Archive for October, 2009

केसरगुट्टा मन्दिर के दामन में उद्यान

पिछले चिट्ठे में मैनें बताया आन्ध्र प्रदेश के केसरगुट्टा के शिव मन्दिर के बारे में जहाँ श्रावण मास में पूजा का महत्व है।

श्रावण की पूजा के बाद सावन का आनन्द लेने के लिए मन्दिर की पहाड़ी के दामन है ख़ूबसूरत उद्यान जिसके ऊपर पहाड़ी से दिखते कमल सरोवर की तस्वीर भी हम पिछले चिट्ठे में दिखा चुके।

पूजा समाप्त करने के बाद हम पहाड़ी से नीचे आए और उद्यान में प्रवेश कर गए। प्रवेश करते ही सामने है शिव पार्वती गणेश और कार्तिकेय यानि पूरे परिवार की सुन्दर मूर्तियाँ -

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और इन मूर्तियों के सामने बड़ी मूर्ति नन्दी की भी है। पूरे उद्यान में हरियाली फैली है -

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सुन्दर रंगबिरंगे फूलों और बिना फूलों के ऊँचे घने वृक्ष और पौधे थोड़ी-थोड़ी दूर पर उद्यान की शोभा बढा रहे है। -

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बाईं ओर एक रेस्तराँ भी है। दाहिनी ओर से आगे झूलें लगे है -

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यहीं आगे है कमल सरोवर जो ऊपर मन्दिर से दिख रहा था जिसमें बहुत से गुलाबी और सफ़ेद कमल खिले थे। सरोवर के पास तक जाने की मनाही है, पर वहाँ के चौकीदार सुन्दर कमल अनुरोध पर सबको दे रहे थे।

सामने ऊपर देखने पर नज़र आया पहाड़ और चोटी पर मन्दिर -

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यहाँ एक बात बहुत अच्छी लगी। कुछ परिवारों के लोग मिलकर आए थे जो ऊपर पूजा करने के बाद नीचे उद्यान में अपने-अपने घरों से लाया भोजन सब मिलकर नीचे पंक्ति में बैठकर खा रहे थे। बहुत बड़ा समूह था। आजकल भारतीय परम्परा के ऐसे नज़ारे बहुत कम ही देखने को मिलते है।

एक अच्छा समय यहाँ बिताने के बाद और श्रावण की पूजा तथा सावन का आनन्द लेकर हम लौट आए।

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केसरगुट्टा का शिव मन्दिर

आन्ध्रप्रदेश में केसरगुट्टा के शिव मन्दिर की बहुत मान्यता है। श्रावण मास में यहाँ बहुत श्रृद्धालु आते है। इस श्रावण में हम भी पहुँच गए।

यह नलगोण्डा ज़िले में है और हैदराबाद से डेढ घण्टे की दूरी पर है। ऊँचे पहाड़ पर स्थित है यह मन्दिर जैसा कि नाम से ही पता चलता है, तेलुगु भाषा में गुट्टा पहाड़ को कहते है और केसर नाम हनुमानजी के लिए है। पहाड़ की चोटी पर हनुनानजी की ऊँची मूर्ति है जो बहुत दूर से नज़र आती है। हनुमानजी और शिव मन्दिर के पीछे क्या पौराणिक कथा है, इसकी हमें जानकारी नहीं है।

मन्दिर तक पहुँचने के लिए लगभग दो किलोमीटर की बहुत चढाई है। मन्दिर की पहाड़ी भी बहुत ऊँची है, एक ओर गाड़ियों के लिए रास्ता है और दूसरी ओर सीढियाँ है।

यह है मन्दिर का द्वार -

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चूँकि इस मन्दिर का संबंध हनुमानजी से है इसीलिए यहाँ बन्दर बहुत है। मन्दिर परिसर के भीतर और मुख्य मन्दिर के बाहर पूजापा बिकता है। पूजापा लेकर संभल कर मन्दिर में जाना पड़ता है क्योंकि ज़रा सी चूक हुई और हाथ से पूजापा बन्दर छीन ले जाते है।

मुख्य मन्दिर में प्रवेश करते है, यह है हाल जिसकी दीवारों पर पौराणिक चरित्रों की उम्दा कलाकृतियाँ बनी है -

