Archive for August, 2009

पुरवाई के दो साल

दो साल पहले आज ही के दिन पुरवाई की शुरूवात हुई थी एक बरखा गीत से।

शुरू में मेरी साहित्यिक रूचि बहुत उभर कर आई और चिट्ठों में हिन्दी साहित्य से काव्य की भरमार होने लगी। यहाँ तक कि अंताक्षरी भी रखी गई। साथ में मेरा घूमने फिरने का शौक भी सामने आया। जिन-जिन स्थानों का मैनें भ्रमण किया, जहाँ जैसा देखा वैसा ही लिख दिया चित्रों सहित। यह पर्यटन संबंधी चिट्ठे बन गए।

धीरे-धीरे इन पर्यटन संबंधी चिट्ठों की संख्या बढती जा रही है। इन दो सालों में पुरवाई को तेरह हजार से अधिक बार पढा गया। अब पुरवाई पर साहित्यिक रचनाएँ प्रस्तुत करना विषयांतर लग रहा है। इसीलिए मैनें सोचा कि अपनी साहित्यिक रूचि को मैं अलग ब्लोग में क्यों न रखूँ…

यही सोच कर पुरवाई के दो साल पूरे होने के अवसर पर मैं साहित्य के साथ एक नया ब्लोग शुरू कर रही - अंताक्षरी

इसमें हिन्दी साहित्य से काव्य रचनाएँ अंताक्षरी के क्रम में होगी। वैसे तो अंताक्षरी में आरंभि 4 पंक्तियाँ ही होती है पर यहाँ तो रूचि की बात है इसीलिए रचनाएँ पूरी रहेगी ताकि साहित्य का पूरा आनन्द लिया जा सकें।

तो कल निकलेगा ब्लोग - अंताक्षरी

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अशोक काल के स्तूप

अमरावती में बौद्ध काल का संग्रहालय देखने के बाद हम बाहर निकले और संग्रहालय के पीछे थोड़ा ही आगे बढने पर एक विशाल परिसर में देखें अशोक काल के स्तूप।

स्तूप देखने के लिए पाँच रूपए का टिकट है। हम टिकट लेकर आगे बढे। पूरा खुला परिसर है। आगे जाने के बाद हमने देखा बड़े घेरे में गोलाई में विभिन्न आकार के स्तूप रखे है जैसा कि तस्वीर में नज़र आ रहा है -

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यहाँ से पीछे ऊँचाई पर नज़र आ रही है बुद्ध की प्रतिमा जो निर्माणाधीन बौद्ध मन्दिर है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके है।

यह स्तूप समय-समय पर की गई विभिन्न खुदाइयों में प्राप्त हुए -

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यह है धर्मचक्र -

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बौद्ध काल में धर्माचक्र की ही पूजा की जाती थी -

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इस तरह आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी अमरावती की यह यात्रा हमारे लिए ज्ञानवर्धक रही। अपने आपको कुछ अधिक जानकार महसूस करते हुए हम हैदराबाद लौट आए।

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बौद्ध विहार – संग्रहालय

अमरावती में हम बौद्ध मन्दिर देखने के बाद बौद्ध विहार देखने चल पड़े।

यूँ तो अमरावती इतनी छोटी सी जगह है कि पैदल चल कर ही घूमा जा सकता है पर यहाँ बड़े आटो भी चलते है जिनमें 6 लोग आराम से बैठ सकते है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए प्रति व्यक्ति 5 रूपए किराया है। हम भी आटो से बौद्ध विहार पहुँचे।

बौद्ध विहार के बारे में बताने से पहले हम यह बता दे कि दूसरी और तीसरी शताब्दी में यहाँ मौर्य शासन का प्रभाव था। बौद्ध धर्म का प्रचलन 14 वीं सदी तक रहा। बौद्धकाल में बौद्ध धर्म के उपदेशों को शिलाओं पर खुदवाने का चलन था ताकि जनता इन उपदेशों का लाभ ले सकें। शिलाओं पर खुदाई की शिल्पकारी में अमरावती की कला बहुत प्रसिद्ध रही। 14 वीं सदी के बाद जब बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया तब यह शिलाएँ भी टूट कर बिखर कर मिट्टी में समाती गई। साथ ही इस समय की मूर्तियाँ भी गर्त में समा गई। इस काल में धर्मचक्र की पूजा होती थी। छोटे बड़े कई धर्मचक्र बाद में धरती में समा गए। बाद के वर्षों में समय-समय पर की गई खुदाइयों में यह धर्मचक्र, शिलाएँ, मूर्तियाँ मिलती गई।

बौद्ध विहार में बौद्ध काल का संग्रहालय है और इसके पीछे थोड़ा आगे बढने पर अशोक स्तूप की शिलाएँ है। इसीलिए यह पूरा क्षेत्र बौद्ध विहार कहलाता है।

संग्रहालय के प्रवेशद्वार पर आन्ध्रप्रदेश निवासी महान गणितज्ञ नागार्जुन की मूर्ति है जो वर्ष 2006 में लगाई गई जब यहाँ अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध धर्म सम्मेलन कालचक्र का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता दलाईलामा ने की थी -

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संग्रहालय में भीतर जाने के लिए दो रूपए का टिकट है। हम टिकट लेकर भीतर पहुँचे। भीतर विभिन्न खुदाइयों के दौरान मिली बौद्ध काल की मूर्तियाँ, धर्मचक्र, शिलाएँ रखी गई है। दो-चार शिलाओं में ही पाली प्राकृत लिपि नज़र आई।

प्रमुख आकर्षण था सातवाहन काल का सातवीं सदी का नन्दी। सफ़ेद धूसर रंग के पत्थर से बना जीवन्त लग रहा था।

नन्दी के अलावा बड़ा धर्मचक्र भी बहुत आकर्षक लगा। इसके अलावा कांस्य का बड़ा कुंभ भी आकर्षण का केन्द्र है जो लोहे के स्टैंड पर रखा है।

इसके अलावा उस समय प्रयोग किए जाने वाले ताम्बे के बर्तन जिनमें बौद्ध भिक्षुओं के भिक्षा पात्र भी थे। उस समय प्रचलित सिक्के भी है जो बहुत ही छोटे-छोटे और कांस्य के है।

कई ऐसे पत्थर रखे है जिस पर की गई शिल्पकारी से उस समय की जीवन शैली का पता चलता है जैसे एक पत्थर पर दिखाया गया कि एक युगल धर्मचक्र की पूजा कर रहे है। इसके अलावा बौद्ध काल की जातक कथाओं को भी पत्थरों पर उकेरा गया है।

यहाँ की गई विभिन्न खुदाइयों में मिले अशोक स्तूप की चर्चा अगले चिट्ठे में…

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