Archive for March, 2009

चेन्नै का पार्थ सारथी मंदिर

चेन्नै में मरीना बीच समुद्र तट पर एक अच्छा समय बिताने के बाद हम पहुंचे पार्थ सारथी मंदिर.

यह मंदिर समुद्र तट से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर ही है. जैसे की नाम से ही पता चलता है यहाँ कृष्ण जी पार्थ सारथी के रूप में है. कुरूक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को उपदेश देते कृष्ण जी का रूप अलग ही है. यह उपदेश ही तो गीता है इसीलिए रूप भी गंभीर है. यह रूप मंदिर के बाहर शिखर के सामने नज़र आ रहा है जैसा कि चित्र में देखा जा सकता है -

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पूरा मंदिर पत्थरो से बना है. बहुत ही पुराना लगता है. कही कोई नयापन नजर नही आया. सामने ही पूजापा बिकता है जिसे लेकर हम भीतर पहुचे. भीतर पार्थ सारथी के रूप में कृष्ण अर्जुन के दर्शन कहीं नहीं होते। यहाँ कृष्ण जी की पारम्परिक छवि वाली सलोनी मूर्ति भी देखने को नहीं मिलती, कृष्ण जी का नाम लेने से जो सलोनी मूर्ति कल्पना में आती है, वह यहाँ नहीं है। यहाँ कृष्ण जी की मूर्ति अलग ही रूप में नजर आती है. ऊँची काले पत्थर से बनी मूर्ति है जिसके चहरे पर सफ़ेद मूछे है. इसीलिए इसे मूछों वाले कृष्ण जी का मंदिर भी कहते है. इसके अलावा चेहरा भी गंभीर लगता है, वो चिरपरिचित मुस्कान यहाँ नजर नही आती. गर्भ गृह में रखी इस मूर्ति के दर्शन कर हम बाहर आए.

बाहर एक छोटे से मंडप में शिवलिंग भी है जिसके दर्शन कर हम आगे बढे पार्वती मंदिर की ओर. यहाँ पार्वती जी अण्डाला लक्ष्मी के रूप में है जिसे शीतला माता भी कहा जाता है. यहाँ वट वृक्ष है जिस पर झूले चढाए जा रहे थे. बाहर पूजापा के साथ ही झूले भी बिक रहे थे. छोटे लकडी के झूले जिसे रंग-बिरंगे कागज़ों से सजाया गया.

हमने भी दर्शन किए झूला चढाया यानी झूले को वृक्ष पर बांधा और बाहर आए.

बाहर प्रसाद लिया. प्रसाद में लड्डू, भात (मीठे चावल) और वड़ा दिया जाता है.

कुछ देर मंदिर के आँगन में बैठ कर हम बाहर आए.

दोपहर का भोजन किया. फिर कुछ देर आराम करने के बाद शाम की गाडी से हम चल पड़े रामेश्वरम की ओर.

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नव वर्ष उगादी पर मुँह मीठा कीजिए गल्बाना से

आप सबको उगादी की शुभकामनाएँ !

नव वर्ष संवत 2066 का स्वागत है !

नव वर्ष उगादी के अवसर पर हमारे यहाँ मिष्ठान्न में गल्बाना बनाया जाता है। शायद बहुतों ने गल्बाना शब्द सुना भी नहीं होगा और शायद इसके स्वाद का भी अंदाज़ा नहीं होगा। तो चलिए, हम बताते है गल्बाना बनाना।

सामग्री - एक मध्यम आकार का कच्चा आम या कैरी, 100 ग्राम रवा या सूजी, 25 ग्राम शक्कर, एक बड़ा चम्मच घी, एक-एक छोटा चम्मच इलाइची पाउडर, चिरौंजी और किशमिश

बनाने की विधि - कैरी के छिलके के साथ लम्बे पतले टुकड़े काट लीजिए। इन टुकड़ों को रवा यानि सूजी के साथ घी में भून लीजिए। भूनते समय लगातार चम्मच चलाते रहिए। सुनहरा होने तक भूने। फिर 4 गिलास पानी मिलाकर पकने रखिए। इसमें शक्कर भी मिला दीजिए। कैरी के टुकड़े अच्छी तरह गलने और सूजी और शक्कर के साथ अच्छी तरह घुलने मिलने तक पकाइए। कुछ टुकड़े पूरी तरह नहीं गलते और लच्छे जैसे रह जाते है, इन्हें ऐसे ही रहने दीजिए। इस तरह क्रीम रंग का गाढा रस तैयार हो जाएगा। अब आँच से उतार लीजिए और इलाइची पाउडर, चिरौंजी और किशमिश ऊपर से बिखरा दीजिए। लीजिए तैयार है गल्बाना -

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इसे चाहे तो गरमागरम पूरियों के साथ खाइए -

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या कटोरी में लेकर ऐसे ही भी खाया जा सकता है। इसे गरमागरम भी खाया जा सकता है और ठण्डा भी खाया जा सकता है, दोनों ही तरह से स्वादिष्ट रहेगा। हाँ इसका स्वाद खटमिठ होता है पर इसे मिष्ठान्न ही मानते है।

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मरीना बीच – चेन्नै का समुद्री तट

पिछले सप्ताह हम रामेश्वरम की यात्रा पर गए.

हैदराबाद से सीधे रामेश्वरम के लिए रेल नही है. चेन्नै जाकर वहाँ से दूसरी रेल में यात्रा करनी पड़ती है. इस तरह हम पहले चेन्नै पहुंचे. सवेरे एगमोर (जिसे क्षेत्रीय भाषा में एशुन्मोर कहते है) रेलवे स्टेशन पहुँच गए थे और रामेश्वरम के लिए गाडी शाम में थी सो हम चल पड़े समुद्री तट की ओर.

रेलवे स्टेशन से मरीना बीच लगभग 6 कि.मी दूर है. लंबा रेतीला मैदान पार करने के बाद है समुद्री किनारा. बाई और रास्ता जैसा है जहां दोनों ओर कतार में दुकाने सजी है जिसमे समुद्री संपदा यानी सीप, शंख और मोती की वस्तुएं बिक रही थी जैसे शंख की चूडिया, गले के माले और सीपियों से बने कान में पहने जाने वाले टाप्स, चूडिया, गले के माले, बालो के पिन से लेकर कुमकुम, सिन्दूर की डिबिया तक और सजावट के लैंप शेड, दरवाजे की झालरे. इनमे से सीपियों से तैयार चीजे ज्यादा नाजुक और अच्छी लगी. दाम दस-बीस रूपए से शुरू होकर दो-तीन सौ तक है.

आगे बढ़ने पर है समुद्री तट. यहाँ पर खाने-पीने की चीजे बिक रही थी.

बहुत लंबा है समुद्र तट. बाएँ किनारे काले पत्थरो का ढेर है जिस पर चढ़ कर देखने पर दूसरी ओर भी समुद्र नजर आता है.

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समुद्र में इक्का-दुक्का नावे भी नजर आई. लम्बे समय तक हम यहाँ टहलते रहे. किनारे पर सीपियों के ढेर नजर आए पर सब एक तरफ के खोल थे. एक भी साबुत सीपी नही मिली पर एक सफ़ेद झक मोती मिला लेकिन छेद वाला मोती था. माना जाता है मोती में छेद होने पर उसकी महत्ता कम हो जाती है.

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ख़ैर... एक अच्छा समय बिताने के बाद हम चल पड़े पार्थ सारथी मंदिर की ओर.

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