पर्णशाला से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर हैं सीता स्थल.
माना जाता हैं कि वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया गया. गोदावरी नदी में किनारे से थोड़ा भीतर एक छोटी पहाडी हैं, इसे ही सीता स्थल कहा जाता हैं. इस पहाडी पर पहुँचने के लिए छोटा लकड़ी का पुल हैं -
पहाडी के दोनों किनारों पर और बीच में गोल घेरे में पूजा की सामग्री रखी जाती हैं. कहते हैं इस पहाडी पर सीताजी अपनी साड़ी सुखाया करते थे. यहाँ पुरोहित भी होते हैं -
किनारे वापस आने पर वही से दाहिनी ओर नदी के किनारे रेत के थैलों से बनाए गए रास्ते पर धीरे-धीरे थोड़ा आगे बढ़ने पर एक पत्थर से नदी का पानी बहता हैं जिसे पवित्र जल मान कर सिर पर छिड़का जाता हैं -
थोड़ा आगे बढ़ने पर सीताजी की मूर्ति हैं जिसके दर्शन करने के बाद झाड़ियों में से हम बाहर निकल आए.
थोड़ा आगे बढ़ने पर एक और स्थल हैं. माना जाता हैं कि यहीं पर लक्ष्मण जी पर शूर्पणखा मोहित हुई थी. इस स्थल को निंदनीय स्थल माना जाता हैं और यहाँ कंकर मारे जाते हैं.
इसके बाद हम पहाडी पर राम कृष्ण परमहंस मठ द्वारा बनाए गए शिव मंदिर गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...


