आज अक्षय तॄतीया (अक्खा तीज) के दिन दक्षिण के सबसे बडे तीर्थ रामेश्वरम में मुख्य दर्शन के बारे में लिखना अच्छा लग रहा है.
रामेश्वरम के मन्दिर रामालय में कुंड स्नान के बाद रामनाथ स्वामी यानि शिवजी के दर्शन किए जाते है।
सभी कुंड देखने के बाद हम भी मुख्य मन्दिर में दर्शन के लिए कतार में खड़े हो गए। भीड़ अधिक नहीं थी और आधे घण्टे के भीतर हमारी बारी आ गई।
गर्भगृह में एक के पीछे एक कुछ अधिक ही दूरी पर तीन दीपमालाएँ लगी हुई थी। बीच की दीपमाला के दीपकों के प्रकाश में काले पत्थर से बना शिवलिंग दमक रहा था। शिवलिंग के पीछे रक्षा करते फन फैलाए थे नागराज जिसके पीछे शिवजी की मूर्ति भी है। दर्शन कर हम बाहर आए। चारों ओर दीवारों से सटे शिवलिंग के विभिन्न रूप है जिनमें सभी लिंगार्चन भी है। इस मन्दिर की बाईं ओर है पार्वती मन्दिर।
पार्वती मन्दिर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर अष्टलक्ष्मी के दर्शन होते है। क्रम से लगी है आठ मूर्तियाँ। अच्छा लगा पार्वती जी के आठों रूपों को देखना - धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, वर लक्ष्मी, सन्तान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी
भीतर गर्भगृह में भी उसी तरह से दीपमालाएँ लगी थी जैसे शिव मन्दिर में है। बीच में पार्वतीजी की विशाल मूर्ति है।
पार्वतीजी के दर्शन कर हम बाहर निकले। पीछे दाहिनी ओर छोटा सा मन्दिर है जहाँ शेष शैय्या पर विश्राम कर रहे है विष्णु जी और पैरों के पास विराजमान है लक्ष्मीजी।
शिव मन्दिर के बाई ओर पार्वती मन्दिर है तो दाहिनी ओर छोटे-छोटे हवन कुंड बने है। यहाँ कुछ लोग हवन भी कर रहे थे। यहीं पर प्रसाद मिलता है। 50 रूपए में प्रसाद का एक सेट मिलता है जिसमें एक पैकेट में विशेष दक्षिण भारतीय शैली में बना हलवा होता है और साथ में भभूत और कुंकुम के पैकेट होते है। इसके अलावा एक सीलबन्द बोतल भी है जिसमें 21 कुंडों का पानी होता है। इसके अलावा पाँच लड्डुओं का एक पैकेट 10 रूपए का मिलता है। इसी तरह पंचामृत का छोटा डिब्बा भी ख़रीदा जा सकता है।
माना जाता है कि कुंड के पानी की बोतल का प्रयोग कई दिनों तक किया जा सकता है, रोज़ स्नान के पानी में कुछ बूँदें इस बोतल के पानी की डाल कर स्नान करना शुभ माना जाता है। इस तरह एक बोतल का उपयोग महीने भर तक किया जा सकता है। इस तरह अच्छा लगता है कि यात्रा के बाद भी कुछ दिनों तक इस माहौल से जुड़े रह सकते है। ख़ैर… हम बात कर रहे थे मन्दिर की…
मन्दिरों की परम्परा के अनुसार इस मन्दिर में भी नवग्रह का मन्दिर है। यहाँ कढाई में तेल गरम होता रहता है। इस तेल को दीपक में लेकर चढाया जाता है जिसमें यहाँ बैठे पुजारी मदद करते है।
मुख्य मन्दिर के आस-पास एक हाथी सज-धजा खड़ा होता है इसके साथ महावत भी पुजारी की वेशभूषा में होते है -

आरंभिक चिट्ठे में हमनें जटाशंकर के मन्दिर के बारे में बताया था वही है एक स्थान जहाँ दो हाथी है। बारी-बारी से एक-एक हाथी को नहला कर सजाया जाता है और मन्दिर में खड़ा किया जाता है।
इस तरह दक्षिण के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल में हमनें दर्शन किए। मन्दिर की सामान्य जानकारी अगले चिट्ठे में…






