Archive for January, 2009

सरस्वती के चरणों में अक्षर अभ्यास

बसन्त पंचमी के दिन बासर के इस सरस्वती मन्दिर का दृश्य निराला होता है।

बाहर बाज़ार में पाटी (स्लेट) कलम तथा पीले और सफ़ेद फूलों का अंबार लगा होता है। केले के पत्तों और फूलों से सजे छोटे-छोटे मंडप भी बिकते है।

मुख्य मन्दिर आँगन में बीचों-बीच है और सामने की ओर यानि प्रवेश द्वार के दाहिने बाएँ दीवार से सटे चबूतरे है। इन्हीं चबूतरों पर नन्हें-मुन्नों से सरस्वती वन्दना करवाई जाती है।

परिवारजन पाटी पर कलम से वर्णमाला के प्रथम चार अक्षर बड़े आकार में ऊपर दो और नीचे दो, हिन्दी या तेलुगु में अ आ इ ई या అ ఆ ఐ ఈ लिखते है और बच्चे इन अक्षरों पर कलम फेरते हुए अक्षर अभ्यास करते है।

कहीं केले के पत्तों और फूलों से सजे छोटे मंडप में सरस्वती की मूर्ति रखकर बच्चों से पूजा की सामग्री चढवा कर फिर अक्षर अभ्यास करवाया जाता है।

इन दोनों ही तरह के अक्षर अभ्यास के लिए टिकट खरीदना पड़ता है जिसमें मंडप पूजा का टिकट कुछ अधिक होता है। इसके अलावा तीसरा और सबसे महंगा टिकट लेने पर पंडित जी मंत्रोच्चार के साथ पूजा करवा कर अक्षर अभ्यास करवाते है।

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माँ सरस्वती की शोभा यात्रा और अभिषेक

हम शुक्रवार की सुबह हैदराबाद से निकले थे और लगभग पाँच घण्टे का सफ़र तय कर बासर पहुँचे थे।

दोपहर का भोजन करने के बाद शाम में मन्दिर खुलने तक हम बाज़ार की सैर करते रहे। शाम में मन्दिर पहुँचे। यह है मन्दिर का प्रवेश द्वार और सामने की जाली है सरस्वती मन्दिर की -

रात में आठ बजे आरती हुई। आरती के बाद माता की शोभा यात्रा निकली। बताया गया कि हर शुक्रवार को सुबह और रात की आरती के बाद शोभा यात्रा निकाली जाती है।

शोभा यात्रा के लिए नीले मख़मल के वस्त्र जड़ी पालकी को पीले और सफ़ेद फूलों से सजाया गया। इस पालकी में सरस्वती की तस्वीर रखकर मन्दिर के आँगन में बीचों-बीच स्थित मुख्य मन्दिर (चित्र में जो जाली की दीवार दिखाई दे रही है) के चारों ओर परिक्रमा की गई।

पालकी को चारों ओर से चार भक्त पकड़ते है। जो भक्त पालकी को पकड़ना चाहते है उन्हें इसके लिए टिकट खरीदना पड़ता है। पालकी के साथ आरती लेकर चला जाता है। इस आरती के लिए भी भक्त को टिकट लेना पड़ता है। पंडित जी साथ में चलते है और सभी भक्त परिक्रमा में शामिल हो सकते है। सात परिक्रमा की जाती है।

परिक्रमा में शामिल होकर हम बाहर आए। रात का खाना खाया और तुरन्त सो गए क्योंकि अगले दिन सुबह जल्दी ही हमें मन्दिर में अभिषेक में शामिल होना था।

सवेरे चार बजे अभिषेक का समय होता है। अभिषेक देखने के लिए टिकट खरीदना है। हम टिकट लेकर भीतर पहुँचे फिर जाली के भीतर के द्वार बन्द हो गए। जो टिकट नहीं लेते है उन्हें बाहर आँगन में कतार में प्रतीक्षा करनी पड़ती है अभिषेक के बाद मन्दिर के कपाट खुलने तक, तभी वे दर्शन कर पाते है।

