डॉल्फिन नोज देखने के बाद हम कुन्नूर से ऊटी लौट आए और वहां से वापस हैदराबाद लौटने के लिए मैसूर की ओर यात्रा शुरू की।
नीम अँधेरे में नीलगिरी के ऊंचे पेड़ काले साए से लगने लगे। इस पहाडी क्षेत्र को पार कर हम जंगल में पहुंचे। अन्धेरा हो चला था। इस वक़्त जंगल में हाथियों का राज नजर आया। बन्दर और छोटे-छोटे लंगूर शायद सो चुके थे।
लेकिन हाथी ज्यादा मस्त हो गए थे, सड़क के किनारे से टहलने लगे थे। टहलते हुए हाथी के पास से गाड़ी निकल जाती तो रोमांच हो आता। इस समय वन अधिकारी हाथियों पर सवार हो कर यहाँ गश्त लगाते हैं, यह नजारा और भी रोमांचक रहा।
संकरी सड़क और रात का अन्धेरा, ऐसे में एक गाड़ी रास्ते में खराब हो जाए तो अन्य गाड़ियां पास से धीमे-धीमे आगे बढ़ पाती हैं। ऐसे ही एक स्थान पर एक टूरिस्ट बस में कुछ खराबी आ गई, ड्राइवर और उसके साथी गाड़ी ठीक करने लगे। जैसे की आमतौर पर होता हैं कुछ यात्री भी बस से नीचे उतर आए। किसी ने बताया आगे हाथी हैं तब ड्राइवर यात्रियों से बस में बैठने के लिए कहने लगा। हमें लगा हाथी से ऐसा भी क्या खतरा हो सकता हैं पर हैदराबाद लौटने के लगभग दो सप्ताह बाद खबरों में देखा कि पौ फटने के समय काम पर जा रहे एक लडके की हाथी के कुचलने से मृत्यु हो गई और वहां से गुजर रहे दो-चार लोग लडके को बचाने में घायल हो गए। वैसे भी अँधेरे में सड़क के किनारे से चलते हाथी को दूर से पहचानना कठिन होता हैं। पास से हलचल से ही पहचाना जा सकता हैं।
इस जंगल की यात्रा में सबसे रोमांचक समय रात्री का अंतिम प्रहर होता हैं। पौ फटने तक कुछ अधिक ही जानवर सड़क के किनारे तक आते हैं जिसमे हाथियों के साथ हिरण भी हैं। इस क्षेत्र की शिकार की ज्यादातर घटनाएं इसी समय की हैं जिसमे कई महत्वपूर्ण हस्तियाँ भी शामिल रही।
इस तरह हमने अपनी यात्रा पूरी की और बैंगलौर से होते हुए हैदराबाद लौट आए।




