Archive for मेरे भूले बिसरे गीत

वैद्य अमीर खुसरो

अमीर खुसरो जी को साहित्यकार, राजनीतिज्ञ और सूफी संत के बारे में सभी जानते है. आज प्रस्तुत है अमीर खुसरो का वैद्य रूप.

गीत, पहेलियाँ, मुकरिया तो उनके प्रसिद्द है ही, आज प्रस्तुत है चंद ऐसे दोहे जिसमें घरेलु नुस्के है -

त्रि कटा त्रिफला, पांचो नमक पतंग
दांत बंजर हो जात है मांज लो फल के संग

हरडा बहेडा आंवला तीनो नॉन पतंग
दांत बंजर सो होत है मांजू फल के संग

प्रात काल खाट से उठ के तुरत पीए जो पानी
वा घर वैद्य कबहू न जावे बात खुसरो ने जानी

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बचपन

देश भर में बाल दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है।

चलिए हम भी इस मूड को बनाए रखते है। आनन्द लीजिए सुभद्राकुमारी चौहान की इस रचना का -

मेरा नया बचपन

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

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लड्डू गोपाल

साहित्य से लेकर सिनेमा तक कृष्ण की गाथाएँ बिखरी पड़ी है।

प्रेम का प्रसंग हो तो राधाकृष्ण, भक्ति की बात चले तो कृष्ण भक्त मीरा, भाग्य से अधिक कर्म में विश्वास की बात हो तो महाभारत के नायक कृष्ण, वीरता की बात चले तो सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण, स्नेह की बात चले तो सुभद्रा कृष्ण, परिवार के प्रति प्रीति तो बलराम, भाईचारा हो तो पांडव, मैत्री हो तो सुदामा, संरक्षण की बात हो तो द्रौपदी, कूटनीति हो तो कौरव और शकुनि, दर्प तोड़ना हो तो इन्द्र और गोवर्धन पर्वत, दुष्टों का विनाश हो तो कंस वध, पूतना वध, प्रकृति के बचाव में कालिया नाग को समुद्र से हटाना

इन सभी प्रसंगों पर लेखनी चली लिकिन जब दिन हो जन्माष्टमी का तो छाया रहता है यशोदा का ममत्व और बालक्रीड़ा करते कृष्ण। ऐसी कई छवियाँ है जिनमें से एक छवि बेजोड़ है - कवि रसख़ान ने मात्र चार पंक्तियों में बाललीला से लेकर ईश्वरीय गुण का अनुभव करा दिया है, आप भी आनन्द लीजिए इस छवि का -

धूरि भरे अति शोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत खात फिरे अँगना पग पैजनिया कटि पीरी कछौटी ॥
वा छवि को रसख़ान विलोकत वारत काम कलानिधि कोटी ।
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी ॥

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