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सामने गर्भगृह में है शिवलिंग। बाएं दाएं गणेश जी और कार्तिकेय के छोटे मन्दिर है जिससे पहले प्रथम देवता गणेशजी के दर्शन कर शिवजी के दर्शन कर सके। हाल में दाहिनी ओर बीच में गर्भगृह में पार्वतीजी की प्रतिमा है। यहाँ पूजा अर्चना करने के लिए हाल के द्वार पर लगे काउंटर से टिकट लेना पड़ता है। मुख्य हाल से बाहर निकलने के बाद पीछे की ओर अन्य देवी देवताओं के मन्दिर है।

पीछे दाहिनी ओर दुर्गा माँ का मन्दिर है। यहाँ मूर्ति के अलावा बाहर एक झूला है जिस पर दुर्गा माँ की तस्वीर है इसके चारों ओर काँच लगे है जिनमें विभिन्न कोणों से यह तस्वीर नज़र आती है, कहीं क्रम से एक से अधिक छवियाँ नज़र आती है। श्रृद्धालु यहाँ झूला देते है और इन नज़ारों का आनन्द लेते है -

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और पीछे चढकर जाने पर एक हाल में राम सीता लक्ष्मण की पारम्परिक छवि की मूर्तियाँ है। विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति है, कृष्ण वेणुगोपाल रूप में विराजमान है।

सभी देवी-देवताओं के दर्शन कर हम वापस मुख्य मन्दिर के द्वार पर लौट आए। यहाँ से सामने नज़र आई ऊँची हनुमानजी की मूर्ति जो नीचे रास्ते में दूर से ही नज़र आ रही थी। यह मूर्ति पहाड़ पर इस तरह से स्थापित है कि हनुमानजी का मुख मुख्य शिवमन्दिर की ओर है -

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विशाल मूर्ति तक जाने के लिए कुछ सीढियाँ चढना पड़ता है। मूर्ति के चारों ओर नीचे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कई शिवलिंग है -

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यहीं पर पंचमुखी हनुमानजी का मन्दिर है।

यहाँ से पीछे की ओर पहाड़ से ढलान शुरू होती है। इस पहाड़ के दामन में है एक सरोवर जहाँ बहुत से कमल खिले है। सरोवर हल्का सा नीचे तस्वीर में नज़र आ रहा है। यहीं है बगीचा जहाँ सावन का आनन्द लिया जाता है। लेकिन पहाड़ी से उतर कर यहाँ नहीं जा सकते, नीचे काँटों की बाड़ लगा दी गई है -

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बाहर से जिस रास्ते से मन्दिर आए थे वहीं से लौटते हुए बगीचे में जाने के लिए रास्ता है।

इस बगीचे की जानकारी अगले चिट्ठे में…

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हैदराबाद की शाकभाजी

देश के अन्य भागों की तुलना में हैदराबाद में सब्जियाँ अधिक होती है।

यहाँ मांसाहारी बहुत है लेकिन उतने ही शाकाहारी भी है। सब्जियों के अधिक उगने का कारण यहाँ की मध्यम जलवायु और मौसम है।

हैदराबाद की जलवायु देश के कई शहरों से अच्छी है, न ज्यादा गर्मी न ज्यादा सर्दी और न ही अधिक बारिश। पिछले कुछ सालों से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से यहाँ का तापमान 40 के आस-पास पहुँच रहा है नहीं तो पहले 38 से नीचे ही रहा था और 11 से नीचे तो अब भी अक्सर नहीं जाता है।

इस चिट्ठे में हम बता रहे है उन तमाम सब्जियों के नाम जो हैदराबाद और आस-पास के क्षेत्रों में उगाई जाती है और धड़ल्ले से बिकती है। दाम भी अन्य राज्यों की तुलना में कम ही होते है। यह सभी सब्जियाँ हैदराबादियों के रोज़ के खाने में शामिल है।

यहाँ सब्जियों को शाकभाजी कहा जाता है। हरी पत्तेदार सब्जी को भाजी कहते है जिसका बहुवचन है भाजियाँ, कन्दमूल जैसे आलू, अरवी, सूरन को गड्डे कहते है और बाकी सभी सब्जियों को शाक कहते है।

