साहित्य से जिन रचनाओं को फ़िल्मों में लिया गया है उनमें से आज प्रस्तुत है अमीर ख़ुसरो की रचना।
इसे उमराव जान फ़िल्म में रखा गया और इसे गायिका जगजीत कौर ने अपनी आवाज़ दी है। कुछ पंक्तियों में बदलाव है। फ़िल्मी गीत की इन बदली पंक्तियों को कोष्ठक में दिया गया है। -
काहे को ब्याहे बिदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ
भोर भये उड़ जैहें (अरे कुहुक कुहुक रह जाए)
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
कोठे तले से पलकिया जो निकली (महलां तले से डोला जो निकला)
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस