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मदुरै का नयक्कार महल

दक्षिण की पौराणिक नगरी मदुरै में माना जाता है कि नायक वंश का दो सौ वर्षों तक शासन रहा।

यह है नायक वंश के नायको का महल यानि नयक्कार महल -

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यह महल तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर से थोड़ी ही दूर पर है। यह महल देखने के लिए 20 रूपए का टिकट है। बताया गया कि यह राशि महल तैयार करने में लगाई जाएगी।

वास्तव में यह मूल भवन नहीं है। मूल भवन तो शत्रुओं के आक्रमणों से नष्ट हो चुका। यहाँ मूल भवन जैसा ही भवन तैयार किया जा रहा है। भीतर हमने देखा काम चल रहा था। कतार में स्तम्भ ही स्तम्भ थे। स्तम्भ तो अच्छे लग रहे थे पर सीमेंट में और पुरानी शिल्पकारी में महाअंतर होता है।

देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई शौकीन धनाढ्य अपना आधुनिक महल तैयार कर रहा है। इससे तो अच्छा होता मूल भवन के अवशेष वैसे ही रखते जिसे देखकर कम से कम मूल भवन का अंदाज़ा तो लगता।

यह महल देखने के बाद हम वापस पहुँचे रामेश्वरम बस यात्रा से पामबन पुल से होकर। एक और दिन रामेश्वरम में रूकने के बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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मदुरै में कार्तिकेय का तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर

मदुरै से 6 मील की दूरी पर है तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर।

यह शिव-पार्वती के दूसरे पुत्र यानि गणेश जी के भाई कार्तिक या कार्तिकेय के 6 प्रमुख मन्दिरों में से एक है। इसीलिए यह एक प्रसिद्ध मन्दिर है। कार्तिक को यहाँ सुब्रह्मण्यम या सुब्रह्मण्यम स्वामी कहा जाता है।

यह मन्दिर एक गुफ़ा में है। माना जाता है कि कार्तिक ने शूरपद्मासुर के अस्तित्व को मिटाने के बाद इन्द्र देवता की बेटी देवयानी से यहीं पर विवाह किया था। इसीलिए यहाँ कार्तिकेय नव वर के रूप में दर्शन देते है।

यह है मन्दिर -

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पीछे पहाड़ देखे जा सकते है। प्रवेश पर लम्बा चौड़ा कक्ष है जहाँ 48 स्तम्भ है जो शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना है। सामने ही कुछ स्तम्भ नज़र आ रहे है। सामने लगा है पूजा की सामग्री का बाज़ार।

पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे। भीड़ बहुत थी। भीड़ के कारण विशेष दर्शन की सुविधा है जिसके लिए प्रति व्यक्ति 50 रूपए देने पड़ते है। हमने भी विशेष दर्शन किए।

गर्भगृह प्रथम माले पर है। शिल्पकारी स्तम्भों को देखते हुए कक्ष के अन्तिम छोर से ऊपर जाने के लिए सीढियाँ है जो पत्थर की बनी है। गर्भगृह में केवल दीपों से उजाला है। सामने शिवजी और पार्वतीजी की अलग-अलग किन्तु पास में मूर्तियाँ है। दाहिने किनारे गणेशजी और बाएँ कार्तिकेय या सुब्रह्मण्यम जी की मूर्ति है। व्यव्स्था ऐसी कि पहले गणेशजी के ही दर्शन हो। सभी मूर्तियाँ विशाल है और पत्थर की बनी है।

यहाँ से दूसरे छोर से बाहर निकलने पर एक और बड़ा कक्ष है। यहाँ मुख्य रूप से विष्णु और दुर्गा की मूर्तियाँ है। इसके अलावा पौराणिक कथाओं पर आधारित चित्र दीवारों पर उकेरे गए है।

यह देखने के बाद हम नयक्कार महल देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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मीनाक्षी मन्दिर की भव्यता और शिवदर्शन

मदुरै में मीनाक्षी मन्दिर में देवी मीनाक्षी (पार्वती जी) के दर्शन के बाद हम आगे बढे सुन्दरेश्वर (शिव जी) के दर्शन के लिए।

प्रवेश द्वार पर 12 फीट ऊँची द्वारपालकों की सजीव मूर्तियाँ है। शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना देवी सरस्वती, काशी विश्वनाथ, भिक्षाटन शिवजी, दुर्गा आदि की के रूप देखते हुए हम आगे बढे। आगे है नटराज। बहुत भव्य मूर्ति है - अपना दाहिना पैर उठाए शिवजी नृत्य करते प्रतीत होते है। आगे गर्भगृह में 64 भूतगण, 8 हाथी और 32 शेरों की आकृतियाँ देखने के बाद हमने दर्शन किए शिवलिंग के।

इस तरह मन्दिर में मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर के दर्शन करने के बाद हमने प्रसाद लिया। प्रसाद में लड्डू, वड़ा, भात दिया गया।

प्रसाद लेने के बाद थोड़ा आगे बढने पर हमें दुकाने सजी मिलती है जहाँ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, किताबें, आडियो-वीडियो कैसेट और इसके अलावा चूड़ियाँ, बिन्दी आदि भी बिक रहे थे। यहाँ से आगे बाहर जाने के लिए द्वार है पर उससे पहले है सहस्त्र स्तम्भ मन्दिर। यहाँ वास्तव में 985 स्तम्भ है जो किसी भी कोण से देखने पर सीध में दिखाई देते है। बाहर से भी इसका कुछ भाग देखा जा सकता है -

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यहाँ अर्जुन, कलिपुरूष, वीणापाणी, रति, मोहिनी के कला शिल्प है और नटराज की कोमल मूर्ति एक अलग मण्डप में है।

मीनाक्षी मन्दिर परिसर के चारों ओर गलियारे में छोटी बड़ी मीनारे है जिनमें चार मीनारे बड़ी नौ छतों वाली है और इसमें से दक्षिणी मीनार सबसे बड़ी 160 फुट ऊँची है। उत्तर की मीनार से 5 स्तम्भ लगे है। हर स्तम्भ में 22 छोटे स्तम्भ एक ही शिला को तराश्कर बनाए गए है। इन्हें थपथपाने से मधुर ध्वनि सुनाई देती है। इसीलिए इन्हें संगीतात्मक स्तम्भ कहते है।

यहाँ से निकल कर हम चले पड़े एक और मन्दिर देखने जिसका नाम बोलना कठिन है - तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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