श्रीशैलम – मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर

कृष्णा बाँध के नरीमन प्वाइंट्स पर रूक-रूक आनन्द लेते हुए हम पूरी चढाई चढकर मुख्य मंदिर के मुख्य रास्ते पर पहुँचे।

यहाँ बाईं ओर गणपति का छोटा सा मन्दिर है जिसे साक्षी गणपति कहते है। जैसा कि हम सब जानते है कि गणपति प्रथम देवता है और सबसे पहले गणेश पूजन ही किया जाता है। हमने भी यहाँ पूजा की।

सड़क पर ही छोटा सा जाली का कक्ष जैसा है जिसमें गणेश की प्रतिमा है। दर्शन के लिए लाइन सड़क पर ही लगानी है और यहीं पर पूजा की सामग्री बिकती है। लाइन ज्यादा लम्बी नहीं थी और दर्शन जल्दी हो गए।

इस तरह श्रीशैलम में प्रथम पूजा प्रथम देवता की सम्पन्न कर मुख्य मन्दिर के लिए आगे बढा जाता है शायद इसीलिए इसे साक्षी गणपति कहते है कि गणपति साक्षी है कि किन भक्तों ने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए चढाई पूरी की।

इसके थोड़ी ही दूरी पर है मुख्य मन्दिर। श्रीशैलम पर्वत पर बने इस मन्दिर में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिसका बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान है। इसे मल्लिकार्जुन स्वामी कहते है और इस मन्दिर को मल्लिकार्जुन स्वामी का मन्दिर कहते है।

श्रावण मास में इस मन्दिर में शिवजी की पूजा का बहुत महत्व है। यह है मन्दिर का मुख्य द्वार -

यह बड़ा द्वार तो बन्द रहता है, किनारे के छोटे द्वार से भीतर प्रवेश किया जाता है। भीतर एक लम्बा गलियारा पार करने के बाद दाहिनी ओर क्लाँक रूम में हमने अपना कैमरा, सेलफोन वग़ैरह रखवाया और बाईं ओर लगी टिकट खिड़कियों पर आ गए।

सौ रूपए प्रति व्यक्ति से टिकट ख़रीदा और विशेष दर्शन की कतार में खड़े हो गए क्योंकि भीड़ इतनी थी कि हम भक्तों की सीधी कतार में निःशुल्क दर्शन की सोच भी न पाए।

वैसे इस तरह के दर्शन हमें अच्छे नहीं लगते है, लगता है जैसे भगवान से मिलने के लिए हमारे पास समय नहीं है और हम किसी तरह जल्दी से दर्शन कर औपचारिकता पूरी करना चाहते है। लेकिन भीड़ बहुत थी इसीलिए हमने सोचा अगले दिन सुबह पाँच बजे मन्दिर खुलता है, हम साढे चार बजे ही आ जाएगें पर अफ़सोस सुबह साढे चार बजे भी बहुत भीड़ थी और हमें दुबारा विशेष दर्शन का टिकट लेना पड़ा।

भीतर गर्भगृह में नीम अँधेरा था। हमनें ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। तीरथ लिया। इसके ठीक सामने एक और शिवलिंग स्थापित था जहाँ लोग बैठे शिवलिंग का अभिषेक कर रहे थे। पंडितजी अभिषेक करवा रहे थे। अधिकतर लोग जोड़े से बैठे थे यानि पति-पत्नी साथ-साथ। इस अभिषेक के लिए विशेष शुल्क देकर टिकट लेना पड़ता है।

हम गर्भगृह से बाहर निकल आए। दूसरी ओर स्थित माता के मन्दिर में हमने पूजा-अर्चना की। कुछ देर मन्दिर के विशाल प्रांगण में बैठे रहे। फिर पीछे की ओर लगे काउंटर से हमने प्रसाद लिया और मन्दिर से बाहर निकल आए।

आगे का विवरण अगले चिट्ठे में।

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2 टिप्पणियाँ »

  1. रोचक जानकारी!! बढ़िया यात्रा वृतांत..आभार.

  2. Annapurna said

    धन्यवाद समीर जी !

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