हम अभिषेक देखने के लिए गर्भ गृह में बैठे। मन्त्रोचार के साथ तीन पंडितों ने अभिषेक किया। बीच में वीणा लिए सरस्वती की बड़ी प्रतिमा और दोनों ओर लक्ष्मी और पार्वती की छोटी प्रतिमाएँ है। तीनों प्रतिमाओं का विधिवत अभिषेक किया गया, दूध से पानी से शहद से। फिर श्रृंगार किया गया।

पंडित जी ने बताया कि अभिषेक के समय भक्त जो चढावा लाते है उसमें से उचित सामग्री श्रृंगार के लिए चुनी जाती है अन्यथा मन्दिर के कोष से सामग्री लेकर श्रृंगार किया जाता है।

इसे इत्तेफ़ाक कहे या भक्ति हमारे चढावे में सिल्क की सफ़ेद साड़ी थी लाल बार्डर की और साथ में थी लाल चूड़ियाँ और सफ़ेद मोतियों की माला और हमारा चढावा चुना गया माँ सरस्वती के श्रृंगार के लिए जबकि अन्य भक्तों के चढावे से लक्ष्मी और पार्वती का श्रृंगार किया गया। पंडित जी ने बताया कि यह श्रृंगार अगले दिन अभिषेक तक ऐसे ही रहता है यानि चौबीस घण्टे तक, हमें लगा जैसे हमारे सिर पर वरदहस्त आ गया हो।

यहाँ हम एक बात बता दें कि यह मन्दिर दक्षिण भारत का एकमात्र सरस्वती मन्दिर है।

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बासर का सरस्वती मन्दिर

आन्ध्रप्रदेश के निज़ामाबाद ज़िले में गोदावरी नदी के तट पर बसा है बासर शहर।

विशाल गोदावरी नदी पर बने इस पुल को पार करने के बाद बासर में प्रवेश किया जाता है -

इस पुण्य स्थली का परिसर बहुत बड़ा है। राज्य परिवहन की बसें यहीं आकर रूकती है। यहीं पर ठहरने कि लिए होटल, लाँज, गेस्ट हाउज़ और धर्मशालाएँ भी है।

परिसर में बड़ा बाज़ार है जहाँ पूजा की सामग्री के साथ-साथ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, तस्वीरें, धार्मिक पुस्तकें, दीपक-आरती जैसी वस्तुएँ, भजन और मन्दिर के आडियो-वीडियो कैसेट भी बिकते है। खाने-पीने की दुकानें और छोटे होटल भी है।

और सामने ही है मन्दिर परिसर -

नीला लम्बा शेड जो नज़र आ रहा है वह गलियारा है। प्रवेश के बाद इसी गलियारे को पार कर बाईं ओर मुड़ने पर मुख्य मंदिर है। ऊँचा सफ़ेद गुम्बद मुख्य मन्दिर का है जिसके ठीक पीछे नज़र आ रही है सरस्वती की मूर्ति। यह मूर्ति इतनी ऊँचाई पर है कि मन्दिर के कलश के साथ दूर-दूर से नज़र आती है। यह है मूर्ति की तस्वीर -

दाहिने हाथ में ऊँ लिखा है और बाएँ हाथ में कलश लिए शेष दोनों हाथों से ज्ञान अर्पित करती कमल में पद्मासन की मुद्रा में बैठी सरस्वती।

माँ सरस्वती का आशीर्वाद लेने हर साल बसन्त पंचमी पर स्कूली बच्चों को लेकर कई बसें आती है और बच्चे कतारबद्ध होकर अपने कैरियर के लिए प्रार्थना करते है। जिन नौनिहालों को पढाई शुरू करनी है उन्हें भी इसी दिन यहाँ आशीर्वाद के लिए लाया जाता है।

इसके अलावा वर्ष की दोनों नवरात्र - दशहरा और श्रीरामनवमी, इन दोनों ही अवसरों पर बहुत भीड़ होती है।

मन्दिर के भीतर की चर्चा अगले चिट्ठे में…

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