वैसे हैदराबाद में शाकभाजी (सब्जियाँ) बहुत मिलती है। देश के अन्य भागों की तरह यहाँ भी आलू, अरवी, गोभी, फूल गोभी, मटर, गाजर, खीरा आदि बहुत मिलता और खाया जाता है पर हैदराबाद की कुछ खास शाकभाजी है जो अन्य स्थानों पर बहुत कम मिलती है या मिलती ही नहीं।

यहाँ भाजियाँ बहुत ज्यादा मिलती है पर सरसो जो भारत की लोकप्रिय पत्तेदार सब्जी है यहाँ नहीं मिलती बल्कि बहुत से हैदराबादी ऐसे भी है जो यह भी नहीं जानते कि सरसो की सब्जी भी होती है (सरसों का साग) लेकिन हाँ यहाँ सरसों के तेल का मालिश के लिए बहुत प्रयोग होता है जिसे राई का तेल भी कहते है।

यहाँ हरी पत्तेदार सब्जियों की गड्डियों को कट्टे कहते है। एक गड्डी को एक कट्टा कहते है। पाँच रूपए में पाँच कट्टे सामान्य दाम है, मँहगे होने पर दो कट्टे मिलते है, इन्हें भाजी के कट्टे कहते है। भाजियों के सिर्फ़ नाम ही नहीं लिए जाते बल्कि नाम के साथ भाजी शब्द भी बोला जाता है जैसे पालक की भाजी, मेथी की भाजी।

हैदराबादी भाजियाँ जो अन्य स्थानों पर शायद नहीं मिलती - अम्बाड़ा, चुक्का, माट, कुल्फ़ा और सोया। कुल्फ़ा को गोल की भाजी भी कहते है।

अन्य सब्जियाँ है चिगुर, बोण्डे, मोगरे

इमली के पत्तों को चिगुर कहते है जो बहुत छोटे- छोटे होते है और किलो से बेचे जाते है इसीलिए इन्हें भाजी नहीं कहते।

अम्बाड़े की भाजी के फूलों को बोण्डे कहते है। यहाँ हम एक बात बता दे कि आजकल डाक्टर हृदय रोगियों को बोण्डे खाने की सलाह दे रहे है।

मूली की फलियों को मोगरे कहते है।

इनके वैज्ञानिक नाम और 100 ग्राम साग में पोषक तत्व हम बता दें -

सामान्य नाम - वैज्ञानिक नाम -कैल्शियम (मिली ग्राम) - आयरन (मिली ग्राम) - विटामिन सी (मिली ग्राम) - कैरोटीन (म्यू ग्राम)

अम्बाड़ा - हाईबिस्कस कैनाबिनस - 172 - 2 -20 - 2898 - बीटा कैरोटीन अधिक मात्रा में होता है

माट (चौलाई या राजगिरा) - एमरैन्थस गैनजेटिकस या एमरैन्थस पैनिक्यूलेटस - 397 - 25 - 99 - 5520 राजगिरा में कैरोटीन 14190 म्यू ग्राम, बीटा कैरोटीन अधिक मात्रा में होता है

कुल्फ़ा (गोल की भाजी) - पोरच्यूलाका आँलेरेसिया - 111 - 15 - 29 - 2292

चुक्का - रियूमैक्स वैसीकेरियस - 63 - 1 - 12 - 3660

चिगुर - टैमरिन्डस इन्डिका - 101 - 1 - 3 - 250

इनमें से माट की भाजी आन्ध्रा के लोगों के साथ हैदराबाद में आई है, पहले यहाँ नहीं थी। इसी तरह सब्जी गिलोरे जो हरे रंग के होते है और एक ऊंगली की तरह लम्बे और थोड़े मोटे होते है, यह भी आन्ध्र संस्कृति के है।

खास हैदराबादी शाकभाजी है - बैंगन, कद्दू, अम्बाड़ा, बोण्डे, लम्बी मोटी मिर्ची, मोगरे, चिगुर, कोथमीर (हरा धनिया), करयापाक (करी पत्ता)

इन सबका प्रयोग आज भी उतना ही होता है जितना उन दिनों हुआ करता था जब हैदराबाद रियासत थी।

इस शाकभाजी के बारे में विस्तार से जानकारी अगले किन्ही चिट्ठों में…

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