ममता जी की पोस्ट ब्राउन राइज़ पर…

ममता जी, ब्राउन राइस भारतीय संस्कृति के लिए नई बात नहीं है।

इसे मोटा चावल या कूटा चावल कहा जाता है और मोटे अनाज में इसकी गिनती होती है जिसका अर्थ है खेत में कटाई के बाद सीधे खाने में प्रयोग करना जबकि वास्तव में फसल की कटाई के बाद अन्न के दानों की अच्छी तरह से सफ़ाई की जाती है जिसे पाँलिश करना कहते है। पाँलिश के बाद ही इसे अनाज कहा जाता है। इसीलिए व्रत के भोजन में कुछ लोग अनाज नहीं खाना चाहते तब यह मोटा अनाज जा कूटा अनाज खाया जाता है क्योंकि इसे अनाज की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। जब यह मोटा अनाज चावल हो तो इसे कूटा धान कहते है।

इसे मोटा धान या मोटा अनाज कहा जाता है वैसे इसके क्षेत्रीय नाम भी है जैसे यहाँ हैदराबाद में इस ब्राउन चावल को धूसा बियम कहा जाता है। बियम का अर्थ है चावल। हमारे यहाँ खासकर गणेश चतुर्थी और अनन्त चतुर्दशी के व्रत में इसे खाया जाता है। मैनें कुछ महाराष्ट्रियन परिवारों में भी यह चलन देखा है। मैं यह पोस्ट इसी अवसर पर तस्वीरों के साथ लिखने वाली थी पर अब ममता जी की पोस्ट देख कर सोचा अभी लिख दें।

पहले यह सभी किराने की दुकानों पर मिल जाता था पर बाद में धीरे-धीरे इसका चलन कम होने लगा। लोग इसे मोटा अनाज और बिना पाँलिश किया ख़राब अनाज मान कर कम प्रयोग करने लगे इसी से दुकानों में कम मिलने लगा।

हमारे यहाँ पारम्परिक रूप से इसे खाया जाता है। कुछ साल पहले एक बार स्थिति ऐसी आई कि धूसा बियम मिल ही नहीं रहा था फिर एक किराने का दुकानदार महाराष्ट्र परिवार का था सो उन्होनें उनके लिए मँगाए गए चावल में से हमें दिया और बताया कि अगर पहले से बता दिया जाता तो मँगवा कर रखते यानि केवल आर्डर पर ही यह मिलने लगा। इस तरह हम हर साल आर्डर दे कर खरीदने लगे।

लगभग तीन-चार साल पहले एक बड़े स्टोर से जब मैं खाने का सामान खरीद रही थी तब एक पैकेट पर नज़र पड़ी। एक किलो के चावल का पैकेट जिस पर अंग्रेज़ी में लिखा था ब्राउन राइज़। चावल तो वही था पर एक फ़र्क था। यह चावल अच्छी क्वालिटी का था यानि बारीक था। मैनें मोटे चावल के बारे में पूछा तो बताया गया कि मोटा चावल नहीं मिलता है।

बाद में पता चला कि अब इसमें वैज्ञानिक रूप से सुधार किया गया है। यहाँ मैं एक बात बता दूँ कि पाँलिश करने में अनाज के दानों की ऊपरी परत या झिल्ली के पौष्टिक तत्व कुछ नष्ट होते है और इन दानों का रंग भूरे से सफ़ेद हो जाता है। इस तरह मोटा धान अधिक पौष्टिक रहता था। इस बात को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक रूप से ऐसी किस्में तैयार की गई जिसमें भूरापन पाँलिश के बाद भी बना रहता है और पौष्टिकता भी बनी रहती है। यहाँ तक कि चावल के दानों में जो स्टार्च के कण (ग्रैनुअल) होते है उनका भूरापन भी बना रहता है। पकने पर स्टार्च के कणों से यह दाने फूल जाते है इसीलिए खाने पर पेट भरा रहता है और तृप्ति की अनुभूति होती है। इन नई किस्मों के चावल बहुत बारीक भी है यहाँ तक कि बासमती चावल में भी ब्राउन राइज़ मिल रहा है। इसमें पौष्टिकता अधिक होती है। अब तो यह खाने-पीने के सामान के लगभग सभी बड़े-छोटे स्टोर में मिल जाता है।

खेद इस बात का है कि हमारी संस्कृति के अनुसार जो मोटा धान खाना जाता है वो अब नहीं मिल रहा क्योंकि यह तो अनाज हो गया है। हो सकता है वास्तविक मोटा धान शायद अब भी कहीं, शायद छोटे शहरों में मिलता हो।

इस मोटे चावल को पकाने के लिए पहले थोड़ा सा उबाल लिया जाता था फिर इन मोटे दानों को कूटा जाता था। कूटने के बाद भी यह मोटा रह जाता था फिर इसे चावल की तरह पकाया जाता था। आजकल मिल रहे ब्राउन राइज़ को तो सीधे चावल की तरह ही पका लिया जाता है। हम भी आजकल इसी चावल का प्रयोग कर रहे है, वैसे यह चावल भी कुछ मोटा ही है पर उतना नहीं है। खेद तो होता है कि पौष्टिकता तो बनी है पर संस्कृति नहीं बच पाई है…

यहाँ मैं बता दूँ कि इस ब्राउन राइज़ को चावल की तरह ही पकाइए और पकते समय थोड़ा सा घी छोड़ दीजिए। इसे दही की कढी के साथ खाइए।

दही की कढी बनाने के लिए सामग्री है -

आवश्यकता के अनुसार दही, थोड़ा सा गेहूँ का आटा, एक छोटा चम्मच ज़ीरा, तीन चार हरे मिर्च, हरे धनिए की थोड़ी पत्तियाँ, पिसी हरी मिर्च का पेस्ट और नमक स्वाद के अनुसार।

दही को फेंट लीजिए। दही पतला होना चाहिए, चाहे तो पानी मिलाकर पतला कर सकते है। थोड़ा सा दही एक कटोरी में लेकर उसमें आटा घोल लें फिर इस घोल को पूरे दही में मिलाकर गरम होने के लिए रखें पर इसे ढके नहीं। ढकने पर दानों की परत सी जमा हो जाती है जो स्वाद बिगाड़ती है। अब छौंक लगाए जिसके लिए थोड़ा सा घी या रिफ़ाइन्ड आँयल गरम करें, ज़ीरा डाल दें, दाने चटकने लगे तब हरी मिर्च के टुकड़े डाल दें, थोड़ा सा सुनहरा होने पर हरी मिर्च का पेस्ट डाले फिर एक दो बार चम्मच चलाने से ही भुन जाएगा फिर इसे उबलते दही में डाल दें। नमक डाल कर थोड़ा उबाल आने तक आँच पर रखे। अब आँच से उतार ले, ऊपर से हरे धनिए की पत्तियाँ डाले। गरमागरम चावल दही की कड़ी के साथ खाइए, बहुत स्वाद आएगा।

Advertisements

2 टिप्पणियाँ »

  1. ranju said

    बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने शुक्रिया

  2. बिहार और उत्तरप्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में लोग सामान्यतः ब्राउन राईस का ही उपयोग करते हैं.

RSS feed for comments on this post · TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s