भुवनगिरि का क़िला

सुरेन्द्रपुरी से बाहर निकल कर हम हैदराबाद लौटने लगे।

रास्ते में एक शहर है - भोन्गिर वास्तविक नाम है भुवनगिरि। पहले यह शहर बर्फ़ की फ़ैक्ट्रियों के लिए मशहूर था। लगभग बीस-पच्चीस साल पहले तक हैदराबाद के बर्फ़ के छोटे बड़े सभी व्यापारियों को बर्फ़ यहीं से भेजी जाती थी।

विशेषकर रेलवे स्टेशन और बस अड्डे के पास बर्फ़ के छोटे-छोटे बहुत से कारख़ाने हुआ करते थे ताकि हैदराबाद और वरंगल से कारख़ानों में काम करने के लिए आने वालों को सुविधा रहे। सुबह धूप तेज़ होने से पहले बर्फ़ की लारियाँ हैदराबाद की ओर दौड़ने लगती थी पर अब यहाँ ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया।

यहाँ भी आधुनिकता का रंग चढ गया है। बाज़ार बस गए है लेकिन नहीं बदला तो भुवनगिरि का क़िला। बस अड्डे के ठीक सामने। पहले सामने ही नज़र आ जाया करता था पर अब बाज़ार बसने से दुकानों के पीछे से और ऊपर से नज़र आता है। हमने भी क़िला देखने की सोची और बस अड्डे के सामने थोड़ा आगे जाकर बाईं ओर मुड़ गए।

थोड़ा ही आगे बढने पर नज़र आया क़िले का फाटक -

बड़ा फाटक हमेशा ही बन्द रहता है। पास लगे छोटे से दरवाज़े से रास्ता है। फाटक से ही सामने दिखाई दे रहे है पहाड़ और दाहिनी ओर पहाड़ के नीचे हनुमान जी का छोटा सा मन्दिर है।

मन्दिर जाने के लिए फाटक के भीतर जाने की आवश्यकता नहीं है। फाटक से आगे एक रास्ता भीतर की ओर जाता है। मोड़ पर मन्दिर की कमान भी लगी है। थोड़ा आगे बढते ही बाईं ओर मन्दिर है। हमने मन्दिर में दर्शन किए फिर आ गए फाटक पर।

छोटे दरवाज़े से भीतर गए। दरवाज़े पर ही टिकट बाबू बैठा था। तीन रूपए टिकट है। टिकट देकर उसने हमें समझाया कि कैसे जाना है।

सामने दिखाई दे रहे पहाड़ पर चढ कर आगे बढना है। पहाड़ के बीचों-बीच एक मूर्ति है जो चित्र में फाटक के पीछे धुँधली सी नज़र आ रही है। यहाँ तेलुगु में कुछ लिखा है जो हम ठीक से समझ नहीं पाए। मूर्ति के पास तक जा सकते है पर बहुत पास नहीं जा सकते क्योंकि हमें बताया गया कि यहाँ करंट है। ख़ैर हम समझ नहीं पाए कि मूर्ति है किसकी…

कोई और बोर्ड भी वहाँ नहीं था जिससे हमें पता नहीं चला कि यह किस राजा का क़िला है और किसने कब बनवाया। यह जानकारी टिकट बाबू से भी नहीं मिली और वहाँ टिकट बाबू के अलावा और कोई अधिकारी या कर्मचारी नज़र नहीं आया।

टिकट बाबू के बताए अनुसार हम आगे बढे और पहला पहाड़ चढ कर पार किया -

इसके बाद बाईं ओर सीढियाँ है -

तीन सौ से कुछ अधिक ही सीढियाँ है। आगे की चढाई अगले चिट्ठे में…

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4 टिप्पणियाँ »

  1. mehek said

    aare baap re 300 sidhyan,killa to bahut achha dikh raha hai dur se:)

  2. घर से हैदराबाद लौटते हैं तो ट्रेन की खिडकी में से नज़र आती है भुवनगिरी की पहाडी…बस इतना ही देखा है।

  3. बड़ी लम्बी डगर है जी..हम तो फोटो में ही दर्शन करके धन्य हो लेंगे. 🙂

  4. Annapurna said

    महक जी समीर जी धन्यवाद !

    नितिन जी हो सके तो एक बार पूरा देख आइए। एक अलग ही अनुभव होगा।

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