्ठे में होगा।

इस श्रृंखला की हर कड़ी में हैदराबाद की एक ख़ासियत से आपकी पहचान कराने की कोशिश होगी…

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3 टिप्पणियाँ »

  1. प्रतीक्षा रहेगी अगली कड़ी कि. आभार.

  2. ranju said

    रोचक अगली कड़ी में इस शहर के बारे में जानने का इन्तजार रहेगा शुक्रिया

  3. काफी दिन के बाद आपके चिट्ठे पर आने का मौका मिला. हैदराबाद पर पहला आलेख देखा. अच्छा लगा. आपने लिखा है कि

    “इस श्रृंखला की हर कड़ी में हैदराबाद की एक ख़ासियत से आपकी पहचान कराने की कोशिश होगी…”

    यह एक खुशी की बात है. जम कर लिखिये. बाद में इनको गूगल नॉल पर जोड दें.

    सस्नेह — शास्त्री

    — हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

    महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

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