जैन मन्दिर

दीपावली आ रही है। साथ में ला रही है कई कथाएँ।

दीपावली और उसके आस-पास के दिन विभिन्न समुदायों में विभिन्न कारणों से विभिन्न स्वरूप में मनाए जाते है। दीपावली का दिन भगवान महावीर के महानिर्माण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन जैन मन्दिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है।

आन्ध्र प्रदेश में नलगोण्डा ज़िले के बाद है वरंगल और इन दोनों के बीच में है जैन मन्दिर जो हैदराबाद से लगभग तीन घण्टे की दूरी पर है।

मन्दिर की बनावट बहुत ही सुन्दर है। इस द्वार से हमने मन्दिर के प्रांगण में प्रवेश किया -

यह है मन्दिर का प्रवेश द्वार -

प्रवेश द्वार के दोनों ओर ऐरावत है जिस पर शायद महाराज अग्रसेन विराजमान है -

इन मूर्तियों को जिन्होनें बनवाया उनके नाम और पते इन मूर्तियों पर खुदे है। यहाँ से प्रवेश करने पर भीतर मन्दिर का बड़ा कक्ष है जिसमें सामने बीचों-बीच भगवान महावीर की विशाल मूर्ति है।

दोनों ओर की दीवारों से सटी भगवान महावीर के विभिन्न रूपों की मूर्तियाँ है। साथ ही श्लोक भी है जिनसे विभिन्न कथाओं और घटनाओं का पता चलता है।

इस मन्दिर में सवेरे सूर्योदय और शाम में सूर्यास्त पर आरती होती है जिसके अलावा दिन में 11 बजे और दोपहर बाद भी आरती होती है।

हम दिन में 11 बजे की आरती के समय पहुँचे। भीड़ नहीं थी। बहुत कम लोग थे। हम सोच रहे थे जिस तरह आमतौर पर मन्दिरों में आरती होती है वैसे ही होगी यह आरती भी हालांकि हमें कुछ अटपटा सा लगा कि 11 बजे के समय आरती होती है।

ख़ैर… दर्शन तो हमने कर लिए थे और हम वहाँ से निकलना चाहते थे क्योंकि हमें वरंगल जाना था पर एक महाशय ने हमें रोक लिया, कहा कि अभी आरती शुरू होगी, आरती में शामिल हो जाइए। हम सोचने लगे कि यह महाशय हमें क्यों रोक रहे है फिर शिष्टाचार के नाते हम रूक गए।

फिर हमने देखा पंडित जी ने हाथ में माइक लिया और कुछ कहा शायद आरती शुरू करने की बात कही। हमें लगा शायद पंडित जी माइक पर आरती गाते होंगे लेकिन और कोई पुरोहित हमें नज़र नहीं आया जो आरती कर सके।

तभी हमने सुना पंडित जी माइक पर कुछ बोलने लगे फिर यह महाशय जिन्होनें हमे रोका था, कुछ कहने लगे जिसके बाद कक्ष में बैठे भक्तगण भी कुछ कहने लगे। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है।

फिर ध्यान से सुना किसी ने कहा पचास पण फिर किसी ने कहा सत्तर पण। अरे पण का मतलब तो रूपया होता है… फिर उस महाशय ने कहा ढाई सौ पण जिसके बाद सभी चुप हो गए। पंडित जी ने कहा ढाई सौ पण एक, ढाई सौ पण दो, ढाई सौ पण तीन फिर चुप्पी छा गई।

इसके बाद पंडित जी ने रजिस्टर खोला और उसमें उस महाशय का नाम, पता और शायद गोत्र आदि लिखने लगे। तब हमें लगा कि यह महाशय आरती के लिए हमें क्यों रोक रहे थे। शायद इन्हें पूरा विश्वास था कि यह आरती सबसे ऊँची बोली लगाकर यह अपने नाम कर ही लेगें।

हमारा तो यह बिल्कुल ही पहला अनुभव था। हम नहीं जानते कि आरती की यह प्रथा क्यों है ? अगर कोई बताना चाहे तो बताएं।

आरती के बाद प्रसाद में चूरमा दिया गया। हम प्रसाद लेकर बाहर आए। पता चला कि बाहर एक विशेष कैनटीन है जो मन्दिर की संस्था द्वारा ही चलाई जाती है जिसमें ख़ास जैन पद्धति का भोजन और अल्पाहार मिलता है। भोजन का समय एक बजे से था। हमने सोचा अल्पाहार लेते है पर हमें बताया गया कि यहाँ सिर्फ़ जैनियों को ही दिया जाता है सबको नहीं।

और हम बाहर निकल आए।

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7 टिप्पणियाँ »

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  2. इस मंदिर की जानकारी देकर आपने हमें उपकृत किया है. वहाँ की परंपरा उचित नहीं लगती. आभार.
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  3. Ranjan said

    ये परंपरा तो सभी जैन मंदिरो में है..चाहे नाकोडा हो या ्रणकपुर.. जिसके पास पैसा होता है वो ही पुजा करता है..

    बहुत अजीब लगता है ये नीलामी देखकर..

  4. Lavanya said

    अच्छी पोस्ट !
    – लावण्या

  5. Annapurna said

    प्रदीप जी, सुब्रमण्यम जी, रंजन जी, लावण्या जी धन्यवाद !

  6. मंदिर की जानकारी देकर आपने हमें उपकृत किया है. वहाँ की परंपरा उचित नहीं लगती. आभार.

  7. jayshree sisodia said

    ya sistem bahut purane samay se hai.pata nahi knyo banaya gaya.shayed
    mandir vyavastha ke liye.

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