Archive for June, 2009

मदुरै में कार्तिकेय का तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर

मदुरै से 6 मील की दूरी पर है तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर।

यह शिव-पार्वती के दूसरे पुत्र यानि गणेश जी के भाई कार्तिक या कार्तिकेय के 6 प्रमुख मन्दिरों में से एक है। इसीलिए यह एक प्रसिद्ध मन्दिर है। कार्तिक को यहाँ सुब्रह्मण्यम या सुब्रह्मण्यम स्वामी कहा जाता है।

यह मन्दिर एक गुफ़ा में है। माना जाता है कि कार्तिक ने शूरपद्मासुर के अस्तित्व को मिटाने के बाद इन्द्र देवता की बेटी देवयानी से यहीं पर विवाह किया था। इसीलिए यहाँ कार्तिकेय नव वर के रूप में दर्शन देते है।

यह है मन्दिर -

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पीछे पहाड़ देखे जा सकते है। प्रवेश पर लम्बा चौड़ा कक्ष है जहाँ 48 स्तम्भ है जो शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना है। सामने ही कुछ स्तम्भ नज़र आ रहे है। सामने लगा है पूजा की सामग्री का बाज़ार।

पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे। भीड़ बहुत थी। भीड़ के कारण विशेष दर्शन की सुविधा है जिसके लिए प्रति व्यक्ति 50 रूपए देने पड़ते है। हमने भी विशेष दर्शन किए।

गर्भगृह प्रथम माले पर है। शिल्पकारी स्तम्भों को देखते हुए कक्ष के अन्तिम छोर से ऊपर जाने के लिए सीढियाँ है जो पत्थर की बनी है। गर्भगृह में केवल दीपों से उजाला है। सामने शिवजी और पार्वतीजी की अलग-अलग किन्तु पास में मूर्तियाँ है। दाहिने किनारे गणेशजी और बाएँ कार्तिकेय या सुब्रह्मण्यम जी की मूर्ति है। व्यव्स्था ऐसी कि पहले गणेशजी के ही दर्शन हो। सभी मूर्तियाँ विशाल है और पत्थर की बनी है।

यहाँ से दूसरे छोर से बाहर निकलने पर एक और बड़ा कक्ष है। यहाँ मुख्य रूप से विष्णु और दुर्गा की मूर्तियाँ है। इसके अलावा पौराणिक कथाओं पर आधारित चित्र दीवारों पर उकेरे गए है।

यह देखने के बाद हम नयक्कार महल देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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मीनाक्षी मन्दिर की भव्यता और शिवदर्शन

मदुरै में मीनाक्षी मन्दिर में देवी मीनाक्षी (पार्वती जी) के दर्शन के बाद हम आगे बढे सुन्दरेश्वर (शिव जी) के दर्शन के लिए।

प्रवेश द्वार पर 12 फीट ऊँची द्वारपालकों की सजीव मूर्तियाँ है। शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना देवी सरस्वती, काशी विश्वनाथ, भिक्षाटन शिवजी, दुर्गा आदि की के रूप देखते हुए हम आगे बढे। आगे है नटराज। बहुत भव्य मूर्ति है - अपना दाहिना पैर उठाए शिवजी नृत्य करते प्रतीत होते है। आगे गर्भगृह में 64 भूतगण, 8 हाथी और 32 शेरों की आकृतियाँ देखने के बाद हमने दर्शन किए शिवलिंग के।

इस तरह मन्दिर में मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर के दर्शन करने के बाद हमने प्रसाद लिया। प्रसाद में लड्डू, वड़ा, भात दिया गया।

प्रसाद लेने के बाद थोड़ा आगे बढने पर हमें दुकाने सजी मिलती है जहाँ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, किताबें, आडियो-वीडियो कैसेट और इसके अलावा चूड़ियाँ, बिन्दी आदि भी बिक रहे थे। यहाँ से आगे बाहर जाने के लिए द्वार है पर उससे पहले है सहस्त्र स्तम्भ मन्दिर। यहाँ वास्तव में 985 स्तम्भ है जो किसी भी कोण से देखने पर सीध में दिखाई देते है। बाहर से भी इसका कुछ भाग देखा जा सकता है -

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यहाँ अर्जुन, कलिपुरूष, वीणापाणी, रति, मोहिनी के कला शिल्प है और नटराज की कोमल मूर्ति एक अलग मण्डप में है।

मीनाक्षी मन्दिर परिसर के चारों ओर गलियारे में छोटी बड़ी मीनारे है जिनमें चार मीनारे बड़ी नौ छतों वाली है और इसमें से दक्षिणी मीनार सबसे बड़ी 160 फुट ऊँची है। उत्तर की मीनार से 5 स्तम्भ लगे है। हर स्तम्भ में 22 छोटे स्तम्भ एक ही शिला को तराश्कर बनाए गए है। इन्हें थपथपाने से मधुर ध्वनि सुनाई देती है। इसीलिए इन्हें संगीतात्मक स्तम्भ कहते है।

यहाँ से निकल कर हम चले पड़े एक और मन्दिर देखने जिसका नाम बोलना कठिन है - तिरूप्परंकुन्रम मन्दिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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मदुरै का मीनाक्षी मन्दिर

रामेश्वरम की यात्रा के दौरान हम एक दिन के लिए मदुरै गए थे।

रामेश्वरम से मदुरै 3 घण्टे का रास्ता है। पामबन पुल से होकर बस से हमने यह यात्रा की।

मदुरै में बस से उतरने के बाद बस अड्डे से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है मीनाक्षी मन्दिर। मुख्य सड़क से एक छोटी सड़क एक ओर जाती है जहाँ भीतर जाने पर दूर से नज़र आता है मीनाक्षी मन्दिर का कलश। यह है प्रवेश द्वार -

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जैसा की आमतौर पर होता है प्रवेश द्वार पर पूजा सामग्री बिकती है, यहाँ भी मिल रही थी जिसे लेकर हम मन्दिर के भीतर पहुँचे पर भीतर पहुँचते ही देखा पूजा की सामग्री का बाज़ार लगा था जो मन्दिर की संस्था द्वारा चलाया जाता है।

यहाँ पार्वती-शिव, मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर के रूप में है। माना जाता है कि पार्वती ने पांड्य राजा की पुत्री मीनाक्षी के रूप में अवतार लिया और कुछ समय तक शासन करने के बाद सुन्दरेश्वर से विवाह किया जो शिव का अवतार है। इस विवाह से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपनी 64 लीलाएँ सारे भक्तों को दिखाई। इसीसे यहाँ मन्दिर की स्थापना की गई।

यह मन्दिर सातवीं सदी में बनवाया गया। उस समय शिवलिंग की स्थापना की गई थी और अहाता बनवाया गया था। बाद में यहाँ नायक वंश के राजाओं ने देवी मीनाक्षी की महत्ता बनाए रखने के लिए इसे मीनाक्षी मन्दिर का रूप दिया और विभिन्न मण्डपों को तैयार करवा कर मन्दिर को बड़ा और भव्य बनवाया। आने वाले समय में राजाओं ने और मण्डप तैयार करवाए जिससे समय के साथ-साथ इसका आकार और भव्यता बढती गई और यह मीनाक्षी मन्दिर के रूप में उभर आया।

प्रवेशद्वार जो पूर्वभाग में है जिस बड़े कक्ष की ओर जाता है उसे अष्टशक्ति मण्डप कहते है। यहाँ देवी मीनाक्षी के विवाह को कलात्मक शिल्पकारी से दर्शाया गया है। यहीं दोनों ओर गणेशजी और सुब्रह्मण्यम जी (कार्तिकेय) की मूर्तियाँ है। दीवारों पर शिवजी की विभिन्न लीलाओं को भी कलात्मक शिल्पकारी से दर्शाया गया है।

अष्टलक्ष्मी मण्डप को पार कर हम लम्बे चौड़े मीनाक्षी नायक मण्डप में गए। यहाँ 5 छोटे रास्ते है जो आपस में कलात्मक स्तम्भों से विभाजित है। बीच में शिव-पार्वती भील-भीलनी के रूप में दर्शन देते है। पश्चिमी कोने में 1008 पीतल के दीप है।

इस मण्डप के पास है इरूठटु (अंधकार) मण्डप जहाँ शिल्पकारी में पौराणिक कथाओं के अनुसार गणपति, मोहिनी आदि रूप दर्शाए गए है।

इस मण्डप को पार करते ही बाईं ओर एक तालाब है जिसे स्वर्णपदम जलाशय कहते है यानि सोने के कमल का तालाब। माना जाता है कि इन्द्र देवता की पूजा के लिए स्वर्ण कमल यहीं से तोड़े गए थे। स्वर्ण से बना एक सुन्दर कमल तालाब की शोभा बढा रहा था।

तालाब के आगे पश्चिम में ऊँचल (झूला) मण्डप है। बताया गया कि यहाँ हर शुक्रवार को संगमरमर के फ़र्श पर मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर के विग्रह निकाल कर रखे जाते है ताकि श्रृद्धालु दर्शन कर सके।

झूला मण्डप के पास है किलिक्कूड़ु (तोता पिंजरा) मंडप। यहाँ तोतों को पाल कर पिंजरों में रखा जाता है। यहाँ भित्तियों और छत पर पांडवों, द्रौपदी के चित्र है। देवी मीनाक्षी के ब्याह को भी भित्ति चित्रों से यहाँ दर्शाया गया है। यहाँ गणपति की 8 फीट ऊँची मूर्ति है।

परम्परा के अनुसार पहले गणेश जी के दर्शन किए गए। इसके बाद जैसा कि परम्परा है कि पहले शिवजी के दर्शन किए जाते है फिर पार्वती जी के, यहाँ ऐसा नहीं है। यह पार्वती मन्दिर है, यहाँ पहले पार्वती के दर्शन किए जाते है जिसके बाद शिवजी के दर्शन किए जाते है।

यहाँ से हम फिर से मीनाक्षी देवी की प्रतिष्ठा के स्थान पर ही पहुँचते है लेकिन घूम कर। यहाँ का प्रवेशद्वार तिमंज़िला है जिसे गोपुरम कहते है। भीतर ऐरावत विनायकमूर्ति यानि हाथी पर सवार गणपति की मूर्ति और देवी मीनाक्षी की पालकी रखी है। यहाँ गर्भ गृह में हाथ में शुकवाही लिए भक्तों को अनुग्रह करती देवी मीनाक्षी (पार्वती जी) दर्शन देती है।

यहाँ तक पहुँचने के लिए भीड़ बहुत है लेकिन विशेष दर्शन की व्यवस्था है जिसके लिए प्रति व्यक्ति 100 रूपए देने पड़ते है। हमने भी विशेष दर्शन ही किए जिसके लिए लाइन में खड़े होने की आवश्यकता नहीं सीधे गर्भ गृह तक जा सकते है।

मूर्ति बहुत-बहुत भव्य है। यहाँ दो-तीन पुजारी होते है जो थोड़ी-थोड़ी देर बाद आरती करते जाते है और श्रृद्धालुओं को आरती, तीर्थ देते जाते है साथ ही मन्दिर और मूर्ति के बारे में बताते जाते है।

बताया गया कि देवी मीनाक्षी की मूर्ति के सामने बुध ग्रह है। मूर्ति के दर्शन करने के बाद पीछे मुड़कर उस दिशा में (जो मूर्ति के ठीक सामने है) देखते हुए प्रणाम किया जाता है। बुध ज्ञान का प्रतीक है। हरा पत्थर बुध का प्रतीक है। इसीलिए देवी की मूर्ति मरगत पत्थर से बनाई गई है। माना जाता है कि बुध के देव विष्णु और देवी गौरी है इसीलिए यहाँ माना जाता है कि देवी मीनाक्षी की उपासना करने वालों को अच्छी विद्या मिलती है। इसीसे बुधवार के दिन दर्शन करना बहुत अच्छा माना जाता है।

यहाँ से निकल कर हम आगे बढे सुन्दरेश्वर (शिवजी) के दर्शन के लिए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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