साईंबाबा का समाधि मन्दिर

शिरडी के साईबाबा मन्दिर में एक बात बहुत अच्छी लगी कि यहाँ सभी श्रद्धालु दर्शन के लिए एक ही कतार में प्रतीक्षा करते है।

दूसरे मन्दिरों में व्यवस्था है कि एक निश्चित शुल्क देकर जल्दी दर्शन किए जा सकते है, यहाँ ऐसी कोई व्यव्स्था नहीं है। बाबा के लिए सभी भक्त बराबर है।

यह है मन्दिर का कलश -

मन्दिर परिसर में अपने चप्पल-जूते, कैमरा, सेलफोन रखवा कर सुरक्षा पट्टिका से गुज़रते हुए हम कतार में खड़े हो गए। यहाँ से आगे बढकर लेंडी पार्क से होकर गुज़रते हुए सड़क पर आना पड़ता है।

लेंडी पार्क शिरडी में बाबा द्वारा संवारा जाता था। आज भी इसे अच्छे पार्क की तरह रखा गया है। यहाँ रंग-बिरंगे फूलों के पौधों के अलावा बड़े पत्थरों के पास जल-प्रपात का छोटा सा ख़ूबसूरत नज़ारा भी है। पता नहीं बाबा ने इसका नाम लेंडी पार्क क्यों रखा ख़ैर…

पार्क से निकल कर सड़क के किनारे से ही आगे बढते हुए दूसरे द्वार से प्रवेश कर मन्दिर के मुख्य परिसर में हम आ गए।

इस चित्र में देख सकते है सड़क के किनारे से होकर मन्दिर की ओर बढते हुए -

भीतर कतार में लगभग दो घण्टे तक दर्शन के लिए प्रतीक्षा की गई पर यहाँ व्यव्स्था अच्छी है। टेलीविजन लगे है जिसमें भीतर गर्भ गृह दिखाई देता है, इस तरह लगातार बाबा के दर्शन होते रहे।

सवेरे 4 बजे से रात में 10 बजे तक हर 2-3 घण्टे के बाद आरती होती है। इस तरह सुबह से रात तक कुल 5-6 बार आरती होती है। हम सवेरे 9 बजे पहुँचे और 11 बजे की आरती के समय हमारी बारी आई दर्शन करने की।

गर्भगृह के बड़े कक्ष में लगभग 1200 लोगों के लिए स्थान है। इतने ही लोगो को बड़े कक्ष में लेकर बाकी को रोक दिया गया। फिर हम सब को बड़े कक्ष में बैठाया गया जिसके बाद शुरू हुई आरती। बाबा की आरती सम्पन्न होने के बाद सभी को दोनों ओर से कतार में दर्शन के लिए आगे भेजा गया।

गर्भगृह भी बड़ा है। यहाँ दोनों ओर दीवारों पर उन सब की तस्वीरें लगी है जो शिरडी मे साईबाबा के साथ रहा करते थे - बाईजा माँ, कुलकर्णी, म्हालसापति, गणपति राव आदि। सामने तीन कमानें बनी है जिस पर चाँदी की कलाकृति में विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियाँ है। पीछे भी ऐसे ही तीन कमान है और बीच की कमान में सोने के विशाल सिंहासन पर साईबाबा की विशाल मूर्ति है। मूर्ति के ठीक सामने साईबाबा की समाधि है।

यहाँ दो पुरोहित है जो श्रद्धालुओं द्वारा चढाए जा रहे फूलों के हारों को बाबा के चरणों में रख रहे थे और फूलों के गुच्छों को समाधि पर चढा रहे थे। कुछ श्रद्धालु समाधि पर चढाने के लिए चादर भी ले आए, इन चादरों को यह दोनों पुरोहितों मिलकर समाधि पर चढाते रहे। दूसरी चादर आने पर पहली चादर हटा दी गई।

हमने पहले ही कतार में खड़े होकर टेलीविजन पर देखा कि जब फूलों का ढेर लग जाता तब कुछ समय के लिए दर्शन रोक दिए जाते और वहाँ से फूलों को हटाया जाता, झाड़न से साफ़ किया जाता फिर श्रद्धालुओं का तांता लगता।

दर्शन कर हम बाहर आए। बाहर परिसर में भी देखने के लिए बहुत है जिसका विवरण अगले चिट्ठे में…

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2 टिप्पणियाँ »

  1. sameerlal said

    आभार-बहुत बढ़िया विवरण.

    —————————–

    निवेदन

    आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.

    ऐसा ही सब चाहते हैं.

    कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.

    हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.

    -समीर लाल
    उड़न तश्तरी

  2. Annapurna said

    धन्यवाद समीर जी !

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