चेन्नै में मरीना बीच समुद्र तट पर एक अच्छा समय बिताने के बाद हम पहुंचे पार्थ सारथी मंदिर.
यह मंदिर समुद्र तट से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर ही है. जैसे की नाम से ही पता चलता है यहाँ कृष्ण जी पार्थ सारथी के रूप में है. कुरूक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को उपदेश देते कृष्ण जी का रूप अलग ही है. यह उपदेश ही तो गीता है इसीलिए रूप भी गंभीर है. यह रूप मंदिर के बाहर शिखर के सामने नज़र आ रहा है जैसा कि चित्र में देखा जा सकता है -

पूरा मंदिर पत्थरो से बना है. बहुत ही पुराना लगता है. कही कोई नयापन नजर नही आया. सामने ही पूजापा बिकता है जिसे लेकर हम भीतर पहुचे. भीतर पार्थ सारथी के रूप में कृष्ण अर्जुन के दर्शन कहीं नहीं होते। यहाँ कृष्ण जी की पारम्परिक छवि वाली सलोनी मूर्ति भी देखने को नहीं मिलती, कृष्ण जी का नाम लेने से जो सलोनी मूर्ति कल्पना में आती है, वह यहाँ नहीं है। यहाँ कृष्ण जी की मूर्ति अलग ही रूप में नजर आती है. ऊँची काले पत्थर से बनी मूर्ति है जिसके चहरे पर सफ़ेद मूछे है. इसीलिए इसे मूछों वाले कृष्ण जी का मंदिर भी कहते है. इसके अलावा चेहरा भी गंभीर लगता है, वो चिरपरिचित मुस्कान यहाँ नजर नही आती. गर्भ गृह में रखी इस मूर्ति के दर्शन कर हम बाहर आए.
बाहर एक छोटे से मंडप में शिवलिंग भी है जिसके दर्शन कर हम आगे बढे पार्वती मंदिर की ओर. यहाँ पार्वती जी अण्डाला लक्ष्मी के रूप में है जिसे शीतला माता भी कहा जाता है. यहाँ वट वृक्ष है जिस पर झूले चढाए जा रहे थे. बाहर पूजापा के साथ ही झूले भी बिक रहे थे. छोटे लकडी के झूले जिसे रंग-बिरंगे कागज़ों से सजाया गया.
हमने भी दर्शन किए झूला चढाया यानी झूले को वृक्ष पर बांधा और बाहर आए.
बाहर प्रसाद लिया. प्रसाद में लड्डू, भात (मीठे चावल) और वड़ा दिया जाता है.
कुछ देर मंदिर के आँगन में बैठ कर हम बाहर आए.
दोपहर का भोजन किया. फिर कुछ देर आराम करने के बाद शाम की गाडी से हम चल पड़े रामेश्वरम की ओर.



