हम शुक्रवार की सुबह हैदराबाद से निकले थे और लगभग पाँच घण्टे का सफ़र तय कर बासर पहुँचे थे।
दोपहर का भोजन करने के बाद शाम में मन्दिर खुलने तक हम बाज़ार की सैर करते रहे। शाम में मन्दिर पहुँचे। यह है मन्दिर का प्रवेश द्वार और सामने की जाली है सरस्वती मन्दिर की -

रात में आठ बजे आरती हुई। आरती के बाद माता की शोभा यात्रा निकली। बताया गया कि हर शुक्रवार को सुबह और रात की आरती के बाद शोभा यात्रा निकाली जाती है।
शोभा यात्रा के लिए नीले मख़मल के वस्त्र जड़ी पालकी को पीले और सफ़ेद फूलों से सजाया गया। इस पालकी में सरस्वती की तस्वीर रखकर मन्दिर के आँगन में बीचों-बीच स्थित मुख्य मन्दिर (चित्र में जो जाली की दीवार दिखाई दे रही है) के चारों ओर परिक्रमा की गई।
पालकी को चारों ओर से चार भक्त पकड़ते है। जो भक्त पालकी को पकड़ना चाहते है उन्हें इसके लिए टिकट खरीदना पड़ता है। पालकी के साथ आरती लेकर चला जाता है। इस आरती के लिए भी भक्त को टिकट लेना पड़ता है। पंडित जी साथ में चलते है और सभी भक्त परिक्रमा में शामिल हो सकते है। सात परिक्रमा की जाती है।
परिक्रमा में शामिल होकर हम बाहर आए। रात का खाना खाया और तुरन्त सो गए क्योंकि अगले दिन सुबह जल्दी ही हमें मन्दिर में अभिषेक में शामिल होना था।
सवेरे चार बजे अभिषेक का समय होता है। अभिषेक देखने के लिए टिकट खरीदना है। हम टिकट लेकर भीतर पहुँचे फिर जाली के भीतर के द्वार बन्द हो गए। जो टिकट नहीं लेते है उन्हें बाहर आँगन में कतार में प्रतीक्षा करनी पड़ती है अभिषेक के बाद मन्दिर के कपाट खुलने तक, तभी वे दर्शन कर पाते है।
हम अभिषेक देखने के लिए गर्भ गृह में बैठे। मन्त्रोचार के साथ तीन पंडितों ने अभिषेक किया। बीच में वीणा लिए सरस्वती की बड़ी प्रतिमा और दोनों ओर लक्ष्मी और पार्वती की छोटी प्रतिमाएँ है। तीनों प्रतिमाओं का विधिवत अभिषेक किया गया, दूध से पानी से शहद से। फिर श्रृंगार किया गया।
पंडित जी ने बताया कि अभिषेक के समय भक्त जो चढावा लाते है उसमें से उचित सामग्री श्रृंगार के लिए चुनी जाती है अन्यथा मन्दिर के कोष से सामग्री लेकर श्रृंगार किया जाता है।
इसे इत्तेफ़ाक कहे या भक्ति हमारे चढावे में सिल्क की सफ़ेद साड़ी थी लाल बार्डर की और साथ में थी लाल चूड़ियाँ और सफ़ेद मोतियों की माला और हमारा चढावा चुना गया माँ सरस्वती के श्रृंगार के लिए जबकि अन्य भक्तों के चढावे से लक्ष्मी और पार्वती का श्रृंगार किया गया। पंडित जी ने बताया कि यह श्रृंगार अगले दिन अभिषेक तक ऐसे ही रहता है यानि चौबीस घण्टे तक, हमें लगा जैसे हमारे सिर पर वरदहस्त आ गया हो।
यहाँ हम एक बात बता दें कि यह मन्दिर दक्षिण भारत का एकमात्र सरस्वती मन्दिर है।