आन्ध्रप्रदेश में केसरगुट्टा के शिव मन्दिर की बहुत मान्यता है। श्रावण मास में यहाँ बहुत श्रृद्धालु आते है। इस श्रावण में हम भी पहुँच गए।
यह नलगोण्डा ज़िले में है और हैदराबाद से डेढ घण्टे की दूरी पर है। ऊँचे पहाड़ पर स्थित है यह मन्दिर जैसा कि नाम से ही पता चलता है, तेलुगु भाषा में गुट्टा पहाड़ को कहते है और केसर नाम हनुमानजी के लिए है। पहाड़ की चोटी पर हनुनानजी की ऊँची मूर्ति है जो बहुत दूर से नज़र आती है। हनुमानजी और शिव मन्दिर के पीछे क्या पौराणिक कथा है, इसकी हमें जानकारी नहीं है।
मन्दिर तक पहुँचने के लिए लगभग दो किलोमीटर की बहुत चढाई है। मन्दिर की पहाड़ी भी बहुत ऊँची है, एक ओर गाड़ियों के लिए रास्ता है और दूसरी ओर सीढियाँ है।
यह है मन्दिर का द्वार -

चूँकि इस मन्दिर का संबंध हनुमानजी से है इसीलिए यहाँ बन्दर बहुत है। मन्दिर परिसर के भीतर और मुख्य मन्दिर के बाहर पूजापा बिकता है। पूजापा लेकर संभल कर मन्दिर में जाना पड़ता है क्योंकि ज़रा सी चूक हुई और हाथ से पूजापा बन्दर छीन ले जाते है।
मुख्य मन्दिर में प्रवेश करते है, यह है हाल जिसकी दीवारों पर पौराणिक चरित्रों की उम्दा कलाकृतियाँ बनी है -

सामने गर्भगृह में है शिवलिंग। बाएं दाएं गणेश जी और कार्तिकेय के छोटे मन्दिर है जिससे पहले प्रथम देवता गणेशजी के दर्शन कर शिवजी के दर्शन कर सके। हाल में दाहिनी ओर बीच में गर्भगृह में पार्वतीजी की प्रतिमा है। यहाँ पूजा अर्चना करने के लिए हाल के द्वार पर लगे काउंटर से टिकट लेना पड़ता है। मुख्य हाल से बाहर निकलने के बाद पीछे की ओर अन्य देवी देवताओं के मन्दिर है।
पीछे दाहिनी ओर दुर्गा माँ का मन्दिर है। यहाँ मूर्ति के अलावा बाहर एक झूला है जिस पर दुर्गा माँ की तस्वीर है इसके चारों ओर काँच लगे है जिनमें विभिन्न कोणों से यह तस्वीर नज़र आती है, कहीं क्रम से एक से अधिक छवियाँ नज़र आती है। श्रृद्धालु यहाँ झूला देते है और इन नज़ारों का आनन्द लेते है -

और पीछे चढकर जाने पर एक हाल में राम सीता लक्ष्मण की पारम्परिक छवि की मूर्तियाँ है। विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति है, कृष्ण वेणुगोपाल रूप में विराजमान है।
सभी देवी-देवताओं के दर्शन कर हम वापस मुख्य मन्दिर के द्वार पर लौट आए। यहाँ से सामने नज़र आई ऊँची हनुमानजी की मूर्ति जो नीचे रास्ते में दूर से ही नज़र आ रही थी। यह मूर्ति पहाड़ पर इस तरह से स्थापित है कि हनुमानजी का मुख मुख्य शिवमन्दिर की ओर है -

विशाल मूर्ति तक जाने के लिए कुछ सीढियाँ चढना पड़ता है। मूर्ति के चारों ओर नीचे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कई शिवलिंग है -

यहीं पर पंचमुखी हनुमानजी का मन्दिर है।
यहाँ से पीछे की ओर पहाड़ से ढलान शुरू होती है। इस पहाड़ के दामन में है एक सरोवर जहाँ बहुत से कमल खिले है। सरोवर हल्का सा नीचे तस्वीर में नज़र आ रहा है। यहीं है बगीचा जहाँ सावन का आनन्द लिया जाता है। लेकिन पहाड़ी से उतर कर यहाँ नहीं जा सकते, नीचे काँटों की बाड़ लगा दी गई है -

बाहर से जिस रास्ते से मन्दिर आए थे वहीं से लौटते हुए बगीचे में जाने के लिए रास्ता है।
इस बगीचे की जानकारी अगले चिट्ठे में…