Archive for प्रकृति बालाएँ

एक बूँद

आज प्रस्तुत है अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की एक रचना जिसमें पानी की एक बूँद को नारी के रूप में चित्रित किया है -

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

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सरिता

अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" का नाम हिन्दी काव्य में जाना पहचाना है। उनकी कुछ रचनाएं ऐसी भी है जिसकी चर्चा बहुत ही कम हुई है।

एक ऐसी ही कम चर्चित रचना प्रस्तुत है -

सरिता

किसे खोजने निकल पड़ी हो
जाती हो तुम कहाँ चली
ढली रंगतों में हो किसकी
तुम्हें छ्ल गया कौन छली

क्यों दिन-रात अधीर बनी सी
पड़ी धरा पर रहती हो
दु:सह आतप शीत वात सब
दिनों किसलिए सहती हो

कभी फैलने लगती हो क्यों
कृश तन कभी दिखाती हो
अंग भंग कर क्यों आपे
से बाहर हो जाती हो

कौन भीतरी पीड़ाएं
लहरें बन ऊपर आती है
क्यों टकराती ही फिरती है
क्यों काँपती दिखाती है

बहुत दूर जाना है तुमको
पड़े राह में रोड़े है
है सामने खाइयाँ गहरी
नहीं बखेड़े थोड़े है

पर तुमको अपनी ही धुन है
नहीं किसी की सुनती हो
काँटों में भी सदा फूल तुम
अपने मन के चुनती हो

ऊषा का अवलोक वदन
किसलिए लाल हो जाती हो
क्यों टुकड़े-टुकड़े दिनकर की
किरणों को कर पाती हो

क्यों प्रभात की प्रभा देख कर
उर में उठती है ज्वाला
क्यों समीर के लगे तुम्हारे
तन पर पड़ता है छाला

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रजनीबाला

आज भूले-बिसरे गीतों की श्रृंखला में प्रस्तुत है एक ऐसा गीत जिसे मैनें छठी कक्षा में पढा था।

रामकुमार वर्मा के इस गीत में रात्रि का वर्णन है। शायद इसे पढ कर आपको भी बचपन के वो लम्हें याद आ जाए -

रजनीबाला

इस सोते संसार बीच जग कर सज कर रजनीबाले
कहाँ बेचने ले जाती हो ये गजरे तारों वाले

मोल करेगा कौन सो रही है उत्सुक आँखे सारी
मत कुम्हलाने दो सूनेपन में अपनी निधियां न्यारी

निर्झर के निर्मल जल में ये गजरे हिला हिला धोना
लहर लहर कर यदि चूमे तो किंचित विचलित मत होना

होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित लहरों ही में लहराना
लो मेरे तारों के गजरे - निर्झर स्वर में ये गाना

यदि प्रभात तक कोई आकर तुमसे हाय न मोल करें
तो फूलों पर ओस रूप में बिखरा देना सब गजरे

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