Archive for July, 2009

अमरेश्वर मन्दिर – स्वयंभू शिवलिंग

अमरावती में कृष्णा नदी के तट पर बने अमरेश्वर मन्दिर के एकदम पास के होटल में हम ठहरे थे।

बालकनी से देखा सवेरे 5 बजे मन्दिर के कपाट खुले। यह है मन्दिर परिसर का चित्र जो बालकनी से लिया गया, बाईं ओर गोपुरम यानि प्रवेश द्वार भी नज़र आ रहा है -

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मन्दिर के बाहर केवल दो ठेलों पर ही नारियल और पूजा की सामग्री जिसमें अगरबत्ती के अलावा अभिषेक की सामग्री जैसे डिब्बाबन्द शहद, पानी, चन्दन, रोला और दूध का पैकेट था पर फूल नहीं थे। बताया गया कि फूल दिन चढने पर मिलेंगें। यह सब सामग्री लेकर हम मन्दिर के भीतर पहुँचे।

यह है मन्दिर का गोपुरम -

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और दाहिनी ओर है प्रवेशद्वार -

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चित्र में जो परिसर नज़र आ रहा है उसमें दाहिनी ओर से आगे बढने पर दो चार दुकानें दिखाई दी। मन्दिर की दुकानें होने के कारण यहाँ फूलमाला सहित पूजा की सभी सामग्री थी। शिवजी के लिए बेलपत्र भी थे और पार्वतीजी की पूजा के लिए फूलों में कमल भी थे और साथ में चढावे के लिए लाल चूड़ियों के पैकेट और ब्लाउज़ पीस भी थे।

सामने ही चप्पल-जूते रखने की व्यवस्था थी। इसके बाद लगा था काउंटर जहाँ टिकट मिलते है। शिवजी के अभिषेक के लिए 50 रूपए का टिकट जिस पर दो लोग भीतर जा सकते है इससे अधिक होने पर प्रति व्यक्ति 10 रूपए का टिकट लेना पड़ता है। पार्वतीजी की अष्टरूप पूजा के लिए 30 रूपए का टिकट है जिस पर अधिक लोग जा सकते है।

हमने अपने चप्पल रखे और पूजा की सब सामग्री लेकर हम मन्दिर के भीतर जाने लगे। लगभग दस सीढियाँ पार करने पर पीतल का दमकता लम्बा स्तम्भ जड़ा था जहाँ प्रणाम कर हम और ऊपर चढे और लगभग दस सीढियाँ पार कर ऊपर पहुँचे।

ऊपर बीचोंबीच मन्दिर है और चारों कोनों पर छोटे शिवलिंग स्थापित है जिन्हें छोटे-छोटे मन्दिरों में रखा गया है। गर्भगृह में केवल दर्शन करने हो तो सामने से जा कर दर्शन करना है और अगर अभिषेक करवाना हो तो बाईं ओर आगे चलकर बीच में से रास्ता है। द्वार पर बैठे पुरोहित को टिकट देकर हम गर्भगृह में पहुँचे। इस तरह अभिषेक के लिए गर्भगृह के भीतर जाना होता है।

गर्भगृह में सामने ऊँचा स्वयंभू शिवलिंग है जिसकी वास्तविक ऊँचाई बत्तीस (32) फीट है। धरती के ऊपर 9 फीट है और शेष ज़मीन के नीचे है। चूंकि शिवलिंग ऊँचा है इसीलिए निरन्तर शिवलिंग पर गिरने वाले बूँद-बूँद पानी के लिए गंगाल (बर्तन) ऊँचा बँधा था जहाँ तक पहुँचने के लिए बाए किनारे से सीढियाँ है।

ऊपर छोटा अहाते जैसा बना है और जिसकी दीवारें सुनहरी दमक रही थी और जिस पर शिवजी और सूर्य के चित्र उकेरे हुए थे। ऊपर पहुँच कर पुरोहित ने मंत्रोच्चार के साथ अभिषेक किया।

शिवलिंग 9 फीट लम्बा पत्थर है जो गोलाई में है जिसका रंग सफ़ेद धूसर है। ऊपरी छोर पर चक्र जैसा लगा है जिस पर शिवजी का चित्र उकेरा गया है और निचले छोर पर भी एक चक्र जैसा है जिसके दाहिनी ओर काले पत्थर से वैसा ही बना है जैसा कि आमतौर पर शिवलिंग के नीचे होता है जिसमें से अभिषेक का पानी बाहर पतली धार के रूप में निकलता है जिसे तीर्थ के रूप में ग्रहण किया जाता है। तीर्थ लेकर हम बाहर निकले।

इस स्वयंभू शिवलिंग को आप इस चित्र में देख सकते है। यह चित्र ऊपर मन्दिर के अहाते में बाईं ओर लगा है जो काले पत्थर पर तैयार किया गया है। इसमें प्रमुख शिवलिंगों के चित्र है बीच में यहाँ का शिवलिंग है जो शायद सबसे अधिक लम्बा है। दोनों ओर दीपक है। नीचे पार्वती जी का चित्र है। हम यहाँ बता दे कि देवी को माता या माताजी कहा जाता है और दक्षिण में अम्मावारी कहते है -

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गर्भगृह के बाहर विशाल नन्दी विराजमान है। परम्परा के अनुसार हमने नन्दी के सिंगों में से शिवलिंग देखने की बहुत कोशिश की पर पूरा शिवलिंग नहीं देख पाए। दाहिनी ओर पार्वती जी (अम्मावारी) की भव्य मूर्ति स्थापित है और गर्भगृह के किवाड़ के बाहर सिंह विराजमान है। पुरोहित को टिकट देकर पार्वती जी की अर्चना करवाई फिर आरती तीर्थ प्रसाद लेकर हम बाहर निकले।

बाहर दाई ओर कृष्णजी का छोटा सा मन्दिर है जिसे वेणुगोपाल स्वामी का मन्दिर कहते है। कृष्णजी के दर्शन कर हम सीढियाँ उतर कर आए और दाहिनी ओर नौग्रह के मन्दिर में पूजा की फिर बाहर परिसर में आ गए।

परिसर में एक दो दुकानों में देवी देवताओं की मूर्तियाँ, आडियो वीडियो कैसेट आदि बिक रहे थे। एकाध दुकान अल्पाहार की थी जहाँ हमने गरमागरम दक्षिण भारतीय नाश्ता किया।

परिसर का पीछे का द्वार कृष्णा नदी के किनारे खुलता है। वास्तव में मन्दिर की सीढियाँ बाहर सीधे नदी के किनारे जाती है। परम्परा यह है कि नदी में पवित्र स्नान कर मन्दिर में जाया जाता है पर नदी और उसके तट का जो हाल है उसे देख कर यह संभव नहीं जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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अमरावती – एक छोटा सा दर्शनीय और महत्वपूर्ण गाँव

हमारे देश में बहुत कम स्थान ऐसे है जो पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। एक ऐसा ही स्थल है - अमरावती

ऐसे महत्वपूर्ण स्थल को देखने की कामना लिए पिछले दिनों हम अमरावती गए।

अमरावती का नाम लेते ही दिमाग़ में आता है महाराष्ट्र। देश भर में लोकप्रिय है महाराष्ट्र का अमरावती। यहाँ तक कि सालों पहले से लेकर आज तक सिलोन से लेकर विविध भारती तक कई-कई श्रोता अमरावती से फ़िल्मी गानों की फ़रमाइश करते है। हम आपको बता दे कि एक और अमरावती है जो आन्ध्र प्रदेश में है।

आन्ध्र प्रदेश के गुण्टूर ज़िले का एक छोटा सा गाँव है अमरावती। इतना छोटा कि पूरे गाँव को आप पैदल घूम कर देख सकते है। यह छोटा सा गाँव पूरा का पूरा महत्वपूर्ण है इसीलिए दर्शनीय है और इसीलिए छोटा सा गाँव होने के बावजूद भी यहाँ सुविधाएँ है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग का विश्राम गृह है। ठहरने के लिए लाँज और होटल है जहाँ वातानुकूलित (एयर कंडीशन) कमरे भी है। एटीएम की सुविधा है। डाकघर और टेलीफोन केन्द्र भी है।

हैदराबाद से अमरावती तक की यात्रा 8 घण्टे की है पर सीधे बस और रेल सेवा नहीं है। हैदराबाद से गुण्टूर या विजयवाड़ा जाकर वहाँ से बस से अमरावती पहुँचा जाता है। हैदराबाद से गुण्टूर और विजयवाड़ा जाने के लिए और इन दोनों स्थानों से अमरावती जाने के लिए बहुत बसें है। हैदराबाद से अमरावती जाने वालों की संख़्या कम होने से सीधे बस सेवा नहीं है पर कुछ टूर पैकेज में सीधे बसें है।

हमने गुण्टूर से जाने का निर्णय लिया और गुण्टूर तक रेल यात्रा की। दोपहर 12 बजे नामपल्ली स्टेशन से रेलगाड़ी रवाना हुई और शाम 5:30 बजे हम गुण्टूर पहुँचे। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही अमरावती जाने के लिए बसें मिल जाती है। 15 मिनट के भीतर हमें भी बस मिल गई।

एक तो शाम का समय और ऊपर से मानसून दस्तक दे चुका है तो स्वाभाविक है कि मौसम बहुत सुहावना था। बस जैसे ही शहर से बाहर निकली बूँदा-बाँदी शुरू हो गई। दोनों ओर बारी-बारी से खेत और पहाड़ नज़र आ रहे थे जिनका नज़ारा शाम के झुटपुटे और रिमझिम में बहुत आकर्षक था। फिर थोड़ी देर के लिए बहुत तेज़ बारिश हुई। इस तरह डेढ घण्टे का सफ़र पूरा कर अमरावती पहुँचने तक अँधेरा हो चुका था और बत्ती गुल हो चुकी थी।

ख़ैर… जहाँ हम बस से उतरे वहीं हमें ठहरने की जगह मिल गई। बताया गया कि बारिश बहुत हुई थी जिससे करंट नहीं है और पता नहीं कब आए, यह तो आम समस्या है। हमने तरोताज़ा होकर कुछ देर आराम किया फिर बत्ती भी जल उठी। हमने सोचा खाना खाकर कुछ देर हवा में बाहर टहला जाए।

हम आपको बता दे कि तीन साल पहले यह गाँव अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर था। जनवरी 2006 में यहाँ बौद्ध धर्म के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता स्वयं दलाईलामा ने की थी।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बौद्ध काल के कारण अमरावती का महत्व है बल्कि इसका पौराणिक महत्व भी है जो श्रावण मास में और बढ जाता है। देश के 5 प्रमुख स्वयंभू शिवलिंगों में से एक यहाँ है। यह मन्दिर अमरेश्वर मन्दिर कहलाता है जो कृष्णा नदी के किनारे बसा है।

बस मन्दिर के पास ही छोड़ती है क्योंकि यह गाँव का अंतिम छोर है और हम भी यही ठहरे थे। रात में हमने देखा मन्दिर के बाहरी परिसर में सन्नाटा पसरा था। हमारी आशा के विपरीत रात की आरती का हल्ला-गुल्ला नहीं था। वैसे भी यहाँ पर्यटक कम ही आते है इसीलिए हमने घूमने का कार्यक्रम अगले दिन के लिए रखा।

अगले दिन हमने पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों को देखने का आनन्द उठाया जिन्हें हम आपसे बाँटना चाहेंगे। एक के बाद एक इनकी जानकारी हम देगें अगले चिट्ठों में…

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हैदराबादी भाषा

हैदराबादी भाषा से वास्तव में जनता परिचित हुई हिन्दी फ़िल्मों से और यह परिचय करवाया महमूद ने।

वास्तव में हैदराबाद में एक भाषा-भाषी लोग नहीं है। यहाँ के मुसलमानों की भाषा उर्दू है, कायस्थ और खत्रियों की हिन्दी है, मरेठों की भाषा मराठी है, राजस्थानी लोग भोजपुरी और मारवाड़ी बोली बोलते है, तेलंगे तेलुगु भाषा बोलते है पर यह तेलुगु आन्ध्र प्रदेश की तेलुगु से अलग है। आन्ध्र प्रदेश की तेलुगु साहित्यिक है जबकि इन तेलंगाना वासी तेलंगों की तेलुगु एक बोली की तरह है। जनजाती पारदनों और लम्बाड़ियों की अपनी-अपनी बोलियाँ है पर सबकी आम भाषा हैदराबादी उर्दू है।

कुछ हैदराबादी शब्द बहुत अधिक जाने-पहचाने हो गए है जैसे हाँ के लिए हौ कहना और यह हौ में भी ह के साथ औ की मात्रा का सामान्य उच्चारण नहीं है, सही उच्चारण है - hauo और नहीं के लिए नक्को कहना, वास्तव में नक्को मराठी का शब्द है और पता नहीं यह कैसे हैदराबादी उर्दू में आ गया है, यह शब्द मरेठों के हैदराबाद रियासत में बसने के पहले से है।

हैदराबादी उर्दू को दक्खिनी उर्दू कहा जाता है क्योंकि यह लखनऊ की उर्दू से अलग है। लखनऊ की उर्दू साहित्यिक है जबकि हैदराबाद की उर्दू वास्तव में भाषा से अधिक एक बोली की तरह है।

यहाँ मैं कुछ ऐसे शब्द दे रही हूँ जिनका दैनिक उपयोग होता है -

हाँ - हौ
नहीं - नक्को (मना करने के लिए)
नहीं - नइ
नहीं नहीं - नक्कोइच्च नक्को
क्यों - कईकू
यहीं है - यईच्च है
वहीं है - वईच्च है
इधर ही - इदरिच्च
उधर ही - उदरिच्च
पड़ता है -पड़तईच्च
ऐसा - अईसा
ऐसा ही - अइसइच्च
वैसा - वईसा
वैसा ही - वइसइच्च
कैसा - कईसा
कैसा ही है - कइसाकीच्च
वो - उनो
ये - इनो
मुझे - मेरेकू
तुझे - तेरेकू
अपने को - अपनकू
तुम लोग - तुमे लोगा
बातें - बातां
बहुत - भोत
कच्चा है - कच्चइच है
पका ही नहीं - पकईच्च नइ

कुछ और शब्द भी है और शब्दों के अलावा कुछ वाक्य भी है जिन्हें हम अगले किसी चिट्ठे में बताएगें…

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