कैसे गुम होती है कला

इतिहास के पन्नों में कला के कई नमूने देखने को मिलते है।

आज वास्तविकता में यह कभी-कभार देखने को मिलते है और कुछ तो केवल चर्चा का विषय रह गए है। अब देखें कि कोई कला गुम कैसे होती है।

यह 11 वीं सदी की वास्तुकला का एक नमूना है। मूर्ति की जो छोटी रचनाएं होती है जैसे नाक, आँखें वग़ैरह वह टूटने लगती है जिससे कला का मौलिक रूप बिगड़ने लगता है -

जब यह टूट-फूट अधिक हो जाती है तो समझना मुश्किल हो जाता है कि प्रतिमा का वास्तविक रूप कैसा है। यहाँ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह गणेश जी की मूर्ति है -

अगर इस टूट-फूट को रोका न गया तो यह कला देखने को ही नहीं मिलेगी और गुम हो जाएगी क्योंकि अब वो कलाकार तो रहे नहीं। जब राजपाट ही समाप्त होने लगता है तब उस दौर की गतिविधियाँ भी तो रूक जाती है।

यह दक्षिण भारत की वास्तुकला है जो काकतीय वंश के शासन में प्रचलित होने से काकतीय कला कहलाई। यह मूर्तियाँ आन्ध्र प्रदेश के वरंगल ज़िले के प्रसिद्ध हज़ार स्तम्भ के मन्दिर में है जिसके बारे में हम पहले ही एक चिट्ठा लिख चुके है।

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3 टिप्पणियाँ »

  1. बिल्कुल सहमत हूँ आपसे. इसे रोका जाना आवश्यक है. आपने अच्छा मुद्दा लिया है.

  2. Annapurna said

    धन्यवाद समीर जी !

  3. Krishna dandotiya said

    I agree with you sir g .
    I must be get stopped otherwise our next generation will not able to see this .
    Thanks

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