Archive for April, 2009

रामेश्वरम में रामनाथ स्वामी के दर्शन

आज अक्षय तॄतीया (अक्खा तीज) के दिन दक्षिण के सबसे बडे तीर्थ रामेश्वरम में मुख्य दर्शन के बारे में लिखना अच्छा लग रहा है.

रामेश्वरम के मन्दिर रामालय में कुंड स्नान के बाद रामनाथ स्वामी यानि शिवजी के दर्शन किए जाते है।

सभी कुंड देखने के बाद हम भी मुख्य मन्दिर में दर्शन के लिए कतार में खड़े हो गए। भीड़ अधिक नहीं थी और आधे घण्टे के भीतर हमारी बारी आ गई।

गर्भगृह में एक के पीछे एक कुछ अधिक ही दूरी पर तीन दीपमालाएँ लगी हुई थी। बीच की दीपमाला के दीपकों के प्रकाश में काले पत्थर से बना शिवलिंग दमक रहा था। शिवलिंग के पीछे रक्षा करते फन फैलाए थे नागराज जिसके पीछे शिवजी की मूर्ति भी है। दर्शन कर हम बाहर आए। चारों ओर दीवारों से सटे शिवलिंग के विभिन्न रूप है जिनमें सभी लिंगार्चन भी है। इस मन्दिर की बाईं ओर है पार्वती मन्दिर।

पार्वती मन्दिर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर अष्टलक्ष्मी के दर्शन होते है। क्रम से लगी है आठ मूर्तियाँ। अच्छा लगा पार्वती जी के आठों रूपों को देखना - धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, वर लक्ष्मी, सन्तान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी

भीतर गर्भगृह में भी उसी तरह से दीपमालाएँ लगी थी जैसे शिव मन्दिर में है। बीच में पार्वतीजी की विशाल मूर्ति है।

पार्वतीजी के दर्शन कर हम बाहर निकले। पीछे दाहिनी ओर छोटा सा मन्दिर है जहाँ शेष शैय्या पर विश्राम कर रहे है विष्णु जी और पैरों के पास विराजमान है लक्ष्मीजी।

शिव मन्दिर के बाई ओर पार्वती मन्दिर है तो दाहिनी ओर छोटे-छोटे हवन कुंड बने है। यहाँ कुछ लोग हवन भी कर रहे थे। यहीं पर प्रसाद मिलता है। 50 रूपए में प्रसाद का एक सेट मिलता है जिसमें एक पैकेट में विशेष दक्षिण भारतीय शैली में बना हलवा होता है और साथ में भभूत और कुंकुम के पैकेट होते है। इसके अलावा एक सीलबन्द बोतल भी है जिसमें 21 कुंडों का पानी होता है। इसके अलावा पाँच लड्डुओं का एक पैकेट 10 रूपए का मिलता है। इसी तरह पंचामृत का छोटा डिब्बा भी ख़रीदा जा सकता है।

माना जाता है कि कुंड के पानी की बोतल का प्रयोग कई दिनों तक किया जा सकता है, रोज़ स्नान के पानी में कुछ बूँदें इस बोतल के पानी की डाल कर स्नान करना शुभ माना जाता है। इस तरह एक बोतल का उपयोग महीने भर तक किया जा सकता है। इस तरह अच्छा लगता है कि यात्रा के बाद भी कुछ दिनों तक इस माहौल से जुड़े रह सकते है। ख़ैर… हम बात कर रहे थे मन्दिर की…

मन्दिरों की परम्परा के अनुसार इस मन्दिर में भी नवग्रह का मन्दिर है। यहाँ कढाई में तेल गरम होता रहता है। इस तेल को दीपक में लेकर चढाया जाता है जिसमें यहाँ बैठे पुजारी मदद करते है।

मुख्य मन्दिर के आस-पास एक हाथी सज-धजा खड़ा होता है इसके साथ महावत भी पुजारी की वेशभूषा में होते है -

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आरंभिक चिट्ठे में हमनें जटाशंकर के मन्दिर के बारे में बताया था वही है एक स्थान जहाँ दो हाथी है। बारी-बारी से एक-एक हाथी को नहला कर सजाया जाता है और मन्दिर में खड़ा किया जाता है।

इस तरह दक्षिण के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल में हमनें दर्शन किए। मन्दिर की सामान्य जानकारी अगले चिट्ठे में…

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रामेश्वरम में कुंड स्नान

रामेश्वरम मन्दिर में मुख्य मन्दिर में जाने से पहले कुंड स्नान किया जाता है।

कुल 24 कुंड है जिनमें से दो कुंड सूख गए है। 22 कुंडो में पानी है पर स्नान 21 कुंडो पर करवाया जाता है क्योंकि 22वें कुंड मे सभी कुंडो का पानी है, अगर कोई 21 कुंडो में स्नान न करना चाहे तो इस एक कुंड में स्नान करना ही पर्याप्त है। यह है तस्वीर -

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यह एक हौज़ की तरह जिसमें कमल भी खिले है जबकि सभी 21 कुंड कुएँ की तरह है।

मन्दिर में सबसे पहले हनुमान जी और वहाँ स्थापित शिवलिंग जिसके बाद रामजी के दर्शन करने के बाद सामने ही कुछ लोग नजर आएगे जो हाथ में छोटी बाल्टी या डोल लिए खडे रहते है और कुंड स्नान के लिए पूछते है।

कुंड स्नान के लिए हर व्यक्ति से 51 रूपए लिए जाते है। जिस व्यक्ति को पैसे दिए जाते है वह व्यक्ति आपके साथ हर कुंड के पास जाकर, कुंड में से एक बाल्टी पानी निकाल कर सिर पर से पूरा पानी डाल देता है। इस तरह 21 कुंडो से 21 बाल्टी पानी सिर पर से डाला जाता है, यही कुंड स्नान है। अगर स्नान न करना चाहो तो हर कुंड के पास जाकर कुंड के चबूतरे पर से पानी की कुछ बूँदें सिर पर डालने को भी कुंड स्नान माना जाता है। हमने भी यही किया। इसके लिए पैसे भी नहीं देने पड़ते।

इन कुंडो में विभिन्न तीर्थ स्थानों से लाया गया पानी है जैसे पुष्कर तीर्थ का जल। इसीलिए इन कुंडों को यहाँ तीर्थ कहा जाता है। जितने कुंड उतने तीर्थ। इस तरह रामेश्वरम एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी तीर्थ स्थानों के तीर्थ स्नान का लाभ मिल जाता है।

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इसके अलावा विभिन्न पौराणिक चरित्रों के नाम पर भी यहाँ कुंड या तीर्थ बनाए गए है जैसे अर्जुन तीर्थ। लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालों के नाम से भी कुंड है जैसे रामसेतु बनाने वालों के नाम पर है - नल तीर्थ और नील तीर्थ।

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सभी कुंड एक ही स्थान पर नहीं है। पहला कुंड द्वार के पास हनुमान जी और रामजी के मन्दिर के सामने ही है। इसके बाद सभी कुंड पूरे मन्दिर में फैले है। कहीं एक ही कुंड है तो कहीं दो या तीन कुंड भी एक जगह है जैसे गायत्री तीर्थ, सावित्री तीर्थ और सरस्वती तीर्थ साथ-साथ है। अंतिम तीर्थ है गंगा-जमुना। यह देखने में एक ही कुंड लगता है। यह कुंड गोल नहीं लम्बोतरा है। भीतर देखने पर बीच में दीवार है, एक ओर गंगा का जल और दूसरी ओर जमुना का जल है।

हर कुंड के पास नाम और संख्या लिखी है। क्रम से एक के बाद एक कुंड के पास जाकर स्नान किया जाता है। अंतिम कुंड के पास एक और कुंड है जहाँ सभी को गंगाजल से स्नान कराया जाता है जिसके लिए पैसे नहीं देने पड़ते। अगर कोई स्नान नहीं करना चाहे तो कुछ बूंदे सिर पर डाल लेते है। इस तरह गीले कपडों से पूरे मन्दिर में घूमने से मन्दिर का वातावरण बहुत ठंडा लग रहा था। वैसे भी मन्दिर पत्थरों से बना है।

कुंड स्नान के बाद मुख्य मन्दिर में दर्शन करने है जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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रामेश्वरम में दर्शन

रामेश्वरम में मुख़्य मन्दिर रामालय नाम से जाना जाता है। जैसा कि आम तौर पर देखने में आता है कि मन्दिर के पास ही पूजापा बिकता है वैसा यहाँ पर पूजापा बिकता दिखाई नहीं दिया। यह है मन्दिर का मुख्य द्वार -

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द्वार के पास ही चप्पल-जूते रखने की व्यवस्था है। द्वार के पीछे से ही गलियारा शुरू है और दोनों ओर दुकानें शुरू होती है जो तस्वीर में हल्की सी दिखाई दे रही है। इन दुकानों पर सीप शंख मोती का सामान मिलता है। कुछ दूर जाने के बाद दुकाने समाप्त हो जाती है और गलियारे में सीधा आगे जाने पर अंतिन छोर पर है गणेश जी की मूर्ति। इस तस्वीर में देखिए, मूर्ति तो स्पष्ट नहीं है पर अंतिन छोर देखा जा सकता है -

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ग़णेश जी के दर्शन के बाद वापस गलियारे में लौट आना है। जहाँ गलियारे में दुकाने समाप्त हुई थी वहीं से बाई ओर के गलियारे में कुछ और दुकाने है, यहीं से आगे जाकर अंतिम छोर से दाहिने गलियारे में मुड़ना है जो लम्बा गलियारा है। यहाँ अंतिम छोर पर बाई ओर जटाशंकर जी का मन्दिर है। यानि यहाँ शिव जी जटाशंकर के रूप में है और बाएँ पार्श्व में विराजमान है पार्वती जी। इस रूप में शिव जी का श्रृंगार रूद्राक्ष से होता है। माना जाता है कि रूद्राक्ष में असीम शक्ति होती है। वास्तव में रूद्राक्ष शिव जी के आँसू है। मन्दिर के द्वार के दोनों किनारों पर और तोरण की तरह रूद्राक्ष की मालाएँ लगी है। यहाँ जटाशंकर और पार्वती के दर्शन कर परिक्रमा कर हम सीधे सामने बढ गए। यह गलियारा समाप्त होते ही बाई ओर द्वार है जैसा कि इस तस्वीर में देख सकते है -

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इस द्वार पर पूजापा बिकता है। द्वार से पहले बाईं ओर हनुमान जी का मन्दिर है जहाँ पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग है। हनुमान मन्दिर के बाईं ओर यानि अंत में ठीक द्वार के पास राममन्दिर है जिसमें पारम्परिक रूप में राम सीत लक्ष्मण और उनके सामने भक्त रूप में हनुमान जी की मूर्तियाँ है।

द्वार से निकलने पर दोनों ओर पूजा की सामग्री का बाज़ार सजा है। ठीक सामने लगभग आधा किलोमीटर तक सड़क है जिसके अंत में दाहिनी ओर भद्रकाली का मन्दिर है और बाई ओर दो-चार क़दम आगे बढने पर समुद्र का किनारा है। आश्चर्य होता है कि भद्रकाली के मन्दिर आने तक भी समुद्र होने का अंदाज़ा नहीं होता। समुद्र किनारे के इस स्थान को अग्नि तीर्थम कहते है, देखिए यह तस्वीर -

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जी हाँ, है समुद्र का किनारा और नाम है अग्नि तीर्थम। अब यह स्थान, मन्दिर तक का रास्ता, पूजापा का यहाँ मिलना और वहाँ मुख्य द्वार पर न मिलना, इन सबको समझने के लिए हम पौराणिक कथा संक्षिप्त में बता रहे है।

लंका विजय के बाद राम अपनी सेना के साथ सीता को लेकर लौट आए। अपनी भूमि यानि समुद्र किनारे आने पर राम को लगा कि रावण का वध एक पाप है और इस पाप से राम मुक्ति पाना चाहते थे जिसके लिए वो शिव की आराधना करना चाहते थे। राम ने हनुमान को शिवलिंग लाने के लिए कैलाश भेजा। हनुमान ने रास्ते में एक स्थान पर कुछ भक्तों को रामभजन करते देखा और वो भी इस टोली में शामिल हो गए। शिवलिंग की स्थापना का मूर्हत निकट आ रहा था और हनुमान लौटे नहीं थे, तब राम ने सीताजी से समुद्र किनारे रेत का शिवलिंग बनवाया। बाद में हनुमान को शिवलिंग लाने का ध्यान आया। जब हनुमान कैलाश से शिवलिंग लेकर पहुँचे तब तक लिंग स्थापना का मूर्हत बीत चुका था और सीता द्वारा बनाए गए लिंग की स्थापना हो चुकी थी। हनुमान के कहने पर कि इस लिंग का क्या होगा, राम ने कहा कि पहले इसी लिंग की पूजा होगी क्योंकि इसी लिंग को लाने की पहले बात हुई थी पर स्थापना सीताजी द्वारा तैयार लिंग की होगी क्योंकि मूर्हत के समय यही लिंग तैयार हुआ था।

सीताजी द्वारा शिवलिंग तैयार किया गया था इसीलिए यहीं पर है भद्रकाली का मन्दिर। इस तरह समुद्र के किनारे युद्ध की, वध की अग्नि को शान्त किया गया इसीलिए यह अग्नि तीर्थ कहलाया।

अब बात करते है दर्शन की। मुख्य द्वार से सीधा सामने हमने गणेश जी के दर्शन किए जैसा कि परम्परा है कि पहले गणेश जी के दर्शन किए जाते है। फिर की शिव की असीम शक्ति रूद्राक्ष के साथ यानि जटाशंकर के दर्शन किए जाते है फिर द्वार से निकल कर अग्नि तीर्थम जाकर स्नान किया जाता है। यहाँ महिलाओं के लिए अलग कक्ष भी है। अगर स्नान न करना चाहो तो समुद्र के पानी की कुछ बूँदे सिर पर डालने से भी तीर्थ स्नान माना जाता है।

इस तीर्थस्नान के बाद मन्दिर के द्वार से पूजापा खरीदा जाता है। पूजापा में नारियल, अगरबत्ती, धूप, फूल आदि पूजा की सामग्री के अलावा शिवजी के लिए बेलपत्र और पार्वती जी के लिए कमल के फूल के भी मिलते है। गुलाबी कमल ही दिखाई दिए, सफ़ेद कमल नज़र नहीं आए।

पूजापा लेकर भीतर आते ही पहले हनुमान जी की पूजा की जाती है। छोटे से मन्दिर में परिक्रमा भी की जा सकती है। फिर यही रखे शिवलिंग की पूजा करनी है। इसके बाद राममन्दिर में पूजा कर परिक्रमा करने के बाद मुख्य मन्दिर में दर्शन करने के लिए जाना चाहिए।

इस तरह पारम्परिक रूप में पहले गणेश जी के दर्शन हुए और कथा के अनुसार हनुमान जी और उनके द्वारा लाए गए लिंग की पूजा पहले की गई।

मुख्य मंदिर में जाने से पहले कुंड स्नान किया जाता है जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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