मदुरै से 6 मील की दूरी पर है तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर।
यह शिव-पार्वती के दूसरे पुत्र यानि गणेश जी के भाई कार्तिक या कार्तिकेय के 6 प्रमुख मन्दिरों में से एक है। इसीलिए यह एक प्रसिद्ध मन्दिर है। कार्तिक को यहाँ सुब्रह्मण्यम या सुब्रह्मण्यम स्वामी कहा जाता है।
यह मन्दिर एक गुफ़ा में है। माना जाता है कि कार्तिक ने शूरपद्मासुर के अस्तित्व को मिटाने के बाद इन्द्र देवता की बेटी देवयानी से यहीं पर विवाह किया था। इसीलिए यहाँ कार्तिकेय नव वर के रूप में दर्शन देते है।
यह है मन्दिर -

पीछे पहाड़ देखे जा सकते है। प्रवेश पर लम्बा चौड़ा कक्ष है जहाँ 48 स्तम्भ है जो शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना है। सामने ही कुछ स्तम्भ नज़र आ रहे है। सामने लगा है पूजा की सामग्री का बाज़ार।
पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे। भीड़ बहुत थी। भीड़ के कारण विशेष दर्शन की सुविधा है जिसके लिए प्रति व्यक्ति 50 रूपए देने पड़ते है। हमने भी विशेष दर्शन किए।
गर्भगृह प्रथम माले पर है। शिल्पकारी स्तम्भों को देखते हुए कक्ष के अन्तिम छोर से ऊपर जाने के लिए सीढियाँ है जो पत्थर की बनी है। गर्भगृह में केवल दीपों से उजाला है। सामने शिवजी और पार्वतीजी की अलग-अलग किन्तु पास में मूर्तियाँ है। दाहिने किनारे गणेशजी और बाएँ कार्तिकेय या सुब्रह्मण्यम जी की मूर्ति है। व्यव्स्था ऐसी कि पहले गणेशजी के ही दर्शन हो। सभी मूर्तियाँ विशाल है और पत्थर की बनी है।
यहाँ से दूसरे छोर से बाहर निकलने पर एक और बड़ा कक्ष है। यहाँ मुख्य रूप से विष्णु और दुर्गा की मूर्तियाँ है। इसके अलावा पौराणिक कथाओं पर आधारित चित्र दीवारों पर उकेरे गए है।
यह देखने के बाद हम नयक्कार महल देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…
PN Subramanian said
सुन्दर वर्णन. त्रुटिवश चित्र अपलोड नहीं हो पाया होगा. चित्र लगा दें.
समीर लाल said
आभार..अच्छा वर्णन और चित्र.