Archive for गीतों की पुरवाई

पुरवाई के दो साल

दो साल पहले आज ही के दिन पुरवाई की शुरूवात हुई थी एक बरखा गीत से।

शुरू में मेरी साहित्यिक रूचि बहुत उभर कर आई और चिट्ठों में हिन्दी साहित्य से काव्य की भरमार होने लगी। यहाँ तक कि अंताक्षरी भी रखी गई। साथ में मेरा घूमने फिरने का शौक भी सामने आया। जिन-जिन स्थानों का मैनें भ्रमण किया, जहाँ जैसा देखा वैसा ही लिख दिया चित्रों सहित। यह पर्यटन संबंधी चिट्ठे बन गए।

धीरे-धीरे इन पर्यटन संबंधी चिट्ठों की संख्या बढती जा रही है। इन दो सालों में पुरवाई को तेरह हजार से अधिक बार पढा गया। अब पुरवाई पर साहित्यिक रचनाएँ प्रस्तुत करना विषयांतर लग रहा है। इसीलिए मैनें सोचा कि अपनी साहित्यिक रूचि को मैं अलग ब्लोग में क्यों न रखूँ…

यही सोच कर पुरवाई के दो साल पूरे होने के अवसर पर मैं साहित्य के साथ एक नया ब्लोग शुरू कर रही - अंताक्षरी

इसमें हिन्दी साहित्य से काव्य रचनाएँ अंताक्षरी के क्रम में होगी। वैसे तो अंताक्षरी में आरंभि 4 पंक्तियाँ ही होती है पर यहाँ तो रूचि की बात है इसीलिए रचनाएँ पूरी रहेगी ताकि साहित्य का पूरा आनन्द लिया जा सकें।

तो कल निकलेगा ब्लोग - अंताक्षरी

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रूपसी उर्वशी

सुप्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर का यह जन्म शताब्दी वर्ष है।

दिनकर अपनी ओजस्वी कविताओं के लिए प्रसिद्ध रहे। भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्र कवि की उपाधि भी दी। उन्हीं की कलम का एक दूसरा रूप प्रस्तुत है, उनके काव्य ग्रन्थ उर्वशी से उर्वशी के रूप सौन्दर्य को चित्रित करती चन्द पंक्तियाँ -

एक मूर्ति में सिमट गई किस भाँति सिद्धियाँ सारी ?
कब था ज्ञात मुझे इतनी सुन्दर होती है नारी ?

लाल लाल वे चरण कमल से, कुंकुम से, जावक से,
तन की रक्तिम कांति युद्ध ज्यों धुली हुई पावक से।

जग भर की माधुरी अरूण अधरों में धरी हुई सी
आँखों में वारूणी रंग, निद्रा कुछ भरी हुई सी।

तन प्रकांति मुकुलित, अनंत ऊषाओं की लाली सी
नूतनता संपूर्ण जगत की, संचित हरियाली सी।

पग पड़ते ही फूट पड़े विद्रूम प्रवाल धूलों से
जहाँ खड़ी हो वहीं व्योम भर जाए श्वेत फूलों से।

दर्पण जिसमें प्रकृति रूप अपना देखा करती है
वह सौन्दर्य, कला जिसका सपना देखा करती है।

नहीं, उर्वशी नारी नहीं, आभा है निखिल भुवन की
रूप नहीं, निष्कलुष कल्पना है सृष्टा के मन की।

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राम की शक्ति पूजा – 8

राम की शक्ति आराधना और मिला शक्ति का वरदान, देखें कवि निराला का शब्द रूपक -

हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,
पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस,
कर-जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर,
निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।
चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित-मन,
प्रतिजप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण,
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,
जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अम्बर।
दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम,
अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम।
आठवाँ दिवस मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर
कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,
हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध।
रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार
प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार,
द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर
हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इन्दीवर।

यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
"धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।

"यह है उपाय", कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
"कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।"

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
"साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!"
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।

"होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।"
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

आप सबको विजयदशमी की शुभकामनाएँ ! दशहरा मुबारक !

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