स्वाद की चर्चा

यात्रा का मज़ा तब बढ जाता है जब हम वहाँ के विशेष खाने-पीने का आनन्द लेते है। इस मामले में हमारी बैंग्लोर-मैसूर की यात्रा कुछ बदमज़ा ही रही।

शुरूवात करते है सुबह के नाश्ते से। हमने कर्नाटक के बिसिबिल भात के बारे में सुना था पर इसे खाना तो दूर हमने कभी इसे देखा भी नहीं। सोचा यहाँ तो ज़रूर मिलेगा। मीनू कार्ड में था भी पर जब आर्डर दिया तो बताया गया कि नहीं है। हमने सोचा शायद किसी और रेस्तराँ में मिले पर नहीं मिला।

आखिर हमने रेलवे स्टेशन पर यहाँ तक कि गली के नुक्कड़ के खोमचे वाले से भी पूछा तो वहाँ भी नहीं मिला। हमें खेद है कि यह हमारे लिए सुनी-सुनाई बात ही रह गई न हम इसे चख़ पाए और न ही देख पाए।

कुछ ऐसी ही स्थिति रही मैसूर भजिए की। हैदराबाद में हम बहुत खाते है मैसूर भजिए। यह दाल से बनाए जाते है। नरम-नरम गोल-गोल भजिए नारियल की चटनी के साथ शाम की चाय के साथ खाए जाते है। हमने सुना कि यह कर्नाटक की विशेषता है जैसा कि इसका नाम ही है जहाँ यह और बड़े और ज्यादा नरम होते है। पर बिसिबिल भात की ही तरह यह मीनू कार्ड पर ही रहे देखने को भी नहीं मिले, गली नुक्कड़ पर भी नहीं।

सुबह के नाश्ते में हमने इडली खाई। स्वाद तो वैसा ही है जैसा आन्ध्रा में होता है और खाने का तरीका भी वही है नारियल की चटनी के साथ पर देखने में इडली कुछ अलग है। आकार बड़ा गोल है पर सपाट है जबकि आन्ध्रप्रदेश में आकार में छोटी गोल और ऊपर की ओर उभार तथा किनारे दबे होते है।

जब बात चली है इडली की तो साँभर की भी बात हो जाए। यहाँ का साँभर भी कुछ अलग ही रहा। इसमें अरहर की दाल ज्यादा थी और सब्जियाँ कम और तीख़ापन भी कम ही था जबकि आन्ध्रा के साँभर में दाल कम होती है और टमाटर के साथ सहजन की फली और कुछ दूसरी सब्जियाँ अधिक होती है और सूखे धनिए के अधिक प्रयोग से तीख़ा भी बहुत होता है।

दक्षिण के भोजन की एक और खास चीज़ है दही-चावल। हैदराबाद में जो दही-चावल हम खाते है वो एकदम सफ़ेद होते है क्योंकि इसमें दही-चावल के अलावा थोड़ी सी उड़द की दाल और कभी-कभार सूखा धनिया मिलाया जाता है पर कर्नाटक के दही-चावल हमें देखने में बहुत ख़ूबसूरत लगे क्योंकि यहाँ बारीक कटे हरे धनिए का प्रयोग किया जाता है। सफ़ेद झक दही-चावल पर बारीक कटा हरा धनिया बिखरा हुआ… है न खूबसूरत…

अब कुछ फलों की बात करें। हैदराबाद की ही तरह हमें यहाँ भी जगह-जगह केले बिकते नज़र आए। हैदराबाद में केले को मौज़ कहते है। मौज़ के छिलकों पर काले छीटे हो तो यह छीटें वाले मौज़ अच्छे माने जाते है। इन छीटों में नैसर्गिक शक्कर होती है। कर्नाटक के केलों के छिलकों पर एक भी छींटा नज़र नहीं आया। आकार भी बहुत छोटा था पर बहुत मीठे थे इसीलिए बहुत अच्छे लगे।

हैदराबाद में अमरूद को जाम कहते है वैसे आन्ध्रप्रदेश में या तेलुगु भाषा में जाम पन्ड्लु कहते है। पन्ड्लु का अर्थ है फल। सभी जाम भीतर से सफेद होते है। भीतर से गहरे गुलाबी या जिसे लाल अमरूद कहते है हमने बचपन में कभी-कभार खाए थे पर कर्नाटक में तो सभी अमरूद लाल थे।

इस तरह खट्टी-मीठी यादें लेकर हम हैदराबाद लौट आए।

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6 टिप्पणियाँ »

  1. mehek said

    hmmmmmmmm subhah subhah itna khubsurat nashta karwa diya,idli is ma fav,bisibeli bhi khayi,hamare ek rishtedar south indian hai unke yaha,hamari didi ko anna pasand aayaga ladka sowo bhi khub achha south indian khana banati hai,shayad maharastra se achha:)

  2. बहुत रोचक तरीके से बताया है आपने ..पर अजीब लगा कि मैसूर जा कर भी वहाँ की चीजे नही मिली खाने को .बाकी आपने यह बैठे हुए हमको बहुत अच्छी जानकारी दे दी वहाँ के खाने के बारे में 🙂

  3. masijeevi said

    स्‍वादिष्‍ट पोस्‍ट।।
    कुछ कुछ अपने मिजाज की.. अपना तर्क है कि जहॉं भी घूमने जाओ वहॉं कि स्‍थानीय चीजारें का विशेषकर भोजन का आनंद लो। घर वालों के साथ बिस्‍लेरी और चिकेन करी ब्रांड टूरिज्‍म में ये अक्‍सर हो नहीं पाता और हम निराश रह जाते हैं… आपकी हल्‍की हताशा समझ आती है।

  4. mamta said

    कर्नाटक के खान-पान के बारे मे जानकारी देने का शुक्रिया । अच्छा लगा आपके साथ सुबह का नाश्ता करना।
    वैसे अब तो शाम हो गई है। 🙂

  5. पेट भर गया जी. अब चलते हैं. 🙂

  6. Annapurna said

    महक जी, रंजना भाटिया जी, मसिजीवी जी, ममता जी, समीर जी, आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया !

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