Archive for खेत-खलिहान

ग्राम देवता

सर्दी जैसे-जैसे बढती जाती है खेत-खलिहान भी भारी होते जाते है। ऐसे में आइए हम नमन करें ग्राम देवता का…

प्रस्तुत है प्रसिद्ध हिन्दी कवि रामकुमार वर्मा की रचना -

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

सोने-चाँदी से नहीं किंतु तुमने मिट्टी से दिया प्यार ।
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

जन कोलाहल से दूर- कहीं एकाकी सिमटा-सा निवास,
रवि-शशि का उतना नहीं कि जितना प्राणों का होता प्रकाश
श्रम वैभव के बल पर करते हो जड़ में चेतन का विकास
दानों-दानों में फूट रहे सौ-सौ दानों के हरे हास,

यह है न पसीने की धारा, यह गंगा की है धवल धार ।
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

अधखुले अंग जिनमें केवल है कसे हुए कुछ अस्थि-खंड
जिनमें दधीचि की हड्डी है, यह वज्र इंद्र का है प्रचंड !
जो है गतिशील सभी ऋतु में गर्मी वर्षा हो या कि ठंड
जग को देते हो पुरस्कार देकर अपने को कठिन दंड !

झोपड़ी झुकाकर तुम अपनी ऊँचे करते हो राज-द्वार !
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

ये खेत तुम्हारी भरी-सृष्टि तिल-तिल कर बोये प्राण-बीज
वर्षा के दिन तुम गिनते हो, यह परिवा है, यह दूज, तीज
बादल वैसे ही चले गए, प्यासी धरती पाई न भीज
तुम अश्रु कणों से रहे सींच इन खेतों की दुःख भरी खीज

बस चार अन्न के दाने ही नैवेद्य तुम्हारा है उदार
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

यह नारी-शक्ति देवता की कीचड़ है जिसका अंग-राग
यह भीर हुई सी बदली है जिसमें साहस की भरी आग,
कवियो ! भूलो उपमाएँ सब मत कहो, कुसुम, केसर, पराग,
यह जननी है, जिसके गीतों से मृत अंकर भी उठे जाग,

उसने जीवन भर सीखा है, सुख से करना दुख का दुलार !
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

ये राम-श्याम के सरल रूप, मटमैले शिशु हँस रहे खूब,
ये मुन्न, मोहन, हरे कृष्ण, मंगल, मुरली, बच्चू, बिठूब,
इनको क्या चिंता व्याप सकी, जैसे धरती की हरी दूब
थोड़े दिन में ही ठंड, झड़ी, गर्मी सब इनमें गई डूब,

ये ढाल अभी से बने छीन लेने को दुर्दिन के प्रहार !
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

तुम जन मन के अधिनायक हो तुम हँसो कि फूले-फले देश
आओ, सिंहासन पर बैठो यह राज्य तुम्हारा है अशेष !
उर्वरा भूमि के नये खेत के नये धान्य से सजे वेश,
तुम भू पर रहकर भूमि-भार धारण करते हो मनुज-शेष

अपनी कविता से आज तुम्हारी विमल आरती लूँ उतार !
हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

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पहले पढा फिर समझा अब अनुभव किया

मैं आज एक ऐसी कविता की चर्चा कर रही हूं जिसे हममें से बहुतों ने बचपन में ही पढा है। यह कविता है ग्रामश्री और रचयिता है प्रसिद्ध हिन्दी कवि सुमित्रानन्दन पंत।

श्री का अर्थ समृद्धि है। कवि ने एक समृद्ध गांव बताया है। गांव की समृद्धि का अर्थ होता है लहलहाते खेत और भरे-भरे खलिहान।

बचपन में इस कविता को पढते समय समझाया जाता है कि भारत कृषि प्रधान देश है। देश की आत्मा गांवों में बसती है। हमने भी सिर्फ़ यही समझा। जब एम ए में साहित्य का अध्ययन करने लगे तब परिचित हुए पंत के प्रकृति चित्रण की दक्षता से।

आज कृषि से जुड़ी संस्थान में काम करने लगे तो कविता का एक-एक अक्षर ना सिर्फ़ जानने लगे बल्कि अनुभव भी करने लगे। रोज़ की आदत सी हो गई है दोपहर के भोजन के बाद खुली हवा में कुछ देर चहलकदमी करने की और यह सैर कार्यालय में पीछे शोध किए जा रहे खेतों में की जाती है। कार्यालय भी कृषि विश्वविद्यालय के परिसर में है।

मुझ जैसे बहुत ही कम लोग हैं जिन्हें ऐसे हरे-हरे वातावरण में रहने का अवसर मिलता है। ऐसे समय इस कविता की याद आना स्वाभाविक है। तो प्रस्तुत है ग्रामश्री -

फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली
लिपटी जिससे रवि की किरणें चांदी की सी उजली जाली।

रोमांचित सी लगती वसुधा आई जौ-गेहूं में बाली
अरहर सनई की सोने की किंकिंणिया है शोभाशाली।

उड़ती भीनी तैलाक्त गंध फूली सरसों पीली पीली
लो हरित धरा से झांक रही नीलम की कलि तीसी नीली।

रंग-रंग के फूलों में रिलमिल हंस रही संखिया मटर खड़ी
मखमली पेटियों सी लटकी छीमियां छिपाएं बीज लड़ी।

अब रजत स्वर्ण मंजरियों से लद गई आम्र तरू की डाली
झर रहे ढांक पीपल के दल हो उठी कोकिला मतवाली।

महके कटहल मुकुलित जामुन जंगल में झरबेरी झूली
फूले आड़ू नींबू दाड़िम आलू गोभी बैंगन मूली।

पीले मीठे अमरूदों में अब लाल लाल चित्तियां पड़ी
पक गए सुनहरे मधुर बेर अंवली से तरू की डाल जड़ी।

लहलह पालक महमह धनिया लौकी औ सेम फली फैली
मखमली टमाटर हुए लाल मिर्चों की बड़ी हरी थैली।

गंजी को मार गया पाला अरहर के फूलों को झुलसा
हांका करती दिन भर बन्दर अब मालिन की लड़की तुलसा।

बालाएं गजरा काट काट कुछ कह गुपचुप हंसती किनकिन
चांदी की सी घण्टियां तरल बजती रहती रह-रह खिन खिन।

बगिया के छोटे पेड़ों पर सुंदर लगते छोटे छाजन
सुंदर गेहूं की बालों पर मोती के दानों से हिम किन।

प्रातः ओझल हो जाता जग भू पर आता ज्यों उतर गगन
सुंदर लगते फिर कुहरे से उठते से खेत बाग़ गृह वन।

लटके तरूओं पर विहग नीड़ वनचर लड़को को हुए ज्ञात
रेखा छवि विरल टहनियों की ठूंठे तरूओं से नग्न गात।

आंगन में दौड़ रहे पत्ते घूमती भंवर सी शिशिर वात
बदली छटने पर लगती प्रिय ॠतुमती धरित्री सद्य-स्नात।

हंसमुख हरियाली हिम आतप सुख से अलसाए से सोए
भीगी अंधियाली में निशि की तारक स्वप्नों में से खोए।

मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम जिस पर नीलम नभ आच्छादन
निरूपम हिमान्त में स्निग्ध शान्त निज शोभा से हरता न-नमज।

है न सुंदर कविता ! अगर अब भी अनुभव न हो रहा हो तो इस समय शहर की सीमाओं पर आप चले जाइए, ये कविता आपको पसरी मिलेगी।

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