यादगिरी गुट्टा का मन्दिर

यादगिरी गुट्टा में लक्ष्मीनारायणा स्वामी मन्दिर के परिसर में पहुँच कर हम पहले कुंड के पास गए।

पहले मन्दिर में प्रवेश करने से पहले कुंड में स्नान किया जाता था। पुरूष और बच्चे स्नान करते थे तथा महिलाएँ अक्सर हाथ-पैर धो लिया करती थी।

इस बार हमने कुंड देखा तो हैरान हो गए। पानी बहुत कम था। गन्दगी बहुत थी -

यहाँ तक कि कुंड के पास स्थित छोटे से हनुमान मन्दिर के पास इतनी कीचड़ और कंजाल थी कि मन्दिर के भीतर जाना तो क्या बाहर से दर्शन करने के लिए खड़े रहना भी कठिन हो गया।

वास्तव में कुंड में स्नान करने के बाद कुंड के किनारे स्थित हनुमान जी के छोटे से मन्दिर में दर्शन करने के बाद मुख्य मन्दिर में जाना चाहिए।

हम कुंड के पास गए पर पानी छूने की हिम्मत नहीं हुई। मन्दिर के बाहर कठिनाई से खड़े होकर हनुमान जी के दर्शन किए और मुख्य मन्दिर की ओर बढ गए।

भीड़ बहुत थी, एक तो दूसरे शनिवार की आम छुट्टी और बड़ी एकादशी। हमने सोचा सीधे लाइन में लगेंगे तो पता नहीं दर्शन होने में कितना समय लग जाए, इसीलिए हमने शीघ्र दर्शन के टिकट लेने की सोची।

शीघ्र दर्शन का टिकट 25 रूपए का था और यहाँ भी भीड़ थी। हमने अति शीघ्र दर्शन का 100 रूपए का टिकट लिया। यहाँ भी कतार थी और हमें आधा घण्टा कतार में खड़ा होना पड़ा। इन दो के अलावा और कोई टिकट नहीं है।

आधे घण्टे की प्रतीक्षा के बाद हम दर्शन के लिए भीतर पहुँचे। भीतर कक्ष बड़ा है। दोनों ओर चार-चार सुनहरे स्तम्भ है। हर स्तम्भ के शीर्ष पर बैठे हुए सिंह की आकृति में विष्णु की नरसिंह अवतार की मूर्ति है। स्तम्भों के बीच में बड़े-बड़े चित्रों में राजा हिरण्य कश्यप, प्रहलाद और होलिका की कहानी दर्शाते चित्र है।

एक चित्र में राजा हिरण्य कश्यप का दरबार लगा है। एक चित्र में राज दरबार में बालक प्रहलाद हाथ बाँधे खड़ा हरि जाप कर रहा है और सभी दरबारी स्तब्ध है और राजा सिंहासन से उठ खड़े है। एक चित्र में आग में प्रहलाद हाथ जोड़े हरिनाम जप रहा है, होलिका पद्मासन की मुद्रा में बैठी है। ऐसे और भी चित्र है।

इस तरह यह कक्ष राजा हिरण्य कश्यप के दरबार की तरह बनाया गया है जहाँ हर स्तम्भ से नरसिंह अवतार में विष्णु भगवान निकल कर दरबार की चौखट पर हिरण्य कश्यप का वध करते है।

यह सब देखते हुए हम पहुँचे गर्भ गृह में जो पहाड़ की गुहा है। भीतर देखा विष्णु जी का नरसिंह अवतार लेकिन मुखमण्डल प्रसन्नचित्त और बाईं ओर विराजमान है लक्ष्मी जी। दाहिनी ओर विष्णु जी के तीन और अवतारों की मूर्तियाँ है - शेषनाग की छाया में विष्णु जी, योग रूप में विष्णु जी और माया रूप में विष्णु जी।

हमने दर्शन किए। चढावा पुरोहित जी को दिया तो उसमें से सफ़ेद मोतियों की माला पुरोहित जी ने हुंडी मे डाल दी और दुशाला हमें लौटाते हुए बताया कि बाहर खड़े पुरोहित जी को देकर नाम और गोत्र लिखवा देना। दूसरे पुरोहित से हमने तीरथ लिया। प्रसाद के रूप में हमें मूर्ति से उतारी गई तुलसी दल की माला दी गई। इस तरह हम गुहा से लौटने लगे। नरसिंह अवतार और लक्ष्मी जी की मूर्तियाँ कुछ इस तरह से स्थापित की गई कि बाहर निकलते हुए भी दर्शन कर सकते है।

इस तरह दर्शन कर हम बाहर आए। आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…

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2 टिप्पणियाँ »

  1. sameerlal said

    आभार इस वृतांत के लिए. जारी रहिये.

  2. Annapurna said

    धन्यवाद समीर जी !

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