अमरावती में कृष्णा नदी के तट पर बने अमरेश्वर मन्दिर के एकदम पास के होटल में हम ठहरे थे।
बालकनी से देखा सवेरे 5 बजे मन्दिर के कपाट खुले। यह है मन्दिर परिसर का चित्र जो बालकनी से लिया गया, बाईं ओर गोपुरम यानि प्रवेश द्वार भी नज़र आ रहा है -

मन्दिर के बाहर केवल दो ठेलों पर ही नारियल और पूजा की सामग्री जिसमें अगरबत्ती के अलावा अभिषेक की सामग्री जैसे डिब्बाबन्द शहद, पानी, चन्दन, रोला और दूध का पैकेट था पर फूल नहीं थे। बताया गया कि फूल दिन चढने पर मिलेंगें। यह सब सामग्री लेकर हम मन्दिर के भीतर पहुँचे।
यह है मन्दिर का गोपुरम -

और दाहिनी ओर है प्रवेशद्वार -

चित्र में जो परिसर नज़र आ रहा है उसमें दाहिनी ओर से आगे बढने पर दो चार दुकानें दिखाई दी। मन्दिर की दुकानें होने के कारण यहाँ फूलमाला सहित पूजा की सभी सामग्री थी। शिवजी के लिए बेलपत्र भी थे और पार्वतीजी की पूजा के लिए फूलों में कमल भी थे और साथ में चढावे के लिए लाल चूड़ियों के पैकेट और ब्लाउज़ पीस भी थे।
सामने ही चप्पल-जूते रखने की व्यवस्था थी। इसके बाद लगा था काउंटर जहाँ टिकट मिलते है। शिवजी के अभिषेक के लिए 50 रूपए का टिकट जिस पर दो लोग भीतर जा सकते है इससे अधिक होने पर प्रति व्यक्ति 10 रूपए का टिकट लेना पड़ता है। पार्वतीजी की अष्टरूप पूजा के लिए 30 रूपए का टिकट है जिस पर अधिक लोग जा सकते है।
हमने अपने चप्पल रखे और पूजा की सब सामग्री लेकर हम मन्दिर के भीतर जाने लगे। लगभग दस सीढियाँ पार करने पर पीतल का दमकता लम्बा स्तम्भ जड़ा था जहाँ प्रणाम कर हम और ऊपर चढे और लगभग दस सीढियाँ पार कर ऊपर पहुँचे।
ऊपर बीचोंबीच मन्दिर है और चारों कोनों पर छोटे शिवलिंग स्थापित है जिन्हें छोटे-छोटे मन्दिरों में रखा गया है। गर्भगृह में केवल दर्शन करने हो तो सामने से जा कर दर्शन करना है और अगर अभिषेक करवाना हो तो बाईं ओर आगे चलकर बीच में से रास्ता है। द्वार पर बैठे पुरोहित को टिकट देकर हम गर्भगृह में पहुँचे। इस तरह अभिषेक के लिए गर्भगृह के भीतर जाना होता है।
गर्भगृह में सामने ऊँचा स्वयंभू शिवलिंग है जिसकी वास्तविक ऊँचाई बत्तीस (32) फीट है। धरती के ऊपर 9 फीट है और शेष ज़मीन के नीचे है। चूंकि शिवलिंग ऊँचा है इसीलिए निरन्तर शिवलिंग पर गिरने वाले बूँद-बूँद पानी के लिए गंगाल (बर्तन) ऊँचा बँधा था जहाँ तक पहुँचने के लिए बाए किनारे से सीढियाँ है।
ऊपर छोटा अहाते जैसा बना है और जिसकी दीवारें सुनहरी दमक रही थी और जिस पर शिवजी और सूर्य के चित्र उकेरे हुए थे। ऊपर पहुँच कर पुरोहित ने मंत्रोच्चार के साथ अभिषेक किया।
शिवलिंग 9 फीट लम्बा पत्थर है जो गोलाई में है जिसका रंग सफ़ेद धूसर है। ऊपरी छोर पर चक्र जैसा लगा है जिस पर शिवजी का चित्र उकेरा गया है और निचले छोर पर भी एक चक्र जैसा है जिसके दाहिनी ओर काले पत्थर से वैसा ही बना है जैसा कि आमतौर पर शिवलिंग के नीचे होता है जिसमें से अभिषेक का पानी बाहर पतली धार के रूप में निकलता है जिसे तीर्थ के रूप में ग्रहण किया जाता है। तीर्थ लेकर हम बाहर निकले।
इस स्वयंभू शिवलिंग को आप इस चित्र में देख सकते है। यह चित्र ऊपर मन्दिर के अहाते में बाईं ओर लगा है जो काले पत्थर पर तैयार किया गया है। इसमें प्रमुख शिवलिंगों के चित्र है बीच में यहाँ का शिवलिंग है जो शायद सबसे अधिक लम्बा है। दोनों ओर दीपक है। नीचे पार्वती जी का चित्र है। हम यहाँ बता दे कि देवी को माता या माताजी कहा जाता है और दक्षिण में अम्मावारी कहते है -

गर्भगृह के बाहर विशाल नन्दी विराजमान है। परम्परा के अनुसार हमने नन्दी के सिंगों में से शिवलिंग देखने की बहुत कोशिश की पर पूरा शिवलिंग नहीं देख पाए। दाहिनी ओर पार्वती जी (अम्मावारी) की भव्य मूर्ति स्थापित है और गर्भगृह के किवाड़ के बाहर सिंह विराजमान है। पुरोहित को टिकट देकर पार्वती जी की अर्चना करवाई फिर आरती तीर्थ प्रसाद लेकर हम बाहर निकले।
बाहर दाई ओर कृष्णजी का छोटा सा मन्दिर है जिसे वेणुगोपाल स्वामी का मन्दिर कहते है। कृष्णजी के दर्शन कर हम सीढियाँ उतर कर आए और दाहिनी ओर नौग्रह के मन्दिर में पूजा की फिर बाहर परिसर में आ गए।
परिसर में एक दो दुकानों में देवी देवताओं की मूर्तियाँ, आडियो वीडियो कैसेट आदि बिक रहे थे। एकाध दुकान अल्पाहार की थी जहाँ हमने गरमागरम दक्षिण भारतीय नाश्ता किया।
परिसर का पीछे का द्वार कृष्णा नदी के किनारे खुलता है। वास्तव में मन्दिर की सीढियाँ बाहर सीधे नदी के किनारे जाती है। परम्परा यह है कि नदी में पवित्र स्नान कर मन्दिर में जाया जाता है पर नदी और उसके तट का जो हाल है उसे देख कर यह संभव नहीं